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शासन व्यवस्था

गूगल करेगा ऑनलाइन राजनीतिक विज्ञापनों को ट्रैक

  • 06 Sep 2018
  • 4 min read

चर्चा में क्यों?

गूगल जो डिजिटल विज्ञापन बाज़ार के एक बड़े हिस्से को नियंत्रित करता है, जल्द ही निर्वाचन आयोग को ऑनलाइन राजनीतिक विज्ञापन पर नज़र रखने में मदद करेगा।

प्रमुख बिंदु

  • गूगल एक विशाल तकनीकी तंत्र विकसित करेगा जो न केवल राजनीतिक विज्ञापनों के पूर्व-प्रमाणीकरण को सुनिश्चित करेगा बल्कि अपने प्लेटफार्मों पर विज्ञापनों से संबंधित किये गए व्यय के बारे में विवरण, प्राधिकरण के साथ साझा करेगा।
  • हाल ही में गूगल के प्रतिनिधि ने मीडिया प्लेटफॉर्म के विस्तार और विविधता को ध्यान में रखते हुए धारा 126 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के अन्य प्रावधानों में संभावित संशोधनों का पता लगाने के लिये स्थापित एक समिति से मुलाकात की थी।
  • गूगल के प्रतिनिधि ने आयोग को बताया कि कंपनी राजनीतिक विज्ञापनों को ट्रैक करेगी और यह सुनिश्चित करेगी कि वे निर्वाचन आयोग के मीडिया प्रमाणन और निगरानी समितियों द्वारा पूर्व-प्रमाणित हों।
  • उल्लेखनीय है कि निर्वाचन आयोग किसी व्यक्ति या संगठन द्वारा जारी राजनीतिक प्रकृति के विज्ञापनों के पूर्व प्रमाणीकरण के लिये नोडल निकाय है।

निर्वाचन आयोग

  • निर्वाचन आयोग एक स्थायी संवैधानिक निकाय है।
  • संविधान के अनुसार निर्वाचन आयोग की स्थापना 25 जनवरी, 1950 को की गई थी।
  • प्रारंभ में, आयोग में केवल एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त था। वर्तमान में इसमें एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो निर्वाचन आयुक्त होते हैं।
  • पहली बार दो अतिरिक्त आयुक्तों की नियुक्ति 16 अक्तूबर, 1989 को की गई थी लेकिन उनका कार्यकाल 01 जनवरी, 1990 तक ही चला।
  • उसके बाद 01 अक्तूबर, 1993 को दो अतिरिक्त निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की गई थी, तब से आयोग की बहु-सदस्यीय अवधारणा प्रचलन में है, जिसमें निर्णय बहुमत के आधार पर लिया जाता है।
  • किसी उम्मीदवार द्वारा विज्ञापन संबंधी कोई ऑर्डर दिये जाने पर गूगल को आवश्यक रूप से संभावित ग्राहकों से पूछना होगा, चाहे वे पूर्व-प्रमाणित हों।
  • इसके अलवा गूगल ने समिति को यह भी आश्वासन दिया है कि वह राजनीतिक विज्ञापनों की लागत की जानकारी साझा करने के लिये एक तंत्र स्थापित करेगा।
  • यह कदम व्यक्तिगत रूप से उम्मीदवारों द्वारा किये गए चुनावी खर्च की गणना में रिटर्निंग अधिकारियों की मदद करेगा।
  • इससे पूर्व निर्वाचन आयोग की समिति ने फेसबुक के साथ बैठकें की थीं, जिसने “आचार संहिता” के लागू होने के बाद 48 घंटे की अवधि के दौरान निर्वाचन मामलों से संबंधित किसी भी सामग्री को हटाने के लिये उपकरण विकसित करने पर भी सहमत व्यक्त की थी।
  • उल्लेखनीय है कि यह झूठी खबरों की जाँच करने और मतदान से संबंधित विज्ञापनों पर व्यय का विवरण साझा करने के तरीकों पर काम कर रहा है।
  • इसके साथ ही कर्नाटक विधानसभा चुनावों के दौरान फेसबुक ने भारतीय तथ्य-जाँच एजेंसी, बूम लाइव के साथ करार किया, जिसने "झूठी  खबर" के लगभग 50 से अधिक मामलों की पुष्टि की थी।
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