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अंतर्राष्ट्रीय संबंध

क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (RCEP) और भारत

  • 01 Jun 2020
  • 8 min read

प्रीलिम्स के लिये:

क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी

मेन्स के लिये:

RCEP और भारत के स्थानीय हित, वैश्विक व्यापार में भारत की भूमिका 

चर्चा में क्यों?

भारत सरकार ने चीन के संदर्भ में अपनी चिंताओं के कारण आसियान (Association of Southeast Asian Nations-ASEAN) देशों के नेतृत्त्व में बने ‘क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी’ (Regional Comprehensive Economic Partnership- RCEP) समझौते में न शामिल होने का फैसला किया है।

प्रमुख बिंदु: 

  • COVID-19  के अनुभव और चीन या किसी एक ही देश पर आयात हेतु निर्भर देशों के अनुभवों ने भारत के RCEP में न शामिल होने के विचारों को और अधिक मज़बूत किया है।
  • पिछले महीने RCEP ‘व्यापार वार्ता समिति’ (Trade Negotiating Committee -TNC) के अध्यक्ष ने अपने पत्र में कहा था कि यदि भारत पुनः RCEP में शामिल होता है तो समूह भारत द्वारा की गई आपत्ति (कुछ ही उत्पादों को बाज़ार की पहुँच’ उपलब्ध कराने के संदर्भ में) पर पुनः विचार कर सकता है।
  • गौरतलब है कि नवंबर, 2019 में भारतीय प्रधानमंत्री ने भारत के कृषि और कुछ अन्य क्षेत्रों के हितों की रक्षा को कारण बताते हुए RCEP से अलग होने की घोषणा की थी।
  • RCEP से अलग होने के बाद भारत इस समूह की कम-से-कम दो अलग बैठकों (फरवरी में इंडोनेशिया के बाली में आयोजित बैठक और अप्रैल में आयोजित वर्चुअल RCEP बैठक) में नहीं शामिल हुआ है।
  • अप्रैल में आयोजित RCEP व्यापार वार्ता समिति बैठक में वर्ष 2020 के अंत तक इस समझौते पर हस्ताक्षर करने को प्रतिबद्ध देशों के वार्ताकारों ने समूह के विधिक मामलों की त्रुटियों/आपत्तियों को दूर किया। 

क्या है RCEP?

  • ‘क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी’ (Regional Comprehensive Economic Partnership- RCEP) एक मुक्त व्यापर की संधि है। 
  • इस समझौते का उद्देश्य आसियान और इसके मुक्त व्यापार समझौते में शामिल होना भारतीय औद्योगिक क्षेत्र के लिये लाभदायक हो सकता है।
  • RCEP वार्ताओं की शुरुआत नवंबर, 2012 में कंबोडिया में आयोजित आसियान समूह के 21वें शिखर सम्मेलन में की गई थी।
  • इस समझौते में 10 आसियान देशों के साथ 6 अन्य देशों (ऑस्ट्रेलिया, चीन, जापान, न्यूज़ीलैंड, दक्षिण कोरिया और भारत) को शामिल करने का प्रस्ताव किया गया था।
  • भारत सहित RCEP के सदस्य देश विश्व की लगभग आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं, साथ ही ये देश विश्व के एक चौथाई निर्यात तथा कुल वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 30% का योगदान देते हैं। 

 RCEP में भारत को शामिल करने की मांग :

  • RCEP द्वारा 30 अप्रैल को जारी एक पत्र के अनुसार, यह समूह COVID-19 के कारण क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर पड़े नकारात्मक प्रभावों को कम करने तथा निवेश में वृद्धि करने हेतु सदस्य देशों को एक स्थिर और पूर्वानुमान योग्य आर्थिक वातावरण उपलब्ध कराएगा।
  • समूह के 15 सदस्यों ने भारत के साथ समूह के संदर्भ में असहमतियों को दूर करने की प्रतिबद्धता को दोहराया तथा कहा कि वे RCEP की वार्ता में भारत की वापसी का स्वागत करेंगे।
  • ऑस्ट्रेलियाई नामित उच्चायुक्त के अनुसार, यदि भारत समूह में पुनः शामिल होना चाहता है तो यह सबसे बेहतर समय होगा, क्योंकि यह दुनिया को कि न सिर्फ भारत के निवेश का एक आकर्षक स्थान/बाज़ार होने का संदेश देगा बल्कि इससे लोगों को ‘मेक इन इंडिया' (Make In India) पहल के तहत उत्पादन केंद्र बनने की भारत की क्षमता के बारे में भी पता चलेगा।      
  • साथ ही भारत को समूह में चीन की उपस्थिति के बीच एक सकारात्मक संतुलन की तरह देखा जा रहा है। 

भारत की चुनौतियाँ: 

  • नवंबर, 2019 के भारतीय प्रधानमंत्री के वक्तव्य के अनुसार, वर्तमान RCEP अपनी मूल भावना और इस समझौते के तहत मार्गदर्शक सिद्धांतों को प्रतिबिंबित नहीं करता है। 
  • भारत के लिये RCEP मुक्त व्यापार संधि में शामिल होने की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि समूह के 15 में से 11 देशों के साथ भारत का व्यापार घाटे में रहा है।
  • विशेषज्ञों के अनुसार, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के साथ मुक्त व्यापार संधि में शामिल होने से  डेयरी उत्पाद से जुड़ी स्थानीय इकाईयों को भारी प्रतिस्पर्द्धा का सामना करना पड़ सकता है, साथ ही स्टील और कपड़ा उद्योग से जुड़े व्यवसाईयों ने भी इस संदर्भ में अपनी चिंताएँ व्यक्त की हैं।
  • समूह में शामिल होने से पहले भारतीय उद्योग और व्यवसायी चीन जैसे देशों से उत्पादित सस्ते सामानों के आयात में वृद्धि को लेकर भी चिंतित थे।

आगे की राह:

  • पिछले कुछ वर्षों में RCEP देशों ने तकनीकी और विनिर्माण जैसे में क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण प्रगति की है, ऐसे में इस समूह की आपूर्ति श्रंखला में शामिल होना भारतीय औद्योगिक क्षेत्र के लिये लाभदायक हो सकता है।
  • हालाँकि वर्तमान परिस्थिति में चीन, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के उत्पादकों को भारतीय बाज़ार की खुली पहुँच प्रदान करना स्थानीय उद्योगों के लिये एक बड़ी चुनौती का कारण बन सकता है।
  • परंतु नवीन तकनीकी विकास में भाग लेने और वैश्विक बाज़ार में लाभ प्राप्त करने हेतु अधिक दिनों तक इस संरक्षणवादी नीति को नहीं बनाए रखा जा सकता अतः सरकार को स्थानीय क्षमता के विकास हेतु महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों की पहचान कर नवोन्मेष, आर्थिक सहयोग जैसे माध्यमों से उनके विकास को बढ़ावा देना होगा।

स्रोत: द हिंदू

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