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मॉरीशस में भारतीय परियोजना का विरोध

  • 30 Oct 2018
  • 6 min read

चर्चा में क्यों?

मॉरीशस में अगलेगा द्वीपों पर सुविधाओं को अपग्रेड करने के लिये हिंद महासागर में भारत की प्रमुख परियोजनाओं में से एक पर काम चल रहा है लेकिन मॉरीशस की संसद और स्थानीय लोगों द्वारा इस परियोजना का विरोध किया रहा है।

पृष्ठभूमि

वर्ष 2015 में भारत ने अगलेगा द्वीप समूह के विकास के लिये मॉरीशस के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किये थे। इस समझौते के तहत निम्नलिखित कार्यों को शामिल किया गया था-

  • समुद्र और वायु संपर्क में सुधार के लिये बुनियादी ढाँचे की स्थापना और उन्नयन।
  • द्वीप से बाहर में अपने हितों की रक्षा के लिये मॉरीशस सुरक्षा बलों की क्षमताओं को बढ़ाना।
  • हालाँकि, भारतीय नौसेना और तटरक्षक बल अपने हितों की रक्षा के लिये ट्रांसपोंडर सिस्टम और निगरानी बुनियादी ढाँचे को स्थापित करने में रूचि दिखा रही है, जिनका स्थानीय स्तर पर विरोध किया जा रहा है।

अगलेगा परियोजना

  • इस परियोजना में एक जलबंधक या सेतु (Jetty) का निर्माण, रनवे का पुनर्निर्माण और विस्तार तथा मॉरीशस के मुख्य भू-भाग के उत्तर में स्थित अगलेगा द्वीप पर एक एयरपोर्ट टर्मिनल का निर्माण किया जाना शामिल है।
  • 87 मिलियन डॉलर की लागत वाली इस परियोजना को भारत सरकार द्वारा वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जा रही है।

भारत के लिये परियोजना का महत्त्व

  • मात्रा के आधार पर भारत के व्यापार का कुल 95% तथा मूल्य के आधार पर 68% व्यापार हिंद महासागर के माध्यम से होता है। भारत द्वारा आयात किये जाने वाले कुल कच्चे तेल का 80% भाग हिंद महासागर के मार्ग से आयातित होता है, इसलिये हिंद महासागर में भारत की उपस्थिति महत्त्वपूर्ण है।
  • चीन का ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ जो भारत के सामरिक हितों के लिये एक खतरा हो सकता है, का मुकाबला करने के लिये हिंद महासागर के वृहद् क्षेत्र में भारत की उपस्थिति अत्यंत आवश्यक है।
  • इस परियोजना को SAGAR (Security And Growth for All in Region) परियोजना के तहत अपने पड़ोसी देशों के विकास के प्रयासों के हिस्से के रूप में देखा जा सकता है। इस परियोजना को भारत और इसके पड़ोसी देशों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने के रूप में भी देखा जा सकता है।
  • मालदीव और सेशेल्स में भारतीय परियोजनाओं द्वारा प्रतिरोध का सामना किये जाने के बाद भारत के लिये यह अधिक आवश्यक है कि वह अपनी परियोजनाओं को सफलतापूर्वक लागू करे।
  • यह परियोजना आधारभूत ढाँचे के उन्नयन के माध्यम से मॉरीशस के सुरक्षा बलों की क्षमता में वृद्धि करेगा।

परियोजना के विरोध का कारण

1. विपक्ष द्वारा विरोध

  • मॉरीशस की संसद में विपक्ष इस परियोजना की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर रहा है।
  • परियोजना में भारतीय भागीदारी और इसकी लागत को लेकर समस्याएँ हैं और यह समस्या भी है कि क्या इसमें भारतीय सैन्य घटक शामिल होगा।
  • मॉरीशस की सरकार ने इस परियोजना को किसी भी पर्यावरणीय लाइसेंस प्रक्रिया से छूट प्रदान की है।

2. स्थानीय लोगों द्वारा विरोध

  • 1965 में मॉरीशस की आज़ादी से पहले, ब्रिटेन ने मॉरीशस से चागोस द्वीप को अलग कर दिया था और जबरन वहाँ के निवासियों को स्थानांतरित कर दिया तथा अमेरिका को डिएगो गार्सिया पर सैन्य अड्डा बनाने की इज़ाज़त दी। भारतीय परियोजना को लेकर अगलेगा द्वीप के निवासियों के मन में यही भय है कि कहीं उनके साथ पहले जैसा व्यवहार न हो।
  • सभी बड़ी सैन्य शक्तियाँ जैसे- फ्राँस, चीन, अमेरिका और ब्रिटेन हिंद महासागर में नौसैनिक आधार विकसित कर चुकी हैं, जिसके चलते स्थानीय लोगों को भय है कि उनके शांत द्वीप का सैन्यीकरण कर दिया जाएगा।

आगे की राह

  • अन्य देशों द्वारा संचालित सैन्य अड्डों के विपरीत, भारतीय अड्डों का आधार नरम है जिसका अर्थ है कि स्थानीय लोग किसी भी भारत निर्मित परियोजना के माध्यम आवागमन कर सकते हैं। इससे स्थानीय सरकारों को अपनी संप्रभुता को कम किये बिना, अपने क्षेत्र पर अधिक नियंत्रण प्राप्त होता है। भारत को सभी प्रभावित पार्टियों के डर को दूर करके और अधिक प्रेरक तरीके से एक विश्वसनीय तथा दीर्घकालिक साझेदार के रूप में खुद को पेश करने की ज़रूरत है।

स्रोत : द हिंदू

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