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अंतर्राष्ट्रीय संबंध

यूरोपीय संघ और हिंद-प्रशांत क्षेत्र

  • 21 Apr 2021
  • 7 min read

चर्चा में क्यों?

हाल ही में यूरोपीय संघ (European Union) ने हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में सहयोग के लिये अपने रणनीतिक निष्कर्ष को मंजूरी प्रदान कर दी है।

  • यूरोपीय संघ की यह प्रतिबद्धता दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है, जो लोकतंत्र, मानवाधिकार, कानून के शासन और अंतर्राष्ट्रीय कानून के सम्मान को बनाए रखने पर आधारित होगी।
  • हिंद-प्रशांत अफ्रीका के पूर्वी तट से लेकर प्रशांत के द्वीपीय राज्यों तक का क्षेत्र है।

Indo-Pacific-Region

प्रमुख बिंदु

आवश्यकता:

  • इस क्षेत्र में उत्पन्न भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा के कारण व्यापार और आपूर्ति शृंखलाओं के साथ-साथ तकनीकी, राजनीतिक तथा सुरक्षा क्षेत्रों में भी तनाव बढ़ा है।
  • इस क्षेत्र में मानवाधिकारों को भी चुनौती दी जा रही है। इन घटनाओं से इस क्षेत्र की स्थिरता और सुरक्षा के लिये खतरा बढ़ता जा रहा है, जिसका यूरोपीय संघ के हितों पर सीधे प्रभाव पड़ता है।

उद्देश्य:

  • इस क्षेत्र में बढ़ती चुनौतियों और तनाव के समय क्षेत्रीय स्थिरता, सुरक्षा, समृद्धि तथा स्थायी विकास में योगदान देना।
  • आसियान (ASEAN) को केंद्र में रखकर नियम-आधारित बहुपक्षवाद को बढ़ावा देना, जिस पर भारत द्वारा भी बल दिया गया।

रणनीति की मुख्य विशेषताएँ:

  • कोविड-19:
    • यूरोपीय संघ कोविड-19 महामारी के कारण उत्पन्न आर्थिक और मानव प्रभावों को कम करने के लिये तथा समावेशी एवं स्थायी सामाजिक-आर्थिक सुधार सुनिश्चित करने हेतु मिलकर काम करेगा।
  • स्वतंत्र और निष्पक्ष व्यापार:
    • यूरोपीय संघ का इस क्षेत्र के प्रति दृष्टिकोण और संलग्नता "नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय आदेश के साथ-साथ व्यापार और निवेश, पारस्परिकता, जलवायु परिवर्तन से निपटने तथा कनेक्टिविटी का समर्थन करने के लिये एक खुला एवं निष्पक्ष वातावरण को बढ़ावा देना है।
    • यूरोपीय संघ की व्यापार साझेदारी का उद्देश्य ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और न्यूज़ीलैंड के साथ मुक्त व्यापार समझौतों का समाधान करना तथा चीन के साथ निवेश पर व्यापक समझौते की दिशा में कदम उठाना होगा।
    • यह भारत के साथ आर्थिक संबंधों को अधिक से अधिक मज़बूत करने के अपने प्रयास को भी जारी रखेगा।
  • सुरक्षा और रक्षा:
    • यह समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, उभरती हुई प्रौद्योगिकियों, आतंकवाद जैसे संगठित अपराधों से निपटने के लिये सुरक्षा और रक्षा क्षेत्रों में साझेदारी विकसित करना जारी रखेगा।
    • इसने यूरोपीय संघ के साथ संचार के सुरक्षित समुद्री गलियारों में योगदान करने के लिये दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में अपने क्रिमारियो (CRIMARIO- असुरक्षित समुद्री मार्ग) के भौगोलिक दायरे का विस्तार करने का निर्णय लिया है।
    • CRIMARIO:
      • यूरोपीय संघ ने वर्ष 2015 में क्रिमारियो (Critical Maritime Route Wider Indian Ocean- CRIMARIO) परियोजना हिंद महासागर में समुद्री सुरक्षा और सुरक्षा में सुधार के लिये लॉन्च की थी, जिसके अंतर्गत पूर्वी अफ्रीका के कुछ चयनित देशों और द्वीप समूहों पर विशेष ध्यान दिया गया था। इस परियोजना का उद्देश्य इस क्षेत्र के देशों का उनके समुद्री परिस्थितिजन्य जागरूकता (Maritime Situational Awareness) में वृद्धि करने हेतु समर्थन करना है।

भारत की भूमिका:

  • भारत और यूरोप द्वारा बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा, शक्ति प्रतिद्वंद्विता, बहुपक्षीय आदेश और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों को चुनौती देने वाली एकतरफा क्रियाकलाप, साझा की गई कुछ सामान्य चिंताएँ हैं।
  • भारत और यूरोपीय संघ अपने सामरिक संबंधों और अन्य परस्पर जुड़े लाभ के क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करके हिंद-प्रशांत में एक खुले, मुक्त, समावेशी और नियम आधारित आदेश को लागू कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
  •  हिंद-प्रशांत क्षेत्र में यूरोपीय शक्तियों के साथ भारत की हाल की कुछ पहलें:
    • हिंद महासागर रिम एसोसिएशन (Indian Ocean Rim Association - IORA) में फ्राँस की सदस्यता के लिये भारत का समर्थन।
    •  भारत ने हिंद-प्रशांत में एक बड़ी भूमिका निभाने के लिये यूरोपीय देशों का समर्थन किया है। भारत ने हिंद-प्रशांत में एक नई भू-राजनैतिक तंत्र के निर्माण में जर्मनी और नीदरलैंड के हितों का समर्थन किया है।
  • भारत और यूरोपीय संघ कुछ महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों जैसे- समुद्री डकैती, आतंकवाद, नीली अर्थव्यवस्था, समुद्री प्रौद्योगिकी आदि में एक साथ मिलकर काम और सहयोग कर सकते हैं।

आगे की राह

  • यह अवधारण तेज़ी से बढ़ रही है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में यूरोपीय देशों को एक बड़ी भूमिका निभाने की आवश्यकता है, क्योंकि इन देशों का सामरिक और आर्थिक हितों को हिंद-प्रशांत क्षेत्र से जोड़कर देखा जाता है।
  • इस क्षेत्र में हितों और साझा मूल्यों के बढ़ते अभिसरण से भारत-यूरोपीय संघ के सहयोग को मजबूत बनाने, स्थिरता बनाए रखने और सहकारी तरीके से आर्थिक संवृद्धि को समर्थन देने की ज़रूरत है।

स्रोत: द हिंदू

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