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एथिक्स

पाँच साल के शांतिकाल के बाद, भारत में उत्थान पर नैदानिक परीक्षण

  • 04 Jun 2018
  • 4 min read

चर्चा में क्यों?

भारत में किये जा रहे नैदानिक परीक्षणों की संख्या में क्रमिक पुनरुत्थान हो रहा है। ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई) द्वारा वर्ष 2013 में केवल 17 नैदानिक परीक्षणों को अनुमति प्रदान की गई थी, जबकि 2017 में यह संख्या बढ़कर 97 हो गई। अर्थात् पाँच वर्षों में इन परीक्षणों में 400 प्रतिशत से अधिक उछाल आया है।

प्रमुख बिंदु
  • नियामक और डोमेन विशेषज्ञों ने इस पुनरुत्थान का मुख्य कारण जारी किये गए कुशल और संतुलित दिशा-निर्देशों को माना है।
  • हालाँकि, सामजिक कार्यकर्त्ताओं का मानना है कि भारत अभी भी परीक्षणों की निगरानी के संदर्भ में एक निर्विवाद तंत्र से कोसों दूर है।
  • लेकिन, संख्या में यह बढ़ोतरी 2013 के पूर्वकाल के आस-पास भी नहीं है। उदाहरणस्वरूप, 2012 में डीसीजीआई ने 253 परीक्षणों को मंजूरी दी थी, जबकि 2011 में यह संख्या 283 और 2010 में 529 थी।
  • फरवरी 2012 में स्वास्थ्य अधिकार मंच द्वारा सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई, जिसमें नैदानिक परीक्षणों में कई अनियमितताओं के बारे में अलर्ट किया गया। इनमें जिनपर परीक्षण किया जा रहा है, उनकी सहमति और मुआवजे की कमी जैसे मुद्दे शामिल थे।
  • लगभग उसी समय 59वीं संसदीय समिति की रिपोर्ट में कहा गया कि दवा निर्माताओं, डॉक्टरों और कुछ सरकारी नियामकों के बीच मजबूत गठबंधन है।
  • जनवरी 2013 में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा मुआवजा हेतु योग्यता निर्धारित करने संबंधी एक राजपत्रित अधिसूचना जारी की गई। 
  • इसका मुआवजे संबंधी खंड दुरुपयोग के लिये खुला था और परीक्षण में भाग लेने हेतु प्रेरक के रूप में कार्य कर सकता था।
  • इसमें नैदानिक परीक्षण के संदर्भ में अध्ययन संबंधी चोट (study related injury) और गैर-अध्ययन संबंधी चोट के मध्य कोई भेद नहीं किया गया था।
  • कई अन्य खंड भी शामिल किये गए। जैसे- कोई भी जाँचकर्ता तीन से अधिक परीक्षण नहीं कर सकता, परीक्षण सरकारी अस्पतालों में ही संपन्न किये जाएंगे, परीक्षण साइट 50 बैड वाले अस्पताल होने चाहिये इत्यादि । 
  • लेकिन अब धीरे-धीरे अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुसार नैदानिक ​​परीक्षण संबंधी पर्यावरण को सुसंगत बनाना शुरू कर दिया गया है।
  • अब 50% परीक्षण निजी अस्पतालों में आयोजित किये जा सकते हैं,अब प्रति जाँचकर्ता तीन परीक्षणों संबंधी कोई प्रतिबंध नहीं है और वित्तीय मुआवजे की गणना हेतु एक फॉर्मूला तैयार कर लिया गया है।
  •  हालाँकि, हाल ही में जयपुर में नैदानिक परीक्षण संबंधी एक विवाद सामने आया था, जहाँ कथित तौर पर मरीजों को धोखे से परीक्षण में शामिल किया गया था। यह घटना सरकारी नियमों में खामियों को उजागर करती है।
  • स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, 2012 में नैदानिक परीक्षणों में गंभीर प्रतिकूल घटनाओं (serious adverse events) से संबंधित मौतों के 436 मामले थे, जबकि 2013 और 2014 में यह संख्या क्रमशः 590 और 443 थी।
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