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चुनावी बाॅण्ड

  • 01 Aug 2022
  • 7 min read

प्रिलिम्स के लिये:

चुनावी बॉण्ड, राजनीतिक दल, लोगों का प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951

मेन्स के लिये:

चुनावी प्रक्रिया पर चुनावी बॉण्ड का प्रभाव, नीतियों के निर्माण और उनके कार्यान्वयन से उत्पन्न मुद्दे

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने डेटा रिपोर्टिंग साझा की जिसमें बताया गया है कि चुनावी बॉण्ड (EB) के माध्यम से राजनीतिक दलों को दान की गई राशि 10,000 करोड़ रुपए का आँकड़ा पार कर चुकी है।

  • जुलाई 2022 में आयोजित चुनावी बॉण्ड की 21वीं बिक्री में पार्टियों को चुनावी बॉण्ड खरीद से 5 करोड़ रुपए मिले।
  • पार्टियों द्वारा एकत्र की गई कुल राशि वर्ष 2018 में चुनावी बॉण्ड योजना शुरू होने के बाद से 10,246 करोड़ रुपए हो गई है।

चुनावी बॉण्ड:

  • परिचय:
    • भारतीय स्टेट बैंक इन बॉण्ड्स को जारी करने और भुनाने (Encash) के लिये अधिकृत बैंक है।
    • चुनावी बॉण्ड दाताओं द्वारा गुप्त रूप से खरीदे जाते हैं और ये बॉण्ड जारी करने की तारीख से पंद्रह दिनों तक वैध रहते हैं।
    • ऋण साधनों के रूप में इन्हें दानदाताओं द्वारा बैंक से खरीदा जा सकता है और राजनीतिक दल उन्हें भुना सकते हैं।
    • इन्हें केवल एक पात्र राजनीतिक पार्टी द्वारा बैंक के अपने खाते में जमा करके भुनाया जा सकता है।
    • चुनावी बॉण्ड SBI द्वारा बिना किसी अधिकतम सीमा के 1,000 रुपए, 10,000 रुपए, 1 लाख रुपए, 10 लाख रुपए और 1 करोड़ रुपए के गुणकों में जारी किये जाते हैं।
    • बॉण्ड किसी भी व्यक्ति (जो भारत का नागरिक है) द्वारा जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्तूबर के महीनों में प्रत्येक दस दिनों की अवधि हेतु खरीद के लिये उपलब्ध होते हैं, जैसा कि केंद्र सरकार द्वारा निर्दिष्ट किया गया है।
  • पात्रता:
    • केवल लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29 ए के तहत ऐसे पंजीकृत राजनीतिक दल जिन्होंने लोकसभा या विधानसभा के पिछले आम चुनाव में डाले गए वोटों का कम-से-कम 1% वोट प्राप्त किया है, वे चुनावी बॉण्ड प्राप्त करने के लिये पात्र हैं।

चुनावी बॉण्ड भारत के लिये चुनौती का विषय:

  • मूल विचार के विपरीत:
    • चुनावी बॉण्ड योजना की मुख्य आलोचना यह की जाती है कि यह अपने मूल विचार यानी चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता लाने के ठीक विपरीत काम करता है।
      • उदाहरण के लिये आलोचकों का तर्क है कि चुनावी बॉण्ड की गुमनामी केवल जनता और विपक्षी दलों तक की सीमित होती है।
  • जबरन वसूली की संभावना:
    • चूँकि इस तरह के बॉण्ड सरकारी स्वामित्व वाले बैंकों (SBI) के माध्यम से बेचे जाते हैं, ऐसे में कई आलोचकों का मानना है कि सरकार इसके माध्यम से यह जान सकती है कि कौन लोग विपक्षी दलों को वित्तपोषण प्रदान कर रहे हैं।
      • परिणामस्वरूप यह प्रकिया केवल तत्कालीन सरकार को ही धन उगाही की अनुमति देती है और इस प्रकार से सत्ताधारी पार्टी को अनुचित लाभ प्रदान करती है।
  • लोकतंत्र के लिये चुनौती:
    • वित्त अधिनियम 2017 में संशोधन के माध्यम से केंद्र सरकार ने राजनीतिक दलों को चुनावी बॉण्ड के ज़रिये प्राप्त राशि का खुलासा करने से छूट दी है।
      • इसका मतलब है कि मतदाता यह नहीं जान पाएंगे कि किस व्यक्ति, कंपनी या संगठन ने किस पार्टी को और किस हद तक वित्तपोषित किया है।
    • हालाँकि प्रतिनिधि लोकतंत्र में नागरिक अपना वोट उन्हें देतें हैं जो संसद में उनका प्रतिनिधित्व करेंगे।
  • ‘जानने के अधिकार’ से समझौता:
  • स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के खिलाफ:
    • चुनावी बॉण्ड नागरिकों को इस संदर्भ में कोई विवरण नहीं देते हैं।
    • उक्त गुमनामी उस समय की सरकार पर लागू नहीं होती है, जो कि भारतीय स्टेट बैंक (SBI) से डेटा की मांग करके दाता के विवरण तक पहुँच सकती है।
    • इसका मतलब यह है कि सत्ता में बैठी सरकार इस जानकारी का लाभ उठा सकती है और स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव को बाधित कर सकती है।
  • क्रोनी कैपिटलिज़्म:
    • चुनावी बॉण्ड योजना राजनीतिक चंदे पर पहले से मौजूद सभी सीमाओं को हटा देती है और प्रभावी रूप से अच्छे संसाधन वाले निगमों को चुनावों के लिये धन देने की अनुमति देती है जिससे क्रोनी कैपिटलिज़्म का मार्ग प्रशस्त होता है।
    • क्रोनी कैपिटलिज़्म एक आर्थिक प्रणाली है जो उद्योगपतियों और सरकारी अधिकारियों के बीच घनिष्ठ, पारस्परिक रूप से लाभप्रद संबंधों की विशेषता है।

आगे की राह

  • भ्रष्टाचार के दुष्चक्र को तोड़ने और लोकतांत्रिक राजनीति की गुणवत्ता की कमी के लिये साहसिक सुधारों के साथ-साथ राजनीतिक वित्तपोषण के प्रभावी विनियमन की आवश्यकता है।
  • संपूर्ण शासनतंत्र को अधिक जवाबदेह और पारदर्शी बनाने हेतु मौजूदा कानूनों में खामियों को दूर करना आवश्यक है।
  • मतदाता जागरूकता अभियान पर्याप्त बदलाव लाने में भी मदद कर सकते हैं।
    • यदि मतदाता उन उम्मीदवारों और पार्टियों को अस्वीकार करते हैं जो उन परअधिक खर्च करते हैं या उन्हें रिश्वत देते हैं तो इससे लोकतंत्र एक कदम और आगे बढ़ेगा।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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