दृष्टि ज्यूडिशियरी का पहला फाउंडेशन बैच 11 मार्च से शुरू अभी रजिस्टर करें
ध्यान दें:

डेली अपडेट्स


जैव विविधता और पर्यावरण

कम तीव्रता वाली वर्षा में गिरावट से उत्तर भारत में भूजल रिचार्ज में आई कमी

  • 05 Jun 2018
  • 5 min read

चर्चा में क्यों ?

देश भर में फैले 5,800 से अधिक भूजल कुओं से 1996 से 2016 के बीच एकत्रित किये गए आँकड़ों के आधार पर भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गांधीनगर के शोधकर्त्ताओं ने पाया है कि वर्षा की तीव्रता भूजल रिचार्ज से घनिष्ठता से जुड़ी होती है।

प्रमुख बिंदु

  • मानसून काल के समय विशेषतः उत्तर और उत्तर-पश्चिमी भारत के मामले में कम तीव्रता वाली वर्षा (low-intensity rainfall) भूजल रिचार्ज के लिये जिम्मेदार होती है, जबकि दक्षिण भारत में भूजल रीचार्ज हेतु अधिक तीव्रता वाली वर्षा मुख्य भूमिका निभाती है।
  • इन निष्कर्षों को ‘जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स’ जनरल में प्रकाशित किया गया।
  • यदि वर्षा की मात्रा प्रति दिन 1-35 मिमी के बीच है, तो वर्षा को कम तीव्रता वाली वर्षा के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। जबकि प्रतिदिन 35 मिमी से अधिक वर्षा होती है, तो इसे उच्च तीव्रता वाली वर्षा के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
  • आईआईटी गांधीनगर की एक टीम ने पाया कि अध्ययन किये गए तीन क्षेत्रों में वर्षा की तीव्रता के संदर्भ में भूजल स्तर एक्वीफायर की प्रकृति से अंतर्संबंधित हैं।
  • उत्तर भारत में विशेष रूप से गंगा के मैदानी क्षेत्र के एक्वीफायर जलीय मृदा द्वारा विशेषीकृत होते हैं, जबकि दक्षिण भारत में कठोर चट्टान वाले एक्वीफायर पाए जाते हैं।
  • जलीय मृदा वाले एक्वीफायर वर्षण के दौरान भूजल रिचार्ज में अधिक समय लेते हैं।
  • कम तीव्रता वाली वर्षा जल को प्रसरण और एक्वीफायर के रिचार्ज हेतु अधिक समय प्रदान करती है। इस कारण ये उत्तर भारत के भूजल के लिये अनुकूल होती है।
  • इसके विपरीत, दक्षिण भारत में हार्ड-रॉक और बेसाल्टिक एक्वीफायर देखे जाते हैं। यहाँ, कम तीव्रता वाली वर्षा की तुलना में उच्च तीव्रता वाली वर्षा भूजल रिचार्ज में अधिक योगदान देती है।
  • शोधकर्त्ताओं ने 1996 से 2016 के बीच के भूजल स्तर संबंधी आँकड़ों का उपयोग करते हुए प्रत्येक कुए के प्रत्येक वर्ष के भूजल रिचार्ज का अनुमान लगाया। 
  • भूजल रिचार्ज का अनुमान वाटर टेबल फ्लक्चुएशन पद्धति का इस्तेमाल करते हुए मई और नवंबर के महीनों के मध्य के भूजल स्तर अंतराल के मापन द्वारा लगाया गया।
  • ध्यातव्य है कि 1951 और 2016 के बीच गंगा के मैदानी क्षेत्र, महाराष्ट्र, तमिलनाडु के कुछ भागों और पश्चिमी घाटों के क्षेत्र में वर्षा की वार्षिक मात्रा में कमी आई है।
  • लेकिन विशेष रूप से पूरे भारत में कम तीव्रता वाली वर्षा की मात्रा में कमी आई है। खासकर मध्य भारत, गंगा के मैदानी क्षेत्र में इसकी मात्रा में बड़ी गिरावट देखने को मिली है और कुछ हद तक उत्तर-पश्चिमी भारत और दक्षिणी भारत में भी इसकी मात्रा में गिरावट दर्ज की गई है।
  • इसके विपरीत, उत्तर-पश्चिमी भारत (गुजरात और राजस्थान), दक्षिण भारत, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में उच्च तीव्रता वाली वर्षा में वृद्धि हुई है। केरल में दोनों प्रकार की वर्षा में गिरावट दर्ज की गई है।
  • अध्ययन काल के दौरान दक्षिण भारत में उच्च तीव्रता वाली वर्षा में वृद्धि के कारण भूजल रिचार्ज में वृद्धि हुई है।
  • शोधकर्त्ताओं का कहना है कि उनके निष्कर्षों के अनुसार, उत्तर भारत में वर्षा की भूजल स्तर में बढ़ोतरी संबंधी प्रकृति में बदलाव आ चुका है, जबकि गहन कृषि की मांगों को पूरा करने हेतु सिंचाई के लिये भूजल की निकासी में वृद्धि हो रही है, जिसने एक असंतुलन की स्थिति पैदा कर दी है।

आगे की राह 

शोधकर्त्ताओं का मानना है कि उत्तर भारत को भूजल टेबल में गिरावट की जाँच करने के लिये अतिरिक्त प्रयास करने की आवश्यकता है। इसके लिये कृत्रिम भूजल रिचार्ज का सहारा लिया जा सकता है। साथ ही सिंचाई हेतु भूजल की निकासी में भी कमी लानी होगी और इन दोनों उपायों को एक साथ अपनाना होगा।

close
एसएमएस अलर्ट
Share Page
images-2
images-2