भारतीय राजव्यवस्था
राज्यपाल का राज्य विधानमंडल को संबोधन
- 29 Jan 2026
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प्रारंभिक परीक्षा के लिये: राज्यपाल, अनुच्छेद 176, संविधान सभा, विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति,
मेन्स के लिये: राज्यपाल की संवैधानिक स्थिति और शक्तियाँ, अनुच्छेद 163 के तहत सहायता और सलाह का सिद्धांत, राज्यपाल-राज्य सरकार संबंध और संघवाद
चर्चा में क्यों?
हाल ही में तमिलनाडु के राज्यपाल ने अपने पारंपरिक अभिभाषण के दौरान राज्य विधानसभा से वॉकआउट कर दिया। इसी समय, केरल के राज्यपाल ने अपने अभिभाषण के कुछ अनुच्छेदों को हटा दिया। इन घटनाओं ने राज्यपाल के विवेकाधीन अधिकारों और अनुच्छेद 176 की गरिमा को लेकर बहस को पुनरुज्जीवित कर दिया है।
सारांश
- तमिलनाडु और केरल में विधानसभा अभिभाषण के दौरान राज्यपाल द्वारा किये गए हालिया वॉकआउट और कुछ अंशों को हटाने की घटनाओं ने अनुच्छेद 176 के तहत राज्यपाल के विवेकाधीन अधिकारों की सीमाओं और निर्वाचित सरकारों की प्रधानता पर संवैधानिक बहस को पुनरुज्जीवित कर दिया है।
- संवैधानिक प्रावधान, परंपराएँ और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय लगातार यह पुष्टि करते हैं कि राज्यपाल का अभिभाषण एक औपचारिक कार्यपालिका का कर्त्तव्य है, जिसे मंत्रिपरिषद की सलाह और अनुशंसा पर ही दिया जाना चाहिये, इसमें राज्यपाल की व्यक्तिगत विवेकाधीन भूमिका अत्यंत सीमित है।
संविधान में राज्यपाल की भूमिका कैसे परिकल्पित की गई है?
संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 176: यह प्रावधान करता है कि राज्यपाल प्रत्येक वर्ष के पहले सत्र के प्रारंभ में विधानसभा (और द्विसदनीय राज्यों में दोनों सदनों) को संबोधित करेगा, ताकि वह विधायिका को उसके आह्वान (सत्र बुलाए जाने) के कारणों से अवगत करा सके।
- यह अभिभाषण राज्यपाल का संवैधानिक कर्त्तव्य है और वस्तुतः निर्वाचित राज्य सरकार की नीतियों का वक्तव्य होता है, न कि राज्यपाल की व्यक्तिगत राय का।
- अनुच्छेद 175: यह राज्यपाल को राज्य की विधानसभा या दोनों सदनों को संबोधित करने तथा विशेष रूप से विधेयकों के संबंध में संदेश भेजने का अधिकार प्रदान करता है।
- यह अधिकार कार्यपालिका के कार्यक्षेत्र का हिस्सा है और इसे स्वतंत्र विवेकाधिकार नहीं माना जाता; यह मंत्रिपरिषद की सलाह और अनुशंसा के अधीन ही प्रयोग किया जाता है।
- अनुच्छेद 163: यह व्यवस्था करता है कि राज्यपाल, उन मामलों को छोड़कर जहाँ संविधान स्पष्ट रूप से विवेकाधिकार प्रदान करता है, मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही कार्य करेगा।
संविधान सभा की दृष्टि में राज्यपाल की भूमिका
- संविधान सभा ने राज्यपाल को एक संवैधानिक प्रमुख के रूप में परिकल्पित किया था, न कि एक सर्वसत्तावादी प्राधिकारी के रूप में; उसे कर्त्तव्यों से तो संपन्न किया गया, पर स्वतंत्र शक्तियाँ नहीं दी गईं।
- राज्यपाल से अपेक्षा की जाती है कि वह संपूर्ण राज्य की जनता के निष्पक्ष प्रतिनिधि के रूप में कार्य करे, न कि एक राजनीतिक अभिनेता की तरह।
राज्यपाल की भूमिका पर सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय:
- तमिलनाडु राज्य बनाम तमिलनाडु के राज्यपाल (2024): सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि राज्यपाल के विवेकाधीन अधिकारों का उपयोग इस प्रकार नहीं किया जा सकता कि वे निर्वाचित सरकार के कामकाज को रोकने, बाधित करने या निष्फल करने का साधन बन जाएँ।
- नबाम रेबिया बनाम उपाध्यक्ष (2016): पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह निर्णय दिया है कि राज्यपाल के विवेकाधीन अधिकार अत्यंत सीमित हैं और उनका स्पष्ट रूप से उल्लेख संविधान में किया गया है।
- शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1974): सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह प्रतिपादित किया कि राज्यपाल एक संवैधानिक प्रमुख होता है और संविधान द्वारा जहाँ स्पष्ट रूप से विवेकाधिकार प्रदान किया गया है, उन मामलों को छोड़कर उसे सभी विषयों में मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह के अनुसार ही कार्य करना चाहिये।
- न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि कार्यपालिका से जुड़े मामलों में राज्यपाल अपने व्यक्तिगत विवेक का प्रयोग नहीं कर सकता।
समिति की सिफारिशें
- सरकारिया आयोग (1988) की सिफारिशें: इसने बल देते हुए कहा कि राज्यपाल केंद्र सरकार का एजेंट नहीं होना चाहिये, बल्कि उसे सक्रिय राजनीति से दूर रहते हुए संघीय व्यवस्था की “कड़ी” (lynchpin) के रूप में कार्य करना चाहिये।
- पुंछी आयोग (2007) की सिफारिशें: आयोग ने अनुशंसा की कि राज्यपाल को ऐसे पदों (जैसे– विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति) से नहीं जोड़ा जाना चाहिये, जो उसे राजनीतिक विवादों में उलझा दें; बल्कि उसका ध्यान केवल अपने संवैधानिक कर्त्तव्यों तक सीमित रहना चाहिये।
राज्यपाल के विधानसभा संबोधन में विवेकाधिकार के संबंध में क्या तर्क हैं?
राज्यपाल के विवेकाधिकार के पक्ष में तर्क
- संवैधानिक शपथ (अनुच्छेद 159): राज्यपाल संविधान की रक्षा, सुरक्षा और संरक्षण करने की शपथ ग्रहण करते हैं और उसे ऐसी सामग्री पढ़ने के लिये बाध्य नहीं किया जा सकता जो असंवैधानिक, तथ्यात्मक रूप से गलत, देशद्रोही या संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ हो।
- असहमति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार: एक उच्च संवैधानिक प्राधिकरण के रूप में राज्यपाल केवल यांत्रिक कार्यकारी नहीं है और वह ऐसी सामग्री को स्वीकार करने से इनकार कर सकता है जो सीधे राज्यपाल के कार्यालय पर हमला करती हो।
- अनुच्छेद 175 और 176 राज्यपाल के संबोधन को अनिवार्य करते हैं, लेकिन स्पष्ट रूप से यह नहीं कहते कि राज्यपाल को इसे शब्दशः पढ़ना ही होगा, जिससे व्याख्यात्मक स्वतंत्रता बनी रहती है।
- इस संवैधानिक मौन को यह तर्क देने के लिये उद्धृत किया जाता है कि राज्यपाल का विवेकाधिकार पूरी तरह से समाप्त नहीं किया गया है।
- अनुच्छेद 175 और 176 राज्यपाल के संबोधन को अनिवार्य करते हैं, लेकिन स्पष्ट रूप से यह नहीं कहते कि राज्यपाल को इसे शब्दशः पढ़ना ही होगा, जिससे व्याख्यात्मक स्वतंत्रता बनी रहती है।
- केंद्र का प्रतिनिधि: संघ और राज्य के बीच संवैधानिक संबंध होने के आधार पर, यह तर्क दिया जाता है, कि राज्यपाल की ज़िम्मेदारी है कि वह ऐसे भाषणों को रोके जो राष्ट्रीय एकता या संघीय अखंडता हेतु जोखिम उत्पन्न करतें हैं।
- संस्थागत विरोधाभास को रोकना: यदि राज्यपाल के अभिभाषण में ऐसी बातें शामिल हों जो स्वयं उनके द्वारा पहले लिये गए संवैधानिक निर्णयों (जैसे कि विधेयकों पर सहमति देना, उन्हें सुरक्षित रखना या राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेजना) के ठीक विपरीत हों, तो इसे एक 'संस्थागत विरोधाभास' माना जा सकता है।
राज्यपाल के विवेकाधिकार के विपक्ष में तर्क:
- सहायता और परामर्श सिद्धांत (अनुच्छेद 163): भारत में अपनाए गए वेस्टमिंस्टर मॉडल के तहत, राज्यपाल केवल औपचारिक अध्यक्ष है। वास्तविक शक्ति निर्वाचित मंत्रिपरिषद के पास होती है, इसलिये राज्यपाल को उनके "सहायता और परामर्श" पर कार्य करना चाहिये।
- राज्यपाल के संबोधन की प्रकृति: यह संबोधन राज्य सरकार की नीतियों का प्रतिनिधित्व करता है, न कि राज्यपाल की व्यक्तिगत राय का। अभिभाषण की विषय-वस्तु में परिवर्तन करना या उसे अस्वीकार करना, शासन की जवाबदेही को संकट में डालता है और विधानमंडल के प्रति सरकार के उत्तरदायित्वों को अस्पष्ट बना देता है।
- संघीय ढाँचे का क्षरण: केंद्र द्वारा नियुक्त राज्यपाल द्वारा एकतरफा संशोधन या बहिष्कार राज्य की स्वायत्तता में हस्तक्षेप माना जाता है और संघीय संतुलन को बाधित करता है।
- संबोधन में विवेकाधिकार की अनुमति देने से विशेष रूप से विपक्ष शासित राज्यों में चुनी हुई नीतियों में बाधा डालने का अवसर मिल सकता है। इससे राज्यपाल की अपेक्षित तटस्थता प्रभावित होती है और संवैधानिक पदों में जनता का भरोसा कमज़ोर होता है।
- संसदीय लोकतंत्र के लिये खतरा: नियमित कार्यकारी कार्यों में विवेकाधिकार की अनुमति देने से एक समानांतर प्राधिकरण बनने का खतरा उत्पन्न होता है, जो ज़िम्मेदार सरकार के मूल सिद्धांत को कमज़ोर करता है।
- विधायी विशेषाधिकार और स्वायत्तता: राज्यपाल का संबोधन विधानमंडल की कार्यवाही का हिस्सा होता है।
- हस्तक्षेप से विधानमंडल के उस विशेषाधिकार का उल्लंघन हो सकता है, जिसके तहत वे सरकार की नीतियों पर सदन में बहस और अस्वीकृति कर सकते हैं, बजाय इसके कि इसे पूर्व-निर्धारित कार्यकारी निर्णय के माध्यम से रोका जाए।
- न्यायिक समाधान उपलब्ध: यदि किसी सामग्री को असंवैधानिक माना जाता है, तो उसका उचित समाधान न्यायिक समीक्षा के माध्यम से ही होना चाहिये, न कि राज्यपाल द्वारा एकतरफा अस्वीकृति के माध्यम से।
- संवैधानिक निर्णय का क्षेत्र न्यायालयों का है, व्यक्तिगत संवैधानिक प्राधिकरणों का नहीं।
आगे की राह
- परंपराओं का संहिताकरण: ब्रिटिश संसदीय प्रणाली की उन 'संवैधानिक परंपराओं' को, जिनके तहत सम्राट या रानी कभी भी सरकार द्वारा तैयार अभिभाषण से विचलित नहीं होते, या तो औपचारिक रूप से संहिताबद्ध किया जाना चाहिये या उनका सख्ती से अनुपालन सुनिश्चित किया जाना चाहिये।
- सर्वोच्च न्यायालय संवैधानिक मार्गदर्शन जारी कर सकता है, जिसमें स्पष्ट किया जाए कि राज्यपाल का संबोधन एक अनिवार्य संवैधानिक कर्त्तव्य है और इसमें कोई विवेकाधिकार नहीं है। इससे बार-बार होने वाले मुकदमों में कमी आएगी और राज्यों में असंगत प्रथाओं को रोका जा सकेगा।
- राज्यपालों के लिये प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण: नवनियुक्त राज्यपालों को संघीय ढाँचा, संसदीय परंपराएँ तथा न्यायिक निर्णयों पर अनिवार्य संवैधानिक प्रशिक्षण दिया जाना चाहिये। इससे उनके कर्त्तव्यों की स्पष्टता बढ़ेगी तथा संस्थागत टकराव कम होगा।
- रचनात्मक संवाद: मुख्यमंत्री और राज्यपाल को सार्वजनिक टकराव के बजाय सत्र शुरू होने से पहले मसौदा भाषण पर निजी परामर्श के माध्यम से "विश्वास अंतर" को कम करना चाहिये।
- समयबद्ध संवैधानिक संवाद तंत्र: एक औपचारिक, समयबद्ध ढाँचा होना चाहिये, जिसमें राज्यपाल को संबोधन पर किसी भी आपत्ति को निश्चित समय सीमा के भीतर लिखित रूप में संप्रेषित करना अनिवार्य हो।
- यदि इस अवधि के भीतर कोई उत्तर नहीं दिया जाता है, तो सहमति मान ली जानी चाहिये। इससे अनावश्यक विलंब समाप्त होगा, रणनीतिक मौन को रोका जा सकेगा और संवैधानिक प्रक्रियाएँ सुचारु रूप से सुनिश्चित होंगी।
निष्कर्ष
संवैधानिक बहस इस संतुलन पर केंद्रित है कि राज्यपाल का संविधान के प्रति शपथ-बंधित कर्त्तव्य और निर्वाचित कार्यकारी प्राधिकरण की प्रधानता के बीच कैसे संतुलन बनाया जाए। संवैधानिक प्रावधान, संसदीय परंपरा तथा सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय राज्यपाल के विधानसभा संबोधन में विवेकाधिकार को काफी हद तक सीमित करते हैं।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्र. “अनुच्छेद 176 के अंतर्गत राज्यपाल का अभिभाषण एक संवैधानिक कर्त्तव्य है, न कि विवेकाधीन शक्ति।” हाल के विवादों और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के आलोक में इसका परीक्षण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. संविधान का अनुच्छेद 176 क्या निर्धारित करता है?
यह प्रावधान करता है कि राज्यपाल प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र के आरंभ में राज्य विधानमंडल को संबोधित करेगा, जिसमें निर्वाचित सरकार की नीतिगत कार्यसूची प्रस्तुत की जाती है।
2. क्या विधानसभा में दिये जाने वाले अभिभाषण की विषय-वस्तु पर राज्यपाल का विवेकाधिकार होता है?
नहीं। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायिक दृष्टांतों के अनुसार यह एक कार्यपालिका संबंधी कार्य है, जिसे मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर ही किया जाता है।
3. सर्वोच्च न्यायालय का कौन-सा निर्णय राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों को सीमित करता है?
शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1974) के मामले में यह स्थापित किया गया कि राज्यपाल एक संवैधानिक प्रमुख है और कार्यपालिका मामलों में उसके पास सामान्य विवेकाधिकार नहीं होता।
4. हाल के राज्यपालों के कार्यों को संवैधानिक रूप से समस्याग्रस्त क्यों माना जा रहा है?
अभिभाषण के चयनात्मक अंशों को हटाना या उसे प्रस्तुत करने से इंकार करना मंत्रिमंडलीय उत्तरदायित्व, संघीय संतुलन और संसदीय परंपराओं को अप्रभावी बनाता है।
5. ऐसे द्वंद्वों को रोकने के लिये कौन-से सुधार सुझाए गए हैं?
परंपराओं का संहिताकरण, सरकारिया एवं पुंछी आयोग की सिफारिशों का पालन तथा राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों के बीच अधिक परामर्शात्मक संवाद।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रिलिम्स
प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2018)
- किसी राज्य के राज्यपाल के विरुद्ध उसकी पदावधि के दौरान किसी न्यायालय में कोई दांडिक कार्यवाही संस्थित नहीं की जाएगी।
- किसी राज्य के राज्यपाल की परिलब्धियाँ और भत्ते उसकी पदावधि के दौरान कम नहीं किये जाएंगे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1, न ही 2
उत्तर: (c)
प्रश्न. निम्नलिखित में से कौन-सी किसी राज्य के राज्यपाल को दी गई विवेकाधीन शक्तियाँ हैं? (2014)
1. भारत के राष्ट्रपति को राष्ट्रपति शासन अधिरोपित करने के लिये रिपोर्ट भेजना
2. मंत्रियों की नियुक्ति करना
3. राज्य विधानमंडल द्वारा पारित कतिपय विधेयकों को भारत के राष्ट्रपति के विचार के लिये आरक्षित करना
4. राज्य सरकार के कार्य संचालन के लिये नियम बनाना
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 1 और 3
(c) केवल 2, 3 और 4
(d) 1, 2, 3 और 4
उत्तर: (b)
प्रश्न. निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा एक सही है? (2013)
(a) भारत में एक ही व्यक्ति को एक ही समय में दो या अधिक राज्यों में राज्यपाल नियुक्त नहीं किया जा सकता
(b) भारत में राज्यों के उच्च न्यायालय के न्यायाधीश राज्य के राज्यपाल द्वारा नियुक्त किये जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किये जाते हैं
(c) भारत के संविधान में राज्यपाल को उसके पद से हटाने हेतु कोई भी प्रक्रिया अधिकथित नहीं है
(d) विधायी व्यवस्था वाले संघ राज्यक्षेत्र में मुख्यमंत्री की नियुक्ति उपराज्यपाल द्वारा, बहुमत समर्थन के आधार पर, की जाती है
उत्तर: (c)
मेन्स
प्रश्न. राज्यपाल द्वारा विधायी शक्तियों के प्रयोग की आवश्यक शर्तों का विवेचन कीजिये। विधायिका के समक्ष रखे बिना राज्यपाल द्वारा अध्यादेशों के पुनः प्रख्यापन की वैधता की विवेचना कीजिये। (2022)
प्रश्न. यद्यपि परिसंघीय सिद्धांत हमारे संविधान में प्रबल है और वह सिद्धांत संविधान के आधारिक अभिलक्षणों में से एक है, परंतु यह भी इतना ही सत्य है कि भारतीय संविधान के अधीन परिसंघवाद (फैडरलिज़्म) सशक्त केंद्र के पक्ष में झुका हुआ है। यह एक ऐसा लक्षण है जो प्रबल परिसंघवाद की संकल्पना के विरोध में है। चर्चा कीजिये। (2014)

