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LLP अधिनियम के तहत अपराधों का डिक्रिमिनलाइज़ेशन

  • 27 Jan 2021
  • 8 min read

चर्चा में क्यों?

हाल ही में कंपनी कानून समिति (Company Law Committee- CLC) ने सीमित देयता भागीदारी अधिनियम (Limited Liability Partnership Act), 2008 के तहत आने वाले अपराधों में से 12 अपराधों को डिक्रिमिनलाइज़ (अपराध की श्रेणी से बाहर) करने और LLPs को गैर-परिवर्तनीय ऋणपत्र (Non-Convertible Debenture- NCD) जारी करने की अनुमति देने की सिफारिश की है ताकि LLP फर्मों के लिये व्यापार सुगमता में सुधार के उद्देश्य से धन जुटाया जा सके।

  • देश में कानून का पालन करने वाले कॉरपोरेट्स को व्यवसाय में सुगमता मुहैया कराने और बड़े पैमाने पर हितधारकों के लिये कॉरपोरेट अनुपालन में सुधार करने के उद्देश्य से कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय द्वारा सितंबर, 2019 में कंपनी कानून समिति (Company Law Committee- CLC) की स्थापना की गई थी।

प्रमुख बिंदु

कंपनी कानून समितियों की सिफारिशें:

  • अपराधों का डिक्रिमिनलाइज़ेशन:
    • LLP की भागीदारी की स्थिति में बदलाव पर वार्षिक रिपोर्ट और फाइलिंग आदि जैसे समय पर फाइलिंग से संबंधित विभिन्न अपराध जो धोखाधड़ी से संबंधित नहीं हैं, को डिक्रिमिनलाइज़ करने की सिफारिश की गई है।
    • यद्यपि डिक्रिमिनलाइजेशन के लिये अनुशंसित अपराधों में से किसी के लिये भी वर्तमान समय में संभावित दंड के रूप में कारावास की सज़ा का प्रावधान नहीं है फिर भी समिति ने यह सिफारिश की है कि न्यायालय द्वारा किसी भागीदार या LLP के दुराचार का दोषी पाए जाने के बाद लगाए गए जुर्माने के बजाय कंपनियों को गैर-अनुपालन के लिये अर्थदंड का भुगतान करने की आवश्यकता है।
  • अर्थदंड से संबंधित मामले:
    • समिति ने उल्लेख किया है कि न्यायालयों द्वारा लगाए गए ज़ुर्माने के मामले में दोषी व्यक्ति के विभिन्न पदों से अयोग्य ठहराए जाने या अयोग्य होने का जोखिम होता है लेकिन एक उपयुक्त प्राधिकारी द्वारा दंड लगाए जाने के मामले में इस प्रकार का कोई जोखिम नहीं होगा।
  • दंड आरोपित करने वाले प्राधिकारी:
    • LLP अधिनियम के प्रावधानों का किसी भी प्रकार से उल्लंघन किये जाने की स्थिति में दंड आरोपित का अधिकार कंपनी के रजिस्ट्रार (Registrar of Company- ROC) के पास होना चाहिये।
    • विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को कवर करने वाले कंपनी अधिनियम की धारा 609 के तहत नियुक्त ROC का प्राथमिक कर्त्तव्य है कि वह संबंधित राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों में कार्यान्वित कंपनियों तथा LLPs का पंजीकरण करे।
  • गैर-परिवर्तनीय ऋणपत्र (NCD) जारी करने की अनुमति:
    • LLPs जिन्हें वर्तमान में ऋण प्रतिभूतियाँ जारी करने की अनुमति नहीं है, को NCD जारी करने की अनुमति दी जानी चाहिये ताकि पूंजी जुटाने और वित्तपोषण से संबंधित कार्यों को सुगम बनाया जा सके।

लाभार्थी:

  • इस कदम से उन क्षेत्रों में स्टार्टअप्स और छोटी कंपनियों के लाभान्वित होने की संभावना है, जिनके लिये अधिक पूंजी निवेश की आवश्यकता होती है।

सीमित देयता भागीदारी (LLP)

  • यह एक भागीदारी है जिसमें कुछ या सभी भागीदारों (क्षेत्राधिकार के आधार पर) की सीमित देयताएँ होती हैं।
  • एक LLP में एक भागीदार, दूसरे भागीदार के कदाचार या लापरवाही के लिये ज़िम्म्मेदार नहीं होता है।
  • भागीदारों में परिवर्तन के बावजूद LLP अपने अस्तित्व को जारी रख सकता है। यह अनुबंधों को स्वीकार करने और अपने नाम पर संपत्ति का स्वामित्त्व रखने में सक्षम है।
  • LLP एक पृथक विधिक इकाई है। यह अपनी संपत्ति को पूरी क्षमता तक बढ़ाने के लिये उत्तरदायी है लेकिन LLP में भागीदारों की देयता इनके स्वीकृत योगदान तक सीमित है।

LLP बनाम पारंपरिक भागीदारी फर्म:

  • "पारंपरिक भागीदारी फर्म" (Traditional Partnership Firm) के तहत प्रत्येक भागीदार अन्य सभी भागीदारों के साथ संयुक्त रूप से तथा व्यक्तिगत रूप से फर्म के सभी कार्यों के लिये उत्तरदायी होता है।
  • LLP संरचना के तहत भागीदार की जवाबदेहिता उसके द्वारा स्वीकृत योगदान तक सीमित है। इस प्रकार प्रत्येक भागीदार व्यक्तिगत रूप से अन्य भागीदारों के गलत कृत्यों या दुराचार के मामले में संयुक्त जवाबदेहिता से परिरक्षित हैं।

कंपनी बनाम LLP:

  • किसी कंपनी की आंतरिक प्रशासनिक संरचना को कानून (कंपनी अधिनियम, 2013) द्वारा विनियमित किया जाता है जबकि LLP में आतंरिक प्रशासन भागीदारों के बीच एक संविदात्मक समझौते द्वारा तय होता है।
  • LLP में कंपनी की तरह प्रबंधन-स्वामित्व का विभाजन नहीं होता है।
  • LLP में तुलनात्मक रूप से कंपनी से अधिक लचीलापन होता है।
  • कंपनी की तुलना में LLP के लिये अनुपालन आवश्यकताएँ कम होती हैं।

 गैर-परिवर्तनीय ऋणपत्र (NCD)

  •  ऋणपत्र दीर्घकालिक वित्तीय साधन हैं जिन्हें कंपनियों द्वारा धन उधार लेने के लिये जारी किया जाता है।
  • कुछ ऋणपत्रों में एक निश्चित समय के बाद शेयर में परिवर्तित होने की विशेषता होती है तथा  ऋणपत्र धारक अपने  विवेक के आधार पर उस ऋणपत्र को शेयर में बदल सकता है।
  • जिन ऋणपत्रों को शेयरों में परिवर्तित नहीं किया जा सकता, उन्हें गैर-परिवर्तनीय ऋणपत्र (NCD) कहा जाता है।
  • NCDs दो प्रकार के होते हैं- प्रतिभूत तथा  और प्रतिभूति-रहित या गैर-जमानती।
    • प्रतिभूत NCD: यह कंपनी की संपत्ति द्वारा समर्थित होता है। यदि कंपनी दायित्व का भुगतान करने में विफल रहती है तो ऋणपत्र धारक  निवेशक उन परिसंपत्तियों के परिशोधन (Liquidation) का दावा कर सकते हैं।
    • प्रतिभूति-रहित NCD: प्रतिभूत NCD के विपरीत इस प्रकार की NCD में कंपनी द्वारा अपने दायित्व का भुगतान करने में विफल रहने की स्थिति में इसके धारक को किसी प्रकार की सुरक्षा प्राप्त नहीं है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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