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आईएनएस किलटन द्वारा नौसेना का मज़बूतीकरण

  • 17 Oct 2017
  • 4 min read

चर्चा में क्यों?

  • हाल ही में देश के तीसरे और सबसे नए पनडुब्बी भेदी लड़ाकू जलपोत आईएनएस किलटन को औपचारिक रूप से नौसेना में शामिल किया गया। यह प्रयास निश्चित तौर पर नौसेना को मज़बूत करेगा, लेकिन वर्तमान समय में युद्घपोत निर्माण के क्षेत्र में कई समस्याएँ भी हैं। विदित हो कि किलटन को तय समय से पाँच साल की देरी से तैयार किया गया है।

आईएनएस किलटन विशेषताएँ

  • इस युद्धपोत का निर्माण 'मेक इन इंडिया' प्रोजेक्ट के तहत किया गया है। विदित हो कि शिवालिक क्लास, कोलकाता क्लास, आईएनएस कमोर्ता और आईएनएस कदमात के बाद आईएनएस किलटन देश का सबसे घातक युद्धपोत है। इस युद्धपोत में घातक हथियारों के साथ ही सेंसर भी लगाए गए हैं।
  • यह देश का पहला ऐसा युद्धपोत है जिसके विशाल ढाँचे में कार्बन फाइबर लगा है। कार्बन फाइबर के इस्तेमाल से जहाज़ का भार कम रहता है और रख-रखाव का खर्च भी कम हो जाता है।
  • इस युद्धपोत को भारी-भरकम टारपीडो के साथ ही एएसडब्लू रॉकेटों से लैस किया गया है। इसे अग्नि नियंत्रण प्रणाली, मिसाइल तैनाती रॉकेट, एडवांस इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेजर सिस्टम सोनार और रडार रेवती से भी लैस किया गया है।
  • इस जहाज़ में जल्दी ही कम दूरी की सैम प्रणाली और एएसडब्लू हेलिकॉप्टर भी तैनात किए जाएंगे।

युद्धपोत निर्माण की समस्याएँ

  • दरअसल, नौसेना ने अपनी मौजूदा 140 पोतों की क्षमता को 2027 तक बढ़ाकर 170-180 करने का लक्ष्य रखा है और इसके लिये हर साल तीन से चार नए जहाज़ नौसेना में शामिल होने चाहियें।
  • दरअसल,  25-30 साल की सेवा अवधि पूरी कर चुके पुराने पोतों के स्थान पर नए भी आने चाहियें। इस दृष्टिï से हर वर्ष सात से नौ पोतों की आवश्यकता होगी, जबकि नौसेना तीन या चार भी शामिल करती नहीं दिख रही।
  • घरेलू युद्घपोत निर्माण की धीमी गति के चलते ही नौसेना को रूस जैसे बाहरी देशों पर निर्भर होना पड़ा है।
  • इस देरी की एक वजह यह भी है कि नौसेना हर युद्घपोत में एकदम आधुनिकतम तकनीक का इस्तेमाल चाहती है, वहीं चीन जैसे तेज़ी से निर्माण करने वाले देश खास डिज़ाइन तय कर लेते हैं और फिर बड़े पैमाने पर निर्माण करते हैं। उनको लागत के मामले में भी फायदा मिलता है क्योंकि यह निर्माण थोक में किया जाता है।

निष्कर्ष

हमारे रक्षा शिपयार्डों ने जहाज़ निर्माण में काफी हद तक स्वदेशीकरण हासिल कर लिया है। अपने स्वयं के अनुसंधान एवं विकास के ज़रिये कुछ प्रमुख प्रणालियों को स्वदेश में ही विकसित करने में भी सफलता हासिल कर ली है। फिर भी हमें उपरोक्त चिंताओं को ध्यान में रखते  हुए आगे बढ़ना होगा।

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