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ग्रेटर टिपरालैंड: त्रिपुरा

  • 04 Dec 2021
  • 7 min read

प्रिलिम्स के लिये:  

ग्रेटर टिपरालैंड,संविधान का अनुच्छेद 2 और 3, त्रिपुरा के आदिवासी संगठन

मेन्स के लिये: 

त्रिपुरा के आदिवासी संगठन,ग्रेटर टिपरालैंड की मांग का कारण तथा समाधान

चर्चा में क्यों?

हाल ही में त्रिपुरा में कई आदिवासी संगठनों ने क्षेत्र में स्वदेशी समुदायों के लिये एक अलग राज्य ग्रेटर टिपरालैंड की मांग के लिये हाथ मिलाया है।

  • टिपरा (TIPRA) मोथा (टिपरा इंडिजिनस प्रोग्रेसिव रीजनल अलायंस) और IPFT (इंडिजिनस पीपल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा) ने इस उद्देश्य के लिये एक राजनीतिक दलों का गठन किया है

Tripura

प्रमुख बिंदु: 

  • मांग:
    • पार्टियाँ उत्तर-पूर्वी राज्य के स्थानीय समुदायों के लिये 'ग्रेटर टिपरालैंड' के रूप में एक अलग राज्य की मांग कर रही हैं।
    • वे चाहते हैं कि केंद्र संविधान के अनुच्छेद 2 और 3 के तहत अलग राज्य बनाए।
      • त्रिपुरा में 19 अधिसूचित अनुसूचित जनजातियों में त्रिपुरी (तिप्रा और टिपरास) सबसे बड़ी है।
      • 2011 की जनगणना के अनुसार, राज्य में कम-से-कम 5.92 लाख त्रिपुरी हैं, इसके बाद ब्रू या रियांग (1.88 लाख) और जमातिया (83,000) हैं।

अनुच्छेद 2 और 3: 

  • अनुच्छेद 2: संसद कानून बनाकर नए राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की स्थापना ऐसे नियमों और शर्तों पर कर सकती है, जो वह ठीक समझे।
    • हालाँकि संसद कानून पारित करके एक नया केंद्रशासित प्रदेश नहीं बना सकती है, यह कार्य केवल संवैधानिक संशोधन के माध्यम से ही किया जा सकता है।
    • सिक्किम जैसे राज्य (पहले भारत के भीतर नहीं) अनुच्छेद 2 के तहत देश का हिस्सा बनाया गया है।
  • अनुच्छेद 3: इसके तहत संसद को नए राज्यों के गठन और मौजूदा राज्यों के परिवर्तन से संबंधित कानून बनाने का अधिकार दिया गया है।
  • तात्कालिक कारण:
    • राजनीति में विकास मंथन के पीछे के दो प्रमुख कारण टिपरा मोथा के उदय और वर्ष 2023 की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनाव हैं।
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
    • त्रिपुरा 13वीं शताब्दी के अंत से वर्ष 1949 में भारत सरकार के साथ विलय पर हस्ताक्षर करने तक माणिक्य वंश द्वारा शासित एक राज्य था।
    • यह मांग राज्य की जनसांख्यिकी में बदलाव के संबंध में स्वदेशी समुदायों की चिंता से उपजी है जिसने उन्हें अल्पसंख्यक बना दिया है। 
    • यह वर्ष 1947 से वर्ष 1971 के मध्य तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान से बंगालियों के विस्थापन के कारण हुआ।
    • त्रिपुरा में आदिवासियों की जनसंख्या वर्ष 1881 के 63.77% से घटकर वर्ष 2011 तक  31.80% हो गई थी। 
    • बीच के दशकों में जातीय संघर्ष और उग्रवाद ने राज्य को जकड़ लिया जो बांग्लादेश के साथ लगभग 860 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करता है।. 
    • संयुक्त मंच ने यह भी बताया है कि स्वदेशी लोगों को न केवल अल्पसंख्यक में बदल दिया गया है, बल्कि माणिक्य वंश के अंतिम राजा बीर बिक्रम किशोर देबबर्मन द्वारा उनके लिये आरक्षित भूमि से भी उन्हें बेदखल कर दिया गया है।
  • इस मुद्दे के समाधान के लिये पहल:
    • त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त ज़िला परिषद:
      • त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त ज़िला परिषद (TTAADC) का गठन वर्ष 1985 में संविधान की छठी अनुसूची के तहत आदिवासी समुदायों के अधिकारों एवं सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने और विकास सुनिश्चित करने के लिये किया गया था। 
        • 'ग्रेटर टिपरालैंड' एक ऐसी स्थिति की परिकल्पना करता है जिसमें संपूर्ण TTAADC क्षेत्र एक अलग राज्य होगा। यह त्रिपुरा के बाहर रहने वाले लोगों और अन्य आदिवासी समुदायों के अधिकारों को सुरक्षित करने के लिये समर्पित निकायों का भी प्रस्ताव करता है।
      • TTAADC, जिसके पास विधायी और कार्यकारी शक्तियाँ हैं, राज्य के भौगोलिक क्षेत्र के लगभग दो-तिहाई हिस्से को कवर करता है।
      • परिषद में 30 सदस्य होते हैं जिनमें से 28 निर्वाचित होते हैं जबकि दो राज्यपाल द्वारा मनोनीत होते हैं।
    • आरक्षण:
      • साथ ही राज्य की 60 विधानसभा सीटों में से 20 अनुसूचित जनजाति के लिये आरक्षित हैं।

उत्तर पूर्व की अन्य मांगें

आगे की राह

  • राजनीतिक विचारों के बजाय आर्थिक और सामाजिक व्यवहार्यता को प्राथमिकता दी जानी चाहिये।
  • निरंकुश मांगों की जाँच के लिये कुछ स्पष्ट मानदंड और सुरक्षा उपाय होने चाहिये।
  • धर्म, जाति, भाषा या बोली के बजाय विकास, विकेंद्रीकरण और शासन जैसी लोकतांत्रिक चिंताओं को नए राज्य की मांगों को स्वीकार करने के लिये वैध आधार देना बेहतर है।
  • इसके अलावा विकास और शासन की कमी जैसी मूलभूत समस्याओं जैसे- सत्ता का संकेंद्रण, भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अक्षमता आदि का समाधान किया जाना चाहिये।

स्रोत : इंडियन एक्सप्रेस

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