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सीमा पार दिवालियान की कार्यवाही के लिये मसौदा रूपरेखा

  • 29 Nov 2021
  • 9 min read

प्रिलिम्स के लिये: 

दिवाला और दिवालियापन संहिता, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार कानून पर संयुक्त राष्ट्र आयोग, UNCITRAL मॉडल कानून

मेन्स के लिये:

सीमा पार दिवालियापन की कार्यवाही के लिये मसौदा रूपरेखा

चर्चा में क्यों?

हाल ही में कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय (MCA) ने दिवाला और दिवालियापन संहिता (IBC) के तहत UNCITRAL (अंतर्राष्ट्रीय व्यापार कानून पर संयुक्त राष्ट्र आयोग) मॉडल के आधार पर सीमा पार दिवाला कार्यवाही के लिये एक मसौदा ढाँचा प्रकाशित किया है।

  • इसे कॉर्पोरेट देनदारों के साथ-साथ व्यक्तिगत गारंटर दोनों के लिये लागू करने का प्रस्ताव है।
  • एक व्यक्तिगत गारंटर वह व्यक्ति या संस्था है जो ऋण चुकाने में विफल किसी अन्य व्यक्ति के ऋण के भुगतान का वादा करता है।

प्रमुख बिंदु

  • परिचय:
    • सीमा पार दिवाला कार्यवाही:
      • यह कई न्यायालयों में संपत्ति और देनदारियों वाली संकटग्रस्त कंपनियों के समाधान के लिये प्रासंगिक है।
      • मोटे तौर पर सीमा पार दिवाला प्रक्रिया उन देनदारों से संबंधित है जिनकी विदेशों में संपत्ति और लेनदार हैं।
      • सीमा पार दिवाला कार्यवाही के लिये ढाँचा ऐसी कंपनी की विदेशी संपत्ति के स्थान, लेनदारों और उनके दावों की पहचान तथा दावों के भुगतान के साथ-साथ विभिन्न देशों में अदालतों के बीच समन्वय की प्रक्रिया की अनुमति देता है।
      • पिछले कुछ दशकों के दौरान विशेष रूप से UNCITRAL मॉडल कानून के तत्त्वावधान में विभिन्न न्यायालयों ने सीमा पार दिवाला मुद्दों से निपटने के लिये मज़बूत संस्थागत व्यवस्था की आवश्यकता पर बल दिया है।
    • आईबीसी में वर्तमान स्थिति:
      • जबकि विदेशी लेनदार एक घरेलू कंपनी के खिलाफ दावा कर सकते हैं, आईबीसी वर्तमान में अन्य देशों में किसी भी दिवाला कार्यवाही की स्वत: मान्यता की अनुमति नहीं देती है।
  • महत्त्व:
    • IBC में सीमा पार दिवाला अध्याय को शामिल करना एक बड़ा कदम होगा और यह कानून को परिपक्व क्षेत्राधिकारों के बराबर लाएगा।
    • यह भारतीय फर्मों को विदेशी कंपनियों से अपने बकाया का दावा करने में सक्षम बनाएगा, जबकि विदेशी लेनदारों को भारतीय कंपनियों से ऋण वसूल करने की अनुमति देगा।
    • यह भारतीय बैंकों की विदेशी शाखाओं को भारत में अपना बकाया वसूल करने में मदद करेगा।
    • यह भारत में दिवाला समाधान के विचार में एक घरेलू कॉर्पोरेट देनदार की विदेशी संपत्ति को भी लाएगा और तनावग्रस्त संपत्तियों के समाधान में होने वाली देरी से बचाएगा।
  • UNCITRAL मॉडल कानून:
    • UNCITRAL मॉडल सीमा पार दिवाला मुद्दों से निपटने के लिये सबसे व्यापक रूप से स्वीकृत कानूनी ढाँचा है।
      • इसे ब्रिटेन, अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर समेत 49 देशों ने अपनाया है।
    • मॉडल कानून सीमा पार दिवाला के चार प्रमुख सिद्धांतों से संबंधित है:
      • डिफॉल्ट करने वाले देनदार के खिलाफ घरेलू दिवाला कार्यवाही में भाग लेने या शुरू करने के लिये विदेशी दिवाला पेशेवरों और विदेशी लेनदारों तक सीधी पहुँच।
      • विदेशी कार्यवाही की मान्यता और उपचार का प्रावधान।
      • घरेलू और विदेशी अदालतों तथा घरेलू व विदेशी दिवाला व्यवसायियों के बीच सहयोग।
      • विभिन्न देशों में दो या दो से अधिक समवर्ती दिवालिया कार्यवाहियों के बीच समन्वय। इस संबंध में मुख्य कार्यवाही ‘सेंटर ऑफ मैन इंटरेस्ट’ (COMI) की अवधारणा द्वारा निर्धारित की जाती है।
        • किसी कंपनी के लिये ‘सेंटर ऑफ मैन इंटरेस्ट’ का निर्धारण इस आधार पर किया जाता है कि कंपनी अपने व्यवसाय को नियमित आधार पर कहाँ संचालित करती है और इसके पंजीकृत कार्यालय का स्थान क्या है।
    • यह राज्यों को मध्यस्थता प्रक्रिया संबंधी कानूनों में सुधार एवं आधुनिकीकरण में सहायता करने के लिये डिज़ाइन किया गया है, ताकि अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक मध्यस्थता की विशिष्ट आवश्यकताओं को ध्यान में रखा जा सके।
  • भारतीय फ्रेमवर्क और मॉडल कानून के बीच अंतर:
    • जो देश ‘UNCITRAL’ के मॉडल कानून को अपनाते हैं, वे अपनी घरेलू आवश्यकताओं के अनुरूप कुछ बदलाव करते हैं।
    • ‘भारतीय सीमा पार दिवालिया फ्रेमवर्क वित्तीय सेवा प्रदाताओं को सीमा पार दिवाला कार्यवाही के अधीन होने से बाहर करता है, वहीं कई देश ‘सीमा पार दिवालिया फ्रेमवर्क के प्रावधानों से बैंकों और बीमा जैसी महत्त्वपूर्ण वित्तीय सेवाएँ प्रदान करने वाली कंपनियों को छूट देते हैं।’
    • प्री-पैक इन्सॉल्वेंसी रिज़ॉल्यूशन प्रोसेस’ (PRIP) से गुज़रने वाली कंपनियों को सीमा पार दिवालिया कार्यवाही से छूट दी जानी चाहिये क्योंकि PIRP के प्रावधान हाल ही में पेश किये गए हैं और ‘प्री-पैक मैकेनिज़्म के तहत न्यायशास्त्र अपने प्रारंभिक चरण में है।
      • सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के त्वरित समाधान के लिये PIRP को इस वर्ष की शुरुआत में IBC के तहत पेश किया गया था।

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार कानून पर संयुक्त राष्ट्र आयोग:

  • यह अंतर्राष्ट्रीय व्यापार कानून के क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र प्रणाली का मुख्य कानूनी निकाय है।
  • इसकी स्थापना वर्ष 1966 में इस उद्देश्य से की गई थी कि यह सदस्य देशों के बीच अंतर्राष्ट्रीय व्यापार सहयोग हेतु मैत्रीपूर्ण संबंधों को बढ़ावा देने और इसके परिणामस्वरूप शांति एवं सुरक्षा बनाए रखने हेतु  एक महत्त्वपूर्ण कारक है।
  • अपने कई मॉडल कानूनों, कन्वेंशनों, और कार्य समूहों के बीच मज़बूत वार्ता के माध्यम से,‘UNCITRAL’ ने सदस्य देशों को उनकी परिस्थितियों के लिये उपयुक्त अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक एवं व्यापार कानून के सिद्धांतों की तुलना, जाँच, वार्ता और उन्हें अपनाने हेतु एक मूल्यवान मंच प्रदान किया है।
  • भारत उन आठ देशों में से एक है, जो ‘UNCITRAL’ की स्थापना से ही उसके सदस्य हैं।

दिवाला और दिवालियापन संहिता:

  • इसे वर्ष 2016 में अधिनियमित किया गया था। यह व्यावसायिक फर्मों के दिवाला समाधान से संबंधित विभिन्न कानूनों को समाहित करता है।
    • इन्सॉल्वेंसी: यह एक ऐसी स्थिति होती है, जिसमें कोई व्यक्ति या कंपनी अपना बकाया ऋण चुकाने में असमर्थ होती है।
    • बैंकरप्सी: यह एक ऐसी स्थिति है जब किसी सक्षम न्यायालय द्वारा एक व्यक्ति या संस्था को दिवालिया घोषित कर दिया जाता है और न्यायालय द्वारा इसका समाधान करने तथा लेनदारों के अधिकारों की रक्षा करने के लिये उचित आदेश दिया गया हो। यह किसी कंपनी अथवा व्यक्ति द्वारा ऋणों का भुगतान करने में असमर्थता की कानूनी घोषणा है।
  • यह दिवालियापन की समस्या के समाधान के लिये सभी वर्गों के देनदारों और लेनदारों को एकसमान मंच प्रदान करने के लिये मौजूदा विधायी ढाँचे के प्रावधानों को मज़बूत करता है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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