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भारतीय अर्थव्यवस्था

ऋण माफी और उसका आर्थिक प्रभाव

  • 16 Sep 2019
  • 6 min read

संदर्भ

हाल के वर्षो में कई राज्य सरकारों ने किसानों के कृषि ऋणों को माफ किया है, जिसके कारण ऋण माफी सदैव ही विशेषज्ञों के मध्य चर्चा का विषय रही है। हाल ही में भारतीय रिज़र्व बैंक (Reserve Bank of India-RBI) ने भी इस संदर्भ में अपने आंतरिक कार्य दल (Internal Working Group-IWG) की रिपोर्ट साझा की है। रिपोर्ट में बताया गया है कि किस प्रकार कृषि ऋण माफी ने राज्य सरकारों को आर्थिक मोर्चे पर प्रभावित किया है, साथ ही रिपोर्ट में सरकारों को ऋण माफी का सहारा लेने से बचने का सुझाव दिया गया है।

ऋण माफी का इतिहास

  • सर्वप्रथम वर्ष 1990 में वी.पी. सिंह की सरकार ने पूरे देश में किसानों का तकरीबन 10 हज़ार करोड़ रुपए का ऋण माफ किया था। जिसके बाद UPA सरकार ने भी वित्तीय वर्ष 2008-09 के बजट में करीब 71 हज़ार करोड़ रुपए की ऋण माफी का एलान किया।
  • वर्ष 2014-15 से कई बार बाढ़ और सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाओं एवं विमुद्रीकरण से प्रभावित किसानों को राहत देने हेतु राज्य सरकारों द्वारा ऋण माफी की गई है।
  • कई बार RBI तथा अन्य आर्थिक समीक्षकों ने वोट बटोरने के लिये ऋण माफी का प्रयोग न करने की चेतावनी दी है।

राज्य के वित्त पर ऋण माफी का प्रभाव

  • RBI के आंतरिक कार्य दल की रिपोर्ट बताती है कि सामान्यतः सभी राज्यों की ऋण माफी में एक ही प्रकार का पैटर्न देखा गया है। सभी राज्य ऋण माफी के तीन से चार वर्षों मे अपने राज्य बजट में उसे स्थान देना बंद कर देते हैं।
  • वर्ष 2014-15 से वर्ष 2018-19 के बीच विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा घोषित कुल कृषि ऋण माफी 2.36 ट्रिलियन रुपए थी, जिसमे से केवल 1.5 ट्रिलियन रुपए का ऋण ही अब तक माफ किया गया है।
  • बीते पाँच वर्षों में केवल कुछ ही राज्यों ने मिलकर वर्ष 2008-09 में केंद्र सरकार द्वारा माफ की गई राशि, जो कि 0.72 ट्रिलियन रुपए थी का तीन गुना माफ कर दिया है।
  • वर्ष 2017-18 में ऋण माफी अपनी चरम सीमा पर थी और इसी दौरान राज्यों का राजकोषीय घाटा लगभग 12 प्रतिशत तक पहुँच गया था।

ऋण माफी का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

  • संक्षेप में, कृषि ऋण माफी का अर्थ सरकार द्वारा उस निजी ऋण का निपटान करना है जो किसानों द्वारा बैंकों से लिया जाता है, लेकिन ऐसा करने से सरकार के संसाधनों में कमी आती है, जिसके प्रभाव से या तो संबंधित सरकार का राजकोषीय घाटा (अर्थात् बाज़ार से कुल उधारी) बढ़ जाता है या सरकार को व्यय में कटौती करनी पड़ती है।
  • उच्च राजकोषीय घाटे का अर्थ यह कि है कि बाज़ार में निजी व्यवसायों को उधार देने के लिये उपलब्ध धनराशि कम होगी एवं ब्याज दर अधिक होगी जिससे बाज़ार में ऋण महंगा हो जाएगा और इसका स्पष्ट प्रभाव नई कंपनियों के निर्माण पर पड़ेगा तथा रोज़गार सृजन में कमी आएगी।
  • यदि राज्य सरकार बाज़ार से पैसा उधार नहीं लेना चाहती है और अपने वित्तीय घाटे के लक्ष्य पर बनी रहती है, तो उसे खर्च में कटौती करने के लिये मज़बूर होना पड़ेगा।
  • इस स्थिति में अधिकतर देखा गया है कि राज्य सरकारें राजस्व व्यय जैसे- वेतन और पेंशन आदि पर होने वाले व्यय के साथ पर पूंजीगत व्यय जैसे- सड़कें, भवन, स्कूल आदि के निर्माण पर किये जाने वाला व्यय में कटौती करती हैं।
  • पूंजीगत व्यय में कटौती से भविष्य में उत्पादन को बढ़ाने की क्षमता कमज़ोर हो जाती है।
  • कृषि ऋण माफी को कभी भी विवेकपूर्ण नहीं माना जा सकता है, क्योंकि इसके कारण अर्थव्यवस्था में ऋण संस्कृति पूर्णतः बर्बाद हो जाती है एवं समग्र आर्थिक विकास को चोट पहुँचती है, क्योंकि इससे डिफॉल्टर को प्रोत्साहन मिलता है और यह उन लोगों के लिये यह दंड के समान होता है जो अपने ऋण का भुगतान समय पर करते हैं।

भारत की व्यापक आर्थिक स्थिति के लिये राज्य की अर्थव्यवस्था कितनी महत्त्वपूर्ण है?

  • आमतौर पर जब भारतीय अर्थव्यवस्था का विश्लेषण किया जाता है तो केंद्र सरकार की वित्तीय स्थिति को ही ध्यान में रखा जाता है लेकिन वर्तमान स्थिति इसके काफी विपरीत है।
  • राष्ट्रीय लोक वित्त एवं नीति संस्थान (National Institute of Public Finance and Policy-NIPFP) के आँकड़े बताते हैं कि देश की सभी राज्य सरकारें मिलकर एक साथ केंद्र से लगभग 30 प्रतिशत अधिक खर्च करती हैं।
  • दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि भारत की व्यापक आर्थिक स्थिरता और भविष्य के आर्थिक विकास के लिये राज्य सरकार की वित्तीय स्थिति भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितनी की केंद्र सरकार की वित्तीय स्थिति।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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