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जीव विज्ञान और पर्यावरण

हरियाणा में एरियल सीडिंग

  • 31 Jul 2020
  • 5 min read

प्रीलिम्स के लिये:

एरियल सीडिंग

मेन्स के लिये:

एरियल सीडिंग का महत्त्व

चर्चा में क्यों?

हाल ही में हरियाणा सरकार ने राज्य के अरावली क्षेत्र में हरित आवरण को बेहतर बनाने के लिये एरियल सीडिंग ड्रोनों को तैनात किया है। अरावली और शिवालिक पहाड़ियों के दुर्गम और कठिन स्थलों पर कम वनस्पति घनत्व या खंडहर क्षेत्रों को पुनर्जीवित करने के लिये इस परियोजना को पायलट आधार पर संचालित किया जा रहा है।

प्रमुख बिंदु

एरियल सीडिंग (Aerial Seeding)

  • विवरण:

    • एरियल सीडिंग, रोपण की एक तकनीक है जिसमें बीजों को मिट्टी, खाद, चारकोल और अन्य घटकों के मिश्रण में लपेटकर एक गेंद का आकार दिया जाता है, इसके बाद हवाई
    • उपकरणों जैसे- विमानों, हेलीकाप्टरों या ड्रोन आदि का उपयोग करके इन गेंदों को लक्षित क्षेत्रों में फेंका जाता है/छिड़काव किया जाता है।
  • कार्य:

    • बीजों से युक्त इन गेंदों को निचली उड़ान भरने में सक्षम ड्रोनों द्वारा एक लक्षित क्षेत्र में फैलाया जाता है, इससे बीज हवा में तैरने की बजाय लेपन में युक्त मिश्रण के वज़न से एक पूर्व निर्धारित स्थान पर जा गिरते हैं।
    • इसका एक अन्य लाभ है कि जल और मिट्टी में घुलनशील इन पदार्थों के मिश्रण से पक्षी या वन्य जीव इन बीजों को क्षति नहीं पहुँचाते हैं, जिससे इनके लाभाकारी परिणाम प्राप्त होने की उम्मीदें भी बढ़ जाती है।
  • लाभ:
    • इस विधि के माध्यम से ऐसे क्षेत्र जो दुर्गम हैं, जिनमें खड़ी ढलान या कोई वन मार्ग नहीं होने के कारण, पहुँचना बहुत कठिन है, उन्हें आसानी से लक्षित किया जा सकता है।
    • बीज के अंकुरण और वृद्धि की प्रक्रिया ऐसी है कि मैदानों में इसके छिड़काव के बाद इस पर कोई विशेष ध्यान देने की आवश्यकता नहीं होती है और इस तरह बीजों को छिड़ककर भूल जाने के तरीके के रूप में इसका इस्तेमाल किया जाता है।
    • न इन्हें जुताई की आवश्यकता होती हैं और न ही रोपण की, क्योंकि वे पहले से ही मिट्टी, पोषक तत्त्वों और सूक्ष्मजीवों से घिरे होते हैं। मिट्टी का खोल उन्हें पक्षियों, चींटियों और चूहों जैसे कीटों से भी बचाता है।
  • सीडिंग ड्रोन का उपयोग:

    • इस विधि के अंतर्गत 25 से 50 मीटर की ऊँचाई से विभिन्न आकारों के बीज के छिड़काव के लिये एक सटीक वितरण तंत्र से सुसज्जित ड्रोन इस्तेमाल किये जा रहे हैं।
    • एक एकल ड्रोन एक दिन में 20,000-30,000 बीज रोपित कर सकता है।
    • क्रियान्वयन:
    • इस तकनीक की प्रभावशीलता का परीक्षण और सफलता दर की समीक्षा करने के लिये 100 एकड़ भूमि पर इस विधि का प्रयोग किया जा रहा है।
      • इसके अलावा, विशिष्ट घास के बीजों के मिश्रण को भी इसमें शामिल किया जाएगा क्योंकि ये मिट्टी को बांधे रखने में सहायक होते हैं।
  • महत्त्व:

    • यह स्थानीय समुदाय विशेषकर महिलाओं को काम के अवसर प्रदान करेगा, जो इन बीजों की गेंद/सीड बॉल तैयार कर सकती हैं।
    • यह विधि इसलिये भी उपयोगी साबित होगी क्योंकि ऐसे कई क्षेत्र हैं जो या तो पूरी तरह से दुर्गम है, या जहाँ तक पहुँचना बहुत ही कठिन है, जिसके चलते इन क्षेत्रों में वृक्षारोपण के पारंपरिक तरीकों को सफल बनाना कठिन हो जाता हैं।
  • एरियल सीडिंग के लिये उपयोग की जाने वाली प्रजातियाँ:

    • इस तकनीक के तहत इस्तेमाल होने वाली पौधों की प्रजातियाँ, क्षेत्र विशेष की स्थानिक प्रजातियाँ होती हैं।
    • एरियल सीडिंग के माध्यम से जो प्रजातियाँ रोपित की जाएंगी, उनमें एकेसिया सेनेगल (खैरी), ज़िज़िफस मौरिटिआना (बेरी) और होलेरेना एसपीपी (इंद्रजो) शामिल हैं, इन प्रजातियों का इस्तेमाल इसलिये किया जा रहा है क्योंकि इनमें बगैर किसी देख-रेख के भी इन दुर्गम क्षेत्रों में जीवित रहने की संभावना अधिक है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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