18 जून को लखनऊ शाखा पर डॉ. विकास दिव्यकीर्ति के ओपन सेमिनार का आयोजन।
अधिक जानकारी के लिये संपर्क करें:

  संपर्क करें
ध्यान दें:

डेली अपडेट्स


शासन व्यवस्था

जाति आधारित जनगणना

  • 02 Jun 2022
  • 11 min read

प्रिलिम्स के लिये:

जनगणना, एसईसीसी, ओबीसी। 

मेन्स के लिये:

जाति आधारित जनगणना और संबंधित मुद्दे, जनसंख्या और संबद्ध मुद्दे। 

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में बिहार सरकार ने घोषणा की है कि वह सभी जातियों और समुदायों (SECC) का सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण करेगी। 

जनगणना और SECC के बीच अंतर: 

  • जनगणना: 
    • भारत में जनगणना की शुरुआत औपनिवेशिक शासन के दौरान वर्ष 1881 में हुई। 
    • जनगणना का आयोजन सरकार, नीति निर्माताओं, शिक्षाविदों और अन्य लोगों द्वारा भारतीय जनसंख्या से संबंधित आँकड़े प्राप्त करने, संसाधनों तक पहुँचने, सामाजिक परिवर्तन, परिसीमन से संबंधित आँकड़े आदि का उपयोग करने के लिये किया जाता है। 
    • हालाँकि 1940 के दशक की शुरुआत में वर्ष 1941 की जनगणना के लिये भारत के जनगणना आयुक्त ‘डब्ल्यू. डब्ल्यू. एम. यीट्स’ ने कहा था कि जनगणना एक बड़ी, बेहद मज़बूत अवधारणा है लेकिन विशेष जाँच के लिये यह एक अनुपयुक्त साधन है। 
  • सामाजिक-आर्थिक और जातिगत जनगणना (SECC): 
    • वर्ष 1931 के बाद वर्ष 2011 में इसे पहली बार आयोजित किया गया था। 
    • SECC का आशय ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में प्रत्येक भारतीय परिवार की निम्नलिखित स्थितियों के बारे में पता करना है: 
      • आर्थिक स्थिति पता करना ताकि केंद्र और राज्य के अधिकारियों को वंचित वर्गों के क्रमचयी और संचयी संकेतकों की एक शृंखला प्राप्त करने तथा उन्हें इसमें शामिल करने की अनुमति दी जा सके, जिसका उपयोग प्रत्येक प्राधिकरण द्वारा एक गरीब या वंचित व्यक्ति को परिभाषित करने के लिये किया जा सकता है। 
      • इसका अर्थ प्रत्येक व्यक्ति से उसका विशिष्ट जातिगत नाम पूछना है, जिससे सरकार को यह पुनर्मूल्यांकन करने में आसानी हो कि कौन से जाति समूह आर्थिक रूप से सबसे खराब स्थिति में थे और कौन बेहतर थे। 
    • SECC में व्यापक स्तर पर ‘असमानताओं के मानचित्रण’ की जानकारी देने की क्षमता है। 
  • जनगणना और SECC के बीच अंतर: 
    • जनगणना भारतीय आबादी का एक समग्र चित्र प्रस्तुत करती है, जबकि SECC राज्य द्वारा सहायता के योग्य लाभार्थियों की पहचान करने का एक उपाय/साधन है। 
    • चूँकि जनगणना, वर्ष 1948 के जनगणना अधिनियम के अंतर्गत आती है, इसलिये सभी आँकड़ों को गोपनीय माना जाता है, जबकि SECC की वेबसाइट के अनुसार, “SECC में दी गई सभी व्यक्तिगत जानकारी का उपयोग कर सरकारी विभाग परिवारों को लाभ पहुँचाने और/या प्रतिबंधित करने के लिये स्वतंत्र हैं। 

जाति आधारित जनगणना आयोजित करने के पक्ष और विपक्ष में तर्क: 

  • पक्ष में तर्क: 
    • सामाजिक समानता कार्यक्रमों के प्रबंधन में सहायक: 
      • भारत के सामाजिक समानता कार्यक्रम डेटा के बिना सफल नहीं हो सकते हैं और जाति जनगणना इसे ठीक करने में मदद करेगी। 
      • डेटा की कमी के कारण ओबीसी की आबादी, ओबीसी के भीतर के समूह  के लिये कोई उचित अनुमान उपलब्ध नहीं है। 
      • मंडल आयोग ने अनुमान लगाया कि ओबीसी आबादी 5% है, जबकि कुछ अन्य ने ओबीसी आबादी के 36 से 65% तक होने का अनुमान लगाया। 
      • जाति आधारित जनगणना के माध्यम से 'OBC आबादी के आकार के बारे में जानकारी  के अलावा OBC की आर्थिक स्थिति (घर के प्रकार, संपत्ति, व्यवसाय) के बारे में नीति संबंधी प्रासंगिक जानकारी, जनसांख्यिकीय जानकारी (लिंग अनुपात, मृत्यु दर, जीवन प्रत्याशा), शैक्षिक डेटा (पुरुष और महिला साक्षरता, स्कूल जाने वाली आबादी का अनुपात, संख्या) प्राप्त होगा। 
    • आरक्षण पर वस्तुनिष्ठता उपाय: 
      • जाति-आधारित जनगणना आरक्षण पर वस्तुनिष्ठता का उपाय लाने में लंबा रास्ता तय कर सकती है। 
      • OBC के लिये 27% कोटा के समान पुनर्वितरण की जाँच के लिये गठित रोहिणी आयोग के अनुसार, ओबीसी आरक्षण के तहत लगभग 2,633 जातियांँ शामिल हैं। 
      • हालाँकि 1992 से केंद्र की आरक्षण नीति इस बात पर ध्यान नहीं देती है कि OBC के भीतर अत्यंत पिछड़ी जातियों की एक अलग श्रेणी मौजूद है, जो अभी भी हाशिये पर हैं।  
  • विपक्ष में तर्क: 
    • जाति आधारित जनगणना के दुष्प्रभाव: जाति में एक भावनात्मक तत्त्व निहित होता है और इस प्रकार जाति आधारित जनगणना के राजनीतिक व सामाजिक दुष्प्रभाव भी उत्पन्न हो सकते हैं।   
      • ऐसी आशंकाएँ प्रकट होती रही हैं कि जाति संबंधित गणना से उनकी पहचान की सुदृढ़ता या कठोरता को मदद मिल सकती है। 
      • इन दुष्प्रभावों के कारण ही सामाजिक, आर्थिक और जातिगत जनगणना, 2011 के लगभग एक दशक बाद भी इसके आँकड़े के बड़े अंश अप्रकाशित रहे हैं या ये केवल अंशों में ही जारी किये गए हैं। 
    • जाति संदर्भ-विशिष्ट होती है: जाति कभी भी भारत में वर्ग या वंचना का छद्म रूप नहीं रही; यह एक विशिष्ट प्रकार के अंतर्निहित भेदभाव का गठन करती है जो प्रायः वर्ग के भी पार चला जाता है। उदाहरण के लिये:   
      • दलित उपनाम वाले लोगों को नौकरी हेतु साक्षात्कार के लिये बुलाए जाने की संभावना कम होती है, भले ही उनकी योग्यता उच्च जाति के उम्मीदवार से बेहतर हो। 
      • ज़मींदारों द्वारा उन्हें पट्टेदारों के रूप में स्वीकार किये जाने की संभावना भी कम होती है।  
      • एक पढ़े-लिखे, संपन्न दलित व्यक्ति से विवाह अभी भी उच्च जाति की महिलाओं के परिवारों में हिंसक प्रतिशोध को जन्म देता है। 

आगे की राह 

  • एक जाति जनगणना जातिविहीन समाज के लक्ष्य के लिये भले ही अनुकूल न हो लेकिन यह समाज में असमानताओं को दूर करने के साधन के रूप में काम कर सकती है। 
  • जाति के आँकड़े न केवल इस सवाल पर स्वतंत्र शोध करने में सक्षम होंगे कि सकारात्मक कार्रवाई की आवश्यकता किसे है और किसे नहीं, बल्कि यह आरक्षण की प्रभावशीलता में भी वृद्धि लाएगा। 
    • निष्पक्ष डेटा और उसके बाद के शोध सबसे पिछड़े वर्गों के उत्थान के वास्तविक प्रयासों को जाति व वर्ग की राजनीति से बचा सकते हैं तथा यह उन दोनों पक्षों के लोगों के लिये सही सूचना के स्रोत हो सकते हैं जो आरक्षण के पक्ष या उसके विपक्ष में हैं। 
    • आरक्षण का प्रावधान नहीं बल्कि आरक्षण का दुरुपयोग हमारे समाज में विभाजन पैदा करता है। 

विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs): 

प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2009) 

  1. 1951 की जनगणना और 2001 की जनगणना के बीच भारत के जनसंख्या घनत्व में तीन गुना से अधिक की वृद्धि हुई है।
  2. 1951 की जनगणना और 2001 की जनगणना के बीच भारत की जनसंख्या की वार्षिक वृद्धि दर (घातीय) तीन गुना हो गई है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? 

(a) केवल 1 
(b) केवल 2 
(c) 1 और 2 दोनों 
(d) न तो 1 और न ही 2 

उत्तर: D 

व्याख्या:  

  • जनसंख्या की सघनता के महत्त्वपूर्ण संकेतकों में से एक जनसंख्या का घनत्व है। इसे प्रति वर्ग किलोमीटर पर व्यक्तियों की संख्या के रूप में परिभाषित किया जाता है। 
  • वर्ष 2001 में भारत का जनसंख्या घनत्व 324 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर था और 1951 में यह 117 था। इस प्रकार घनत्व में दोगुने से अधिक की वृद्धि हुई, न कि तीन गुना। अतः कथन 1 सही नहीं है। 
  • बीसवीं सदी की शुरुआत यानी वर्ष 1901 में भारत का जनसंख्या घनत्व 77 था और यह लगातार एक दशक से बढ़कर वर्ष 2001 में 324 तक पहुँच गया। 
  •  वर्ष 2001 में औसत वार्षिक वृद्धि दर 1.93 थी, जबकि 1951 में यह 1.25 थी। इस प्रकार इसमें वृद्धि तो हुई लेकिन यह वृद्धि दोगुनी नहीं थी। अतः कथन 2 सही नहीं है।  

अतः  विकल्प (D) सही है। 

स्रोत: द हिंदू  

close
एसएमएस अलर्ट
Share Page
images-2
images-2