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भारतीय राजनीति

अनुच्छेद 142

  • 20 May 2022
  • 12 min read

प्रिलिम्स के लिये:

राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति, अनुच्छेद 72, राष्ट्रपति, राज्यपाल

मेन्स के लिये:

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पूर्ण न्याय अपनाने में चुनौतियाँ (अनुच्छेद 142), अनुच्छेद 162

चर्चा में क्यों?

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत पूर्ण न्याय प्रदान करने की अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग किया और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी हत्या मामले में एजी पेरारिवलन को रिहा करने का आदेश दिया है।

  • न्यायालय ने संघवाद की रक्षा करते हुए कहा कि हत्या के मामलों में दोषियों द्वारा किये गए अनुच्छेद 161 के तहत क्षमा की याचिका के मामले में राज्यों के पास राज्यपाल को सहायता और सलाह देने की शक्ति है।
  • अनुच्छेद 161 में यह प्रावधान है कि किसी भी मामले से संबंधित किसी भी कानून के खिलाफ किसी भी अपराध के लिये राज्य द्वारा दिये गए दंड के संबंध में राज्यपाल के पास दंड को निलंबित करने, दंड की अवधि को कम करने, दंड के स्वरूप में परिवर्तन करने की शक्ति होगी।

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय:

  • सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि तमिलनाडु मंत्रिपरिषद द्वारा वर्ष 2018 में राज्यपाल को दी गई क्षमादान की सलाह संविधान के अनुच्छेद 161 (राज्यपाल की क्षमादान की शक्ति) के अंतर्गत राज्यपाल के लिये बाध्यकारी है।
  • क्षमा याचिका पर निर्णय लेने की राज्यपाल की अनिच्छा ने न्यायालय को पेरारिवलन के साथ न्याय करने के लिये अनुच्छेद 142 के तहत अपनी संवैधानिक शक्तियों को नियोजित करने के लिये बाध्य किया।
  • पेरारिवलन को रिहा करने के लिये सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल किया जो न्यायालय को पूर्ण न्याय प्रदान करने हेतु असाधारण शक्तियाँ प्रदान करता है।
  • न्यायालय ने केंद्र के इस तर्क को खारिज कर दिया कि विशेष रूप से केवल राष्ट्रपति के पास भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) के तहत किसी मामले में क्षमादान प्रदान करने की शक्ति है, सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि यह विवाद अनुच्छेद 161 को एक "मृत्यु पत्र" के समान बना देगा और एक असाधारण स्थिति पैदा कर देगा जो राज्यपालों द्वारा पिछले 70 वर्षों से हत्या के मामलों में दी गई क्षमा को अमान्य कर देगा।

अनुच्छेद 142:

  • परिभाषा: अनुच्छेद 142 सर्वोच्च न्यायालय को विवेकाधीन शक्ति प्रदान करता है क्योंकि इसमें कहा गया है कि सर्वोच्च न्यायालय अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए ऐसी डिक्री पारित कर सकता है या ऐसा आदेश दे सकता है जो उसके समक्ष लंबित किसी भी मामले या मामलों में पूर्ण न्याय करने के लिये आवश्यक हो।
  • रचनात्मक अनुप्रयोग: अनुच्छेद 142 के विकास के शुरुआती वर्षों में आमजनता और वकीलों दोनों ने समाज के विभिन्न वंचित वर्गों को पूर्ण न्याय दिलाने या पर्यावरण की रक्षा करने के प्रयासों के लिये सर्वोच्च न्यायालय की सराहना की।
    • इसी अनुच्छेद के अंतर्गत ताजमहल की सफाई का निर्णय और कई विचाराधीन कैदियों को न्याय प्रदान किया गया है।
  • भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों से संबंधित यूनियन कार्बाइड मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने खुद को संसद या राज्यों की विधानसभाओं द्वारा बनाए गए कानूनों से ऊपर रखते हुए कहा कि न्याय को पूरा करने के लिये वह संसद द्वारा बनाए गए कानूनों की भी अवहेलना कर सकता है।
    • हालांँकि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ’ मामले में कहा गया कि अनुच्छेद 142 का उपयोग मौज़ूदा कानून को प्रतिस्थापित करने के लिये नहीं, बल्कि एक विकल्प के तौर पर किया जा सकता है|
  • न्यायिक अतिरेक के मामले: हाल के वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय ने कई ऐसे निर्णय दिये हैं जिनमें यह अनुच्छेद उन क्षेत्रों में भी हस्तक्षेप करता है जिन्हें न्यायालय द्वारा शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के माध्यम से भुला दिया गया है| उल्लेखनीय है कि ‘शक्तियों के पृथक्करण’ का सिद्धांत भारतीय संविधान के मूल ढाँचे का एक भाग है|
    • राष्ट्रीय एवं राज्य राजमार्गों पर शराब की बिक्री पर प्रतिबंध: केंद्र सरकार की अधिसूचना में जहांँ केवल राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे शराब की दुकानों पर प्रतिबंध लगाया गया था, जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 142 को लागू करते हुए 500 मीटर की दूरी तक प्रतिबंध लगा दिया है।
    • इसके अतिरिक्त और किसी भी राज्य सरकार द्वारा इसी तरह की अधिसूचना के अभाव में न्यायालय ने प्रतिबंध को राज्य राजमार्गों पर भी बढ़ा दिया।
    • इस तरह के फैसलों ने अनुच्छेद 142 को लागू करने के लिये न्यायालय के विवेक के बारे में अनिश्चितता पैदा कर दी है, जहांँ व्यक्तियों के मौलिक अधिकारों की भी अनदेखी की जा रही है।

आगे की राह

  • सर्वोच्च न्यायालय को इस बात पर आत्मनिरीक्षण करने की आवश्यकता है कि क्या अनुच्छेद 142 का शक्ति के स्वतंत्र स्रोत के रूप में उपयोग सख्त दिशा-निर्देशों द्वारा नियंत्रित किया जाना चाहिये।
  • एक अन्य विकल्प यह है कि अनुच्छेद 142 को लागू करने वाले सभी मामलों को कम-से-कम पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ को भेजा जाना चाहिये ताकि विवेक का यह प्रयोग लोगों के जीवन पर इस तरह के दूरगामी प्रभाव वाले मामलों पर काम कर रहे पाँच स्वतंत्र न्यायिक दिमागों का परिणाम मिल सके। .
  • उन सभी मामलों में जहांँ अदालत अनुच्छेद 142 को लागू करती है, सरकार को इसकी तारीख से छह महीने या उससे अधिक की अवधि के बाद लाभकारी और साथ ही फैसले के नकारात्मक प्रभावों का अध्ययन करने के लिये एक श्वेतपत्र लाना चाहिये।

राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति क्या है?

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 72 की न्यायिक शक्ति के तहत अपराध के लिये दोषी करार दिये गए व्यक्ति को राष्ट्रपति क्षमा अर्थात् दंडादेश का निलंबन, प्राणदंड स्थगन, राहत और माफी प्रदान कर सकता है। इन शब्दों का अर्थ इस प्रकार है:
    • लघुकरण (Commutation)- सज़ा की प्रकृति को बदलना जैसे मृत्युदंड को कठोर कारावास में बदलना।
    • परिहार (Remission)- सज़ा की अवधि को बदलना जैसे 2 वर्ष के कठोर कारावास को 1 वर्ष के कठोर कारावास में बदलना।
    • विराम (Respite)- विशेष परिस्थितियों की वजह से सज़ा को कम करना जैसे शारीरिक अपंगता या महिलाओं की गर्भावस्था के कारण।
    • प्रविलंबन (Reprieve)- किसी दंड को कुछ समय के लिये टालने की प्रक्रिया जैसे फाँसी को कुछ समय के लिये टालना।
    • क्षमा (Pardon)- पूर्णतः माफ़ कर देना, इसका तकनीकी मतलब यह है कि अपराध कभी हुआ ही नहीं।

विगत वर्ष के प्रश्न:

प्रश्न. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 142 के अनुसार, सामान्य कानूनों में निहित निषेध या सीमाएं या प्रावधान संवैधानिक शक्तियों पर प्रतिबंध या सीमाओं के रूप में कार्य नहीं कर सकते हैं। निम्नलिखित में से इसका क्या अर्थ हो सकता है? (2019)

(A) भारत निर्वाचन आयोग द्वारा अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए लिये गए निर्णयों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।

(B) भारत का सर्वोच्च न्यायालय संसद द्वारा बनाए गए कानूनों द्वारा अपनी शक्तियों के प्रयोग के लिये बाध्य नहीं है।

(C) देश में गंभीर वित्तीय संकट की स्थिति में भारत का राष्ट्रपति मंत्रिमंडल से परामर्श किये बिना वित्तीय आपातकाल की घोषणा कर सकता है।

(D) संघ विधानमंडल की सहमति के बिना राज्य विधानमंडल कुछ मामलों पर कानून नहीं बना सकते हैं।

उत्तर: B

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 142 (1) के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए ऐसी डिक्री पारित कर सकता है या ऐसा आदेश दे सकता है जो उसके समक्ष लंबित किसी भी मामले या मामलों में पूर्ण न्याय करने के लिये आवश्यक हो या इस प्रकार किये गए आदेश भारत के पूरे क्षेत्र में ऐसी रीति से लागू करने योग्य होंगे जो संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून द्वारा या उसके तहत निर्धारित की जा सकती है और जब तक इस संबंध में प्रावधान नहीं किया जाता है, तब तक राष्ट्रपति आदेश द्वारा निर्धारित कर सकता है।
  • इस प्रकार अनुच्छेद 142 संविधान द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को पहले से दी गई शक्तियों का पूरक है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि न्याय किया गया है और न्यायालय अधिकार क्षेत्र या कानूनी प्रधिकार की कमी के कारण बाधित नहीं होता है।

अतः विकल्प (B) सही है

स्रोत: द हिंदू

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