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भारतीय अर्थव्यवस्था

ब्लू फूड

  • 25 Feb 2023
  • 6 min read

प्रिलिम्स के लिये:

ब्लू फूड, हृदय रोग, माइक्रोप्लास्टिक्स।

मेन्स के लिये:

ब्लू फूड का महत्त्व, ब्लू फूड से जुड़े मुद्दे।

चर्चा में क्यों?

एक नए अध्ययन से पता चला है कि जलीय वातावरण से प्राप्त ब्लू फूड पोषक तत्त्वों की कमी को कम करने में मदद कर सकता है तथा भारत में रोज़गार और निर्यात राजस्व में बढ़ाने में योगदान कर सकता है।

ब्लू फूड: 

  • परिचय:  
    • ब्लू फूड जलीय जानवरों, पौधों या शैवाल से प्राप्त भोजन होते हैं जो ताज़े जल और समुद्री वातावरण में पाए जाते हैं।
  • महत्त्व:  
    • पोषक तत्त्व का मुख्य स्रोत:  
      • कई देशों में अर्थव्यवस्थाओं, आजीविका, पोषण सुरक्षा और लोगों की संस्कृतियों हेतु ब्लू फूड महत्त्वपूर्ण है।
      • ये 3.2 बिलियन से अधिक लोगों की प्रोटीन की आपूर्ति करते हैं, कई तटीय, ग्रामीण और स्वदेशी समुदायों में पोषक तत्त्वों के प्रमुख स्रोत हैं, साथ ही 800 मिलियन से अधिक लोगों की आजीविका में सहयोग करते हैं, जिनमें से अधिकांश लोग छोटे पैमाने की प्रणालियों में काम करते हैं। 
    • कम उत्सर्जन और कमियों से निपटना: 
      • ये स्थलीय मांस की तुलना में कम उत्सर्जन उत्पन्न करते हैं।  
      • भारत में B12 और ओमेगा-3 की कमी को दूर करने के लिये जलीय खाद्य पदार्थों का भी उपयोग किया जा सकता है।
        • विटामिन B12 की कमी वाले 91% से अधिक देश ओमेगा-3 की कमी के उच्च स्तर को भी प्रदर्शित करते हैं। 
    • हृदय रोगों को कम करना:
      • लाल मांस (Red Meat) के अधिक सेवनके स्थान पर ब्लू फूड पदार्थों को बढ़ावा देने से उच्च हृदय रोग के जोखिम से पीड़ित 22 देशों के लगभग 82% लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरणीय चिंताओं को दूर किया जा सकता है। 
    • ग्लोबल साउथ के लिये राजस्व बढ़ाने की क्षमता: 
      • ब्लू फूड पदार्थ ग्लोबल साउथ और ग्लोबल नार्थ में स्वदेशी समुदायों के पोषण, आजीविका और राष्ट्रीय राजस्व में सुधार हेतु मदद कर सकते हैं।
  • ब्लू फूड से जुड़े मुद्दे:
    • बायकैच: यह मछली पकड़ने के जाल में गैर-लक्षित प्रजातियों के आकस्मिक फँसने को संदर्भित करता है, जिससे इन जानवरों की मृत्यु हो सकती है।
    • प्रदूषण: समुद्र में भारी धातुओं, PCBs और माइक्रोप्लास्टिक्स जैसे प्रदूषकों की उपस्थिति सी-फूड की गुणवत्ता और सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है।
    • गलत लेबलिंग और धोखाधड़ी: सी-फूड उत्पादों पर गलत लेबलिंग के उदाहरण सामने आए हैं, जहाँ कम कीमत वाली मछली को अधिक महँगी बताकर बेचा जाता है।
      • इससे उपभोक्ता को धोखा होने के साथ ही उनके स्वास्थ्य के लिये जोखिमकारी हो सकता है। 
    • अतिदोहन: विश्व बैंक के अनुसार, वैश्विक समुद्री मछली स्टॉक का लगभग 90% अतिदोहन या ओवरफिशिंग की चपेट में है, इस प्रकार यह ओवरफिशिंग, अवैध मछली पकड़ने की स्थिति अन्य अस्थिर जलीय खाद्य उत्पादन के लिये एक समस्या बना हुआ है।

आगे की राह

  • जागरूकता बढ़ाना: सरकारों, गैर-सरकारी संगठनों और निजी क्षेत्र को ब्लू फूड के लाभों एवं कुपोषण, गरीबी तथा पर्यावरणीय गिरावट को दूर करने की इसकी क्षमताओं के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिये मिलकर काम किया जाना चाहिये।
  • सतत् मछली पकड़ने की प्रथाओं को बढ़ावा देना: मछली पकड़ने की प्रथाएँ जो अस्थिर हैं, जैसे कि अत्यधिक मछली पकड़ना, हानिकारक मछली पकड़ने के तरीके और बायकैच को यह सुनिश्चित करने के लिये संबोधित करने की आवश्यकता है कि मछली का स्टॉक कम न हो और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा हो।
  • जलीय कृषि को प्रोत्साहित करना: ब्लू फूड के उत्पादन का कार्य अगर पर्यावरणीय रूप से ज़िम्मेदारी से किया जाए तो यह एक स्थायी तरीका हो सकता है । 
    • सरकारें तकनीकी सहायता, प्रशिक्षण और प्रोत्साहन प्रदान कर स्थायी जलीय कृषि प्रथाओं के विकास को बढ़ावा दे सकती हैं

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रश्न. भारत में स्वतंत्रता के बाद कृषि में आई विभिन्न प्रकार की क्रांतियों को स्पष्ट कीजिये। इन क्रांतियों ने भारत में गरीबी उन्मूलन और खाद्य सुरक्षा में किस प्रकार सहायता प्रदान की है? (2017)

प्रश्न. नीली क्रांति को परिभाषित करते हुए भारत में मत्स्य पालन की समस्याओं और रणनीतियों की व्याख्या कीजिये। (2018)

स्रोत: डाउन टू अर्थ

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