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भूगोल

तटीय लाल रेत के टीले

  • 03 Dec 2022
  • 6 min read

प्रिलिम्स के लिये:

एरा मैटी डिब्बालू, भूगर्भिक समय स्केल, चतुर्धातुक काल, भूगर्भिक समय स्केल।

मेन्स के लिये:

तटीय लाल रेत के टीलों के अध्ययन का महत्त्व।

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भूवैज्ञानिकों ने आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम के तटीय लाल रेत के टीलों के स्थल की रक्षा करने का सुझाव दिया है।

प्रमुख बिंदु

  • परिचय:
    • तटीय लाल रेत के टीलों को 'एरा मैटी डिब्बालु' के नाम से भी जाना जाता है। यह विशाखापत्तनम के कई स्थलों में से एक है, जिसका भूगर्भीय महत्त्व है।
    • यह स्थल समुद्री तट के किनारे स्थित है और विशाखापत्तनम शहर से लगभग 20 किमी उत्तर-पूर्व एवं भीमुनिपट्टनम से लगभग 4 किमी दक्षिण-पश्चिम में है।
    • इस स्थल को वर्ष 2014 में भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (Geological Survey of India- GSI) द्वारा भू-विरासत स्थल के रूप में घोषित किया गया था और आंध्र प्रदेश सरकार ने इसे वर्ष 2016 में 'संरक्षित स्थलों' की श्रेणी में सूचीबद्ध किया है।
  • वितरण:
    • इस तरह के बालू टिब्बे दुर्लभ हैं और दक्षिण एशिया के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में केवल तीन स्थानों जैसे तमिलनाडु में थेरी सैंड्स, विशाखापत्तनम में एर्रा मट्टी दिब्बालू और श्रीलंका में एक साइट से रिपोर्ट किये गए हैं।
    • ये कई वैज्ञानिक कारणों से भूमध्यरेखीय या समशीतोष्ण क्षेत्रों में नहीं पाए जाते हैं।

लाल रेत के टीलों की विशिष्टता:

  • निरंतर विकास:
    • लाल रेत के टीले पृथ्वी के विकास की निरंतरता का एक हिस्सा हैं और उत्तर भूगर्भीय अवधि के क्वार्टनरी युग  का प्रतिनिधित्व करते हैं।
      • क्वार्टनरी युग (चतुर्थ कल्प) भूगर्भिक समय पैमाने पर एक अवधि है जो मुख्य रूप से मानवता और जलवायु परिवर्तन के विस्तार के लिये जानी जाती है। यह अवधि लगभग 2.6 मिलियन वर्ष पूर्व से आज तक जारी है।
  • विभिन्न भू-आकृतिक विशेषताएँ:
    • 30 मीटर तक की ऊँचाई के साथ ये विभिन्न भू-आकृतियों और विशेषताओं के साथ बैडलैंड स्थलाकृति प्रदर्शित करते हैं, जिसमें गली, बालू टिब्बे, रोधिकाएँ, समुद्री रिज़,  युग्मित वेदिकाएँ, गहरी घाटियाँ,  धारा प्रतिच्छेदी वेदिकाएँ, निक पॉइंट (knick point) और झरने शामिल हैं।
      • बैडलैंड स्थलाकृति एक शुष्क इलाके से संबंधित है जहाँ नरम तलछटी चट्टानें और मृदा से भरपूर और पानी से बड़े पैमाने पर लुप्त हो गई है।
  • भू-रासायनिक रूप से अपरिवर्तित:
    • हल्के-पीले रेत के भंडार जिनके बारे में अनुमान है कि ये लगभग 3,000 वर्ष पहले निक्षेपित हो चुके है, अब यह लाल रंग प्राप्त नहीं कर सकती क्योंकि तलछट भू-रासायनिक रूप से अपरिवर्तित होते हैं।
    • ये तलछट अजीवाश्म (जीवाश्म युक्त नहीं) हैं और खोंडालाइट बेसमेंट पर जमा हैं।
      • खोंडालाइट क्षेत्रीय चट्टान है जिसमें उच्च श्रेणी का कायांतरण और दानेदार चट्टान का निर्माण होता है। इसका नाम ओडिशा की खोंड जनजाति के नाम पर रखा गया था।
    • टीलों में शीर्ष पर हल्के-पीले रेत के टीले होते हैं, जिसके तल पर पीेली रेत के साथ एक लाल-भूरे रंग की कंक्रीट होती है।
    • सबसे नीचे की पीली परत फ्लुवियल युक्त होती है, जबकि अन्य तीन इकाइयाँ मूल रूप से एओलियन हैं।

 तलछट सुरक्षा का महत्त्व:

  • इन तलछटों की रक्षा करना महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसका अध्ययन जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को समझने में मदद कर सकता है, क्योंकि एर्रा मट्टी दिब्बालू ने ग्लेशियल और गर्म अवधि का अनुभव किया है।
  • यह स्थल लगभग 18,500 से 20,000 वर्ष पुराना है और इसका संबंध अंतिम हिमयुग से हो सकता है।
  • यह एक आकर्षक वैज्ञानिक विकास साइट है जो दर्शाती है कि जलवायु परिवर्तन का तत्काल प्रभाव किस प्रकार पड़ रहा है।
    • लगभग 18,500 वर्ष पूर्व, बंगाल की खाड़ी वर्तमान समुद्र तट से कम से कम 5 किमी. दूर थी। तब से लगभग 3,000 वर्ष पूर्व तक इसमें निरन्तर परिवर्तन होते रहे थे और यह अभी भी जारी हैं।
  • इस साइट का पुरातात्विक महत्त्व भी है, क्योंकि कलाकृतियों के अध्ययन से उच्च पुरापाषाण काल का संकेत मिलता है और क्रॉस डेटिंग से लेट प्लेइस्टोसिन युग(20,000 ईसा पूर्व) के साक्ष्य मिलते हैं।
  • प्रागैतिहासिक काल के लोग इस स्थान पर रहते थे क्योंकि इस क्षेत्र में कई स्थानों पर खुदाई से तीन विशिष्ट कालों के पत्थर के औजार और नवपाषाण काल के मिट्टी के बर्तनों का भी पता चला है।

स्रोत: द हिंदू

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