हिंदी साहित्य: पेन ड्राइव कोर्स
ध्यान दें:

डेली अपडेट्स

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

दवाओं के संयोजन से तपेदिक का उपचार

  • 09 Dec 2019
  • 5 min read

प्रीलिम्स के लिये:

मलेरिया और तपेदिक से संबंधित सामान्य जानकारी

मेन्स के लिये:

विज्ञान और चिकित्सा के क्षेत्र में शोध और अनुप्रयोग संबंधी मुद्दे

चर्चा में क्यों?

हाल ही में शोधकर्त्ताओं द्वारा पाया गया कि मलेरिया की दवाओं के संयोजन के साथ तपेदिक का इलाज़ अपेक्षाकृत अधिक प्रभावी है।

प्रमुख बिंदु:

malaria drug

  • शोध में तपेदिक के जीवाणुओं द्वारा तपेदिक की दवाओं के प्रति प्रतिक्रियाओं का अध्ययन किया गया।
  • आम धारणा के अनुसार तपेदिक के गैर-प्रतिकृति (Non Replicating) धीमे चयापचय दर (Metabolism Rate) वाले जीवाणु ही तपेदिक की दवाओं के प्रति सहनशील होते हैं, जबकि शोध में पाया गया कि प्रतिरोधक कोशिकाओं (Macrophages Cells) में सक्रिय रूप से गुणित होने वाले जीवाणुओं का भी एक अंश तपेदिक विरोधी दवाओं को सहन करने में सक्षम था।
  • तपेदिक के उपलब्ध उपचार में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इलाज में छह महीने या उससे अधिक समय लगता है, जिससे बैक्टीरिया शरीर में लंबे समय तक बना रहता है और दवा से दृढ़ता से लड़ता है। यह अवधि जीवाणुओं को विविधता, उत्परिवर्तन और अपनी संख्या बढाने का पर्याप्त समय देती है जिससे वे दवाओं के प्रति अनुकूल हो जाते हैं।
  • इस समस्या से निपटने के लिये लम्बे समय से दवाओं के संयोजन पर शोध चल रहा था।
  • इस प्रयोग में पाया गया गया कि मलेरिया विरोधी दवा क्लोरोक्विन (Chloroquine) और तपेदिक की दवा आइसोनिआज़िड (Isoniazid) का संयोजन चूहों और गिनी पिग के फेफड़ों से तपेदिक के सभी जीवाणुओं को केवल आठ हफ़्तों में खत्म करने में सक्षम है।
  • इसके अलावा दवाओं के इस संयोजन से तपेदिक के पुनः होने की संभावना भी कम पाई गई।
  • रोगाणुओं से ग्रसित होने पर प्रतिरक्षा तंत्र में उपस्थित प्रतिरोधक कोशिकाएं रोगाणुओं से लड़ने के लिये सबसे पहले अम्लीयता बढ़ाने हेतु ph स्तर को कम कर देती हैं।
    • जबकि शोध में पाया गया कि यह अम्लीयता रोगाणुओं को खत्म करने में नहीं बल्कि उनके लगातार संख्या और दवाओं के प्रति उनकी सहनशीलता बढ़ाने में सहायक होती है।
    • शोध के अनुसार, दवाओं के प्रति सहनशील जीवाणु ऐसी प्रतिरोधक कोशिकाओं में पाए गए जो अपेक्षाकृत ज़्यादा अम्लीय थे।
  • यह शोध बंगलूरू के नेशनल सेंटर फॉर बायोलाॅजिकल साइंस ( National Centre for Biological Sciences ) और फाउंडेशन फॉर नेग्लेक्टेड डिजीज़ रिसर्च (Foundation for Neglected Disease Research) द्वारा किया गया।

तपेदिक (Tuberculosis):

  • इस रोग को ‘क्षय रोग’ या ‘राजयक्ष्मा’ के नाम से भी जाना जाता है।
  • यह ‘माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस’ नामक बैक्टीरिया से फैलने वाला संक्रामक एवं घातक रोग है।
  • सामान्य तौर पर तपेदिक केवल फेफड़ों को प्रभावित करने वाली बीमारी है, परंतु यह मानव-शरीर के अन्य अंगों को भी प्रभावित कर सकती है।
  • प्रतिवर्ष 24 मार्च को विश्व तपेदिक दिवस मनाया जाता है।
    • इसी दिन वर्ष 1882 में वैज्ञानिक रोबर्ट कोच ने टीबी की जीवाणु की खोज की थी।

मलेरिया (Maleria):

  • यह प्लाज़्मोडियम परजीवियों (Plasmodium Parasites) के कारण होने वाला मच्छर जनित रोग है।
  • यह परजीवी संक्रमित मादा एनोफिलीज़ मच्छर (Anopheles Mosquitoes) के काटने से फैलता है।
  • मलेरिया मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाया जाता है।
  • वेक्टर नियंत्रण (Vector Control) मलेरिया संचरण को रोकने और कम करने का मुख्य तरीका है।

स्रोत- द हिंदू

एसएमएस अलर्ट
Share Page