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महत्त्वपूर्ण संस्थान/संगठन

भारतीय राजनीति

स्वायत्त ज़िला परिषद

  • 12 Jun 2020
  • 22 min read

संदर्भ

जनवरी 2019 में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा पूर्वोत्तर राज्यों- असम, मेघालय, मिज़ोरम और त्रिपुरा में ज़िला परिषदों की स्वायत्तता तथा वित्तीय संसाधनों एवं कार्यकारी शक्तियों में वृद्धि के लिये के लिये अनुच्छेद 280 तथा संविधान की छठी अनुसूची में संशोधन को मंज़ूरी दी।

  • मेघालय के तीन स्वायत्त ज़िला परिषदों (Autonomous District Councils- ADCs) ने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (National Commission for Scheduled Tribes- NCST) से आग्रह किया कि वह राज्य सरकार को उसके मामलों में हस्तक्षेप न करने निर्देश दे।        
  • तीनों परिषदों ने 15वें वित्त आयोग को इस बात से भी अवगत कराया कि उनके द्वारा एकत्रित राजस्व से उनके दिन-प्रतिदिन की प्रशासनिक गतिविधियों और प्राथमिक कर्त्तव्यों (जैसा कि छठी अनुसूची में परिकल्पित है) की पूर्ति ही कठिनाई से हो पाती है तथा विकास कार्यों के लिये उनके पास कोई धनराशि शेष नहीं बचती।

पृष्ठभूमि

भारत की जनसंख्या में 100 मिलियन जनजातीय आबादी शामिल है जिन्हें संवैधानिक रूप से दो अलग-अलग उपबंधों– पाँचवीं अनुसूची और छठी अनुसूची, के माध्यम से संबोधित किया गया है।        

  • पाँचवीं और छठी अनुसूचियों पर संविधान सभा में 5-7 सितंबर, 1949 को चर्चा की गई थी उसके बाद फिर इसे पारित किया गया था।
  • पाँचवीं अनुसूची नौ राज्यों में विद्यमान जनजातियों के बहुमत पर लागू होती है जबकि छठी अनुसूची चीन और म्याँमार की सीमा से लगे उत्तर-पूर्वी राज्यों के जनजातीय क्षेत्रों को दायरे में लेती है।
  • छठी अनुसूची जनजातीय समुदायों को पर्याप्त स्वायत्तता प्रदान करती है। असम, त्रिपुरा, मेघालय और मिज़ोरम छठी अनुसूची के तहत ही स्वायत्त क्षेत्र हैं।        
  • छठी अनुसूची के अंतर्गत ज़िला परिषद (District Council) और क्षेत्रीय परिषद (Regional Council) विधान निर्माण की वास्तविक शक्ति रखते हैं; विभिन्न विधायी विषयों पर उनका मंतव्य महत्त्वपूर्ण होता है; विकास, स्वास्थ्य-देखभाल, शिक्षा, सड़क संबंधी योजनाओं के लिये भारत की संचित निधि से अनुदान प्राप्त करते हैं; और राज्य नियंत्रण के प्रति एक विनियामक शक्ति रखते हैं।        
  • हस्तानांतरण (Devolution), विसंकेंद्रण (Deconcentration) एवं शक्ति-वितरण (Divestment) का अधिदेश उनके रीति-रिवाजों के संरक्षण, बेहतर आर्थिक विकास और इन सबसे महत्त्वपूर्ण उनकी नृजातीय सुरक्षा को सुनिश्चित करता है।        
  • यद्यपि छठी अनुसूची की अपनी कमियाँ भी हैं जैसे- विधि-व्यवस्था का भंग होना, चुनावों का आयोजन न होना, सशक्तीकरण के बजाय बहिर्वेशन (Extrapolation) की स्थिति तथा राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में जनजातियों को बहुत आवश्यक सुरक्षा प्रदान प्राप्त नहीं हो पाती और वे सरकारी वित्तपोषण पर निर्भर बने रहते हैं। 

छठी अनुसूची (Sixth Schedule)

  • संविधान की छठी अनुसूची चार पूर्वोत्तर राज्यों- असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम के जनजाति क्षेत्रों के प्रशासन के संबंध में अनुच्छेद 244 के अनुरूप व्यवहार करती है।        
  • राज्यपाल को ज़िले के क्षेत्रों को बढ़ाने या घटाने अथवा स्वायत्त ज़िलों के नाम में परिवर्तन कर सकने की शक्ति प्राप्त है। यद्यपि संघ कार्यकारी का शक्तियाँ पाँचवीं अनुसूची में शामिल क्षेत्रों के प्रशासन तक विस्तारित हैं, लेकिन छठी अनुसूची में शामिल क्षेत्र राज्य के कार्यकारी प्राधिकार के अंतर्गत आते हैं।        
  • संसद या राज्य विधानमंडल के अधिनियम स्वायत्त ज़िलों और स्वायत्त क्षेत्रों पर लागू नहीं होते हैं अथवा निर्दिष्ट संशोधनों और अपवादों के साथ ही लागू होते हैं।        
  • इन स्वायत्त परिषदों को व्यापक दीवानी और आपराधिक न्यायिक शक्तियाँ भी प्रदान की गई हैं, जैसे वे ग्राम न्यायालय आदि की स्थापना कर सकते हैं। हालाँकि इन परिषदों का न्यायिक क्षेत्राधिकार संबंधित उच्च न्यायालय के न्यायिक क्षेत्राधिकार के अधीन होता है।
  • संविधान की छठी अनुसूची में 4 राज्यों के 10 स्वायत्त ज़िला परिषद शामिल हैं। जो इस प्रकार हैं: 
    • असम: बोडोलैंड प्रादेशिक परिषद, कार्बी आंगलोंग स्वायत्त परिषद और दीमा हसाओ स्वायत्त ज़िला परिषद।
    • मेघालय: गारो हिल्स स्वायत्त ज़िला परिषद, जयंतिया हिल्स स्वायत्त ज़िला परिषद और खासी हिल्स स्वायत्त ज़िला परिषद।
    • त्रिपुरा: त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त ज़िला परिषद।
    • मिज़ोरम: चकमा स्वायत्त ज़िला परिषद, लाई स्वायत्त ज़िला परिषद, मारा स्वायत्त ज़िला परिषद। 

प्रमुख समस्याएँ

  • कुछ अल्पसंख्यक जनजाति समूहों के लिये विशेष प्रावधान करने के बाद अन्य समूहों की ओर से भी छठी अनुसूची के तहत ऐसे प्रावधानों की माँग की जा रही है। इससे लोगों के बीच विषमता उत्पन्न हुई है और विभिन्न समूहों के बीच संघर्ष में भी वृद्धि हुई है।        
  • वित्तीय स्वायत्तता के संदर्भ में उत्तर-पूर्वी राज्यों के सभी ज़िला स्वायत्त परिषदों के सदस्य यह साझा दृष्टिकोण रखते हैं कि ये परिषद राज्य सरकारों की कृपा पर अधिकाधिक निर्भर हैं। स्वीकृत बजट और राज्य सरकार से प्राप्त धनराशि के बीच एक बड़ा अंतराल बना रहता है जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव इन जनजाति समुदायों के विकास पर प्रभाव पड़ा है।        
  • वे अपने क्षेत्र में विकासात्मक गतिविधियों के संबंध में निर्णय लेने के लिये भी राज्य सरकारों पर निर्भर रहे हैं।        
  • व्यापक भ्रष्टाचार के कारण इन क्षेत्रों में विकास एक अनुपस्थित धारणा ही रही है।        
  • राज्य सरकारों, योजना एवं विकास विभाग, पहाड़ी क्षेत्र विभाग और स्वायत्त परिषदों के बीच परस्पर समन्वय की कमी के कारण विकास कार्यों की गति उदासीन रही है।        
  • राज्य सरकार से प्राप्त और उपयोग किये गए धन की निगरानी, ​​मूल्यांकन एवं रिकॉर्ड रखने के लिये किसी कुशल समिति की अनुपस्थिति के कारण व्यापक भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला है तथा यह क्षेत्र अल्पविकास से पीड़ित रहा है।
  • मिज़ोरम के चकमा, लाई और मारा परिषदों के सदस्यों का विचार है कि केंद्र सरकार से प्राप्त वित्तपोषण पर्याप्त नहीं हैं साथ ही उनका यह भी मानना ​​है कि विभिन्न परिषदों को उनके पिछड़ेपन के आधार पर धनराशि दी जानी चाहिये, न कि जनसंख्या के आधार पर।        
  • राज्य सरकारें स्थिति को सही ठहराते हुए यह यह तर्क देती हैं कि ADCs इस क्षेत्र में जनजातीय पहचान की रक्षा करने की अपनी पारंपरिक भूमिकाओं पर कायम हैं और इस तरह की भूमिका राज्य को विभिन्न विकासात्मक गतिविधियों से दूर रखती है।        
  • वस्तुस्थिति यह भी है कि ADCs के पास करों और भूमि राजस्व के रूप में प्राप्त धनराशि बहुत कम होती है तथा अधिक धन के लिये उन्हें केंद्र सरकार पर निर्भर रहना पड़ता है।        
  • स्वायत्त परिषद में सदस्यों के प्रतिनिधित्व के संदर्भ में, बोडोलैंड प्रादेशिक परिषद एकमात्र परिषद है जिसमें 46 सदस्य हैं (जो उच्चतम प्रतिनिधित्व है) और यह एकमात्र परिषद है जिसमें गैर-जनजाति समुदाय के सदस्यों को भी प्रतिनिधित्व प्राप्त है।        
  • समय-समय पर विभिन्न स्वायत्त ज़िला परिषदों ने परिषद में सदस्यों की संख्या में वृद्धि की माँग की है।        
  • पंचायती राज व्यवस्था (जहाँ 73वें संशोधन द्वारा विभिन्न स्तरों पर महिलाओं के लिये सभी पंचायत सीटों में से एक तिहाई सीटों के आरक्षण की अनुमति दी गई है) के विपरीत पाँचवीं और छठी अनुसूचियों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व एवं लैंगिक समानता का कोई उल्लेख नहीं है। 
  • भूमि से संबंध ही जनजातियों या मूल निवासियों की पहचान का आधार है और भूमि एवं प्राकृतिक संसाधनों पर उनके नियंत्रण को बनाए रखे बिना उनकी संस्कृति तथा पहचान को संरक्षित नहीं किया जा सकता है, क्योंकि ये कारक काफी हद तक स्थानिक लोगों की जीवन शैली एवं संस्कृति का निर्धारण करते हैं।       
  • सामान्यतः जनजाति या स्थानिक संस्कृतियों में सामुदायिक भूमि स्वामित्व की परंपरा होती है और कुछ अन्य जनजातियाँ कबीले के स्वामित्व के साथ भूमि पर व्यक्तिगत अधिकार का पालन करती हैं, जबकि आधुनिक भूमि संबंध तथा औपचारिक कानून भूमि पर केवल व्यक्तिगत स्वामित्व को ही मान्यता देते हैं।        
  • औपनिवेशिक शासन के अधीन विकास के नाम पर अपने स्वार्थ के लिये भूमि को संपत्ति में बदलने की प्रक्रिया शुरू हुई। स्वतंत्रता के बाद अप्रवासियों और अन्य अधिवासियों को भूमि के वृहत हिस्से प्रदान किये गए।        
  • ज़िला परिषदों की स्वायत्तता और शक्ति स्वायत्त ज़िला परिषदों के कार्यकलाप को संचालित करने वाले अभिजात वर्ग के एक छोटे समूह के हाथों में होती है।        
  • सूक्ष्म स्तर पर विकासात्मक गतिविधियों की पहल करने और योजना निर्माण तथा उनकी निगरानी के मामले में ज़िला परिषद सदस्यों की ओर से अधिक रुचि-प्रदर्शन या प्रयास का अभाव ही नज़र आता है।
  • विकास प्रक्रिया और निर्णयन प्रक्रिया में स्थानीय हितधारकों की भागीदारी की अनुपस्थिति ने आम जनता को उनके लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित रखा है।
  • इसके अतिरिक्त, छठी अनुसूची ने राज्यपाल को अत्यधिक शक्तियाँ प्रदान की हैं। व्यक्तिगत विभिन्न स्वायत्त ज़िला परिषदों के सदस्यों का यह मत है कि राज्यपाल मंत्रियों के हाथों की कठपुतली मात्र होता है।
  • ADCs के कार्यकलाप में एक प्रमुख अंतराल ग्राम और क्षेत्र स्तर पर पारस्परिक विचार-विमर्श की कमी का है। कुशल ग्राम सभाओं या क्षेत्रीय परिषदों का प्रकट अभाव भी नज़र आता है।

सुझाव

  • सरकार एवं अन्य एजेंसियों को गैर अनुसूचित क्षेत्र की आबादी का विश्वास जीतने और उनमें सुरक्षा एवं संबद्धता की भावना लाने की आवश्यकता है।        
  • वर्तमान में जनजातीय समाज के अंदर जो परिवर्तन आए हैं उनके साथ पारंपरिक प्रथाओं और उपयोगों के बीच एक उचित समन्वय या समायोजन होना चाहिये।        
  • प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर गंभीरता से पुनर्विचार करने की आवश्यकता है, जहाँ वर्तमान में भी निर्णयन प्रक्रिया में महिलाओं की सीमित भागीदारी है और राज्य के गैर-आदिवासियों को भी बाहर रखा गया है।        
  • सृजित वित्त के संबंध में पर्याप्त उत्तरदायित्व एवं पारदर्शिता होनी चाहिये और इनका दुरुपयोग रोकने के लिये लेखा परीक्षण का कार्य नियंत्रक-महालेखा परीक्षक तथा लेखा महानियंत्रक जैसे अधिकारियों को सौंपा जाना चाहिये।        
  • पारंपरिक कानूनों का दस्तावेज़ीकरण और संहिताकरण एक आवश्यक कदम है जिसके माध्यम से जनजातीय सांस्कृतिक पहचान की सुरक्षा के छठी अनुसूची के वास्तविक उद्देश्य को पूरा किया जा सकता है।        
  • यह सुनिश्चित करने के उपाय किये जाने चाहिये कि स्वायत्त परिषदों के पास सुपरिभाषित विधान हों, जो ग्राम स्तर के निकायों की शक्तियों, सरकार द्वारा धनराशि के निर्गम, धन के आवंटन एवं उपयोग में पारदर्शिता आदि को स्पष्ट रूप से चिह्नित करते हों।        
  • पंचायती राज व्यवस्था की तरह स्वायत्त ज़िला परिषदों की वित्तीय स्थिति की लगातार समीक्षा के संबंध में सख्त कानून स्वायत्त ज़िला परिषदों की स्थिति को सुदृढ़ करेंगे।        
  • पंचायती राज प्रणाली की सफल अवधारणाओं के प्रवेश की माध्यम से ADCs का समावेशी विकास और क्षमता निर्माण किये जाने की आवश्यकता है।        
  • स्थानीय स्वशासन को सुदृढ़ एवं सशक्त बनाना जिसमें ग्राम और जनजाति परिषद भी शामिल होंगे।        
  • सिविल सोसाइटी निकायों का सशक्तीकरण स्वायत्त ज़िला परिषदों द्वारा विविध क्षेत्रों में की जा रही विकासात्मक गतिविधियों और प्रगति दर की निगरानी में अहम योगदान देगा।        
  • स्वशासन के साथ ही शासन के पारंपरिक स्वरूपों को भी प्रोत्साहन दिया जाना चाहिये।        
  • ADCs व्यवस्था को व्यापक और राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर एक बदलते विश्व के अनुकूल बनाने के लिये, इन संस्थानों में लैंगिक न्याय जैसे लोकतांत्रिक तत्त्वों को शामिल करने की आवश्यकता है।        
  • सकारात्मक परिणाम प्राप्त करने के लिये ADCs के सदस्यों को प्रशिक्षित किया जाना चाहिये, क्योंकि इसके सदस्यों का क्षमता निर्माण संस्था के बेहतर शासन के लिये महत्त्वपूर्ण है और इससे वे अपने उत्तरदायित्वों व कार्यकलापों के संबंध में अधिक सजग व सतर्क बनेंगे।
  • ADCs के कार्यकलाप में संशोधन किया जाना चाहिये ताकि वे अधिक उत्तरदायी बन सकें। इसके लिये एक उपबंध का प्रवेश कराया जाना चाहिये जो प्रमुख संस्थाओं में पारंपरिक प्रतिनिधित्व के साथ ग्राम सभाओं/निकायों के गठन को अनिवार्य बनाए।
  • ADCs द्वारा की जा रही गतिविधियों की निगरानी के लिये एक प्रभावी निगरानीकर्त्ता, जिसमें लोकायुक्त जैसी शक्तियाँ हों, के गठन को प्राथमिकता दी जानी चाहिये, क्योंकि इससे वित्त और अन्य विकासात्मक योजनाओं एवं गतिविधियों के विषयों में पारदर्शिता बनाए रखने में मदद मिलेगी।
  • सरकारों की ओर से नियमित व सुनिश्चित वित्तीय सहायता और एक कुशल निगरानी प्रणाली, दो प्रमुख कारक हैं जो इस तरह के प्रावधानों की सफलता के साथ-साथ अन्य हितधारकों की जागरूकता तथा सक्रिय भागीदारी को सुनिश्चित करेंगे।

आगे की राह

  • पिछले दशकों में ADCs आदिवासी पहचान को संरक्षित करने में कुछ हद तक सफल रहे हैं और उन कुछ जनजातियों के लिये राज्य का दर्जा (Statehood) प्राप्त किया जो भारत के उत्तर पूर्वी हिस्से में एक अलग राज्य के लिये संघर्ष कर रहे थे।
  • यद्यपि वर्तमान संदर्भ में जहाँ राज्यों में विकास, प्रशासनिक ढाँचों के उन्नयन, कल्याणकारी कार्यक्रमों एवं नीतियों में विभिन्न बदलाव देखे जा रहे हैं और जनसांख्यिकीय आकार में भी बदलाव आ रहा है लेकिन यही समय है जब स्थानीय समुदायों के बदलते तंत्र और उनकी मांगों का सामना करने के लिये छठी अनुसूची के तहत प्रावधानों का विस्तार भी आवश्यक है।
  • प्रचलित ढाँचों/सेटअप के तहत, पारंपरिक निकायों की न केवल मौजूदा शक्तियाँ और कार्य अत्यंत सीमित हैं बल्कि संसाधनों के आवंटनों तक उनकी पहुँच की स्थिति भी बहुत खराब है।
  • भारत के अन्य हिस्सों में जनजातियों को विकास की समस्याओं के साथ-साथ पहचान का भी सामना करना पड़ता है। इसलिये यह आवश्यक है भारत के अन्य हिस्सों में भी ऐसी प्रणालियों का विस्तार किया जाए।
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