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अडॉप्टेशन गैप रिपोर्ट 2020: UNEP

  • 18 Jan 2021
  • 7 min read

चर्चा में क्यों?

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) द्वारा जारी ‘अडॉप्टेशन गैप रिपोर्ट 2020’ के अनुमान के मुताबिक, विकासशील देशों के लिये जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अनुकूलन की वार्षिक लागत वर्ष 2050 तक लगभग चौगुनी हो जाएगी।

  • मौजूदा अनुमान के अनुसार, विकासशील देशों के लिये जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अनुकूलन की वर्तमान लागत 70 बिलियन डॉलर (5.1 लाख करोड़ रुपए) है, जो कि वर्ष 2030 तक 140-300 बिलियन डॉलर और वर्ष 2050 तक 280-500 बिलियन डॉलर हो जाएगी।

प्रमुख बिंदु

अनुकूलन लागत

  • अनुकूलन लागत में अनुकूलन उपायों की योजना बनाने, उसकी तैयारी, सुविधा प्रदान करने और उन्हें लागू करने की लागतों को शामिल किया जाता है।
  • अनुकूलन लागत में बढ़ोतरी के कारण यह अनुकूलन वित्त से भी अधिक है, जिसके कारण एक अनुकूलन वित्त अंतराल पैदा हो गया है।
    • अनुकूलन वित्त: जलवायु परिवर्तन के कारण विकासशील देशों को होने वाले नुकसान को कम करने के लिये यह धन के प्रवाह अथवा वित्तपोषण को संदर्भित करता है।
    • अनुकूलन वित्त अंतराल: यह अनुकूलन लागत और अनुकूलन वित्त के बीच का अंतर होता है।
  • वस्तुतः विकसित देशों में अनुकूलन लागत अधिक होती है, किंतु विकासशील देशों के सकल घरेलू उत्पाद के संबंध में उन्हें अनुकूलन का बोझ अधिक उठाना पड़ता है।
  • अफ्रीका और एशिया के विकासशील देश, जो अकेले जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने में सक्षम नहीं हैं, अनुकूलन लागत से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।

वैश्विक चुनौतियाँ

  • तापमान में बढ़ोतरी: वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि पेरिस समझौते के तहत सभी देश कार्बन कटौती संबंधी वर्तमान प्रतिबद्धताओं का पालन करें तो भी सदी के अंत तक पृथ्वी का तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर की तुलना में 3 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा। यदि हम वैश्विक तापमान में हो रही बढ़ोतरी को 2 डिग्री सेल्सियस या 1.5 डिग्री सेल्सियस तक भी सीमित कर पाते हैं तो विश्व के गरीब देशों को काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।
  • महामारी: मौजूदा कोरोना वायरस महामारी ने अनुकूलन प्रयासों को प्रभावित किया और इसके प्रभावों को अभी  तक मापा नहीं जा सका है।
  • अन्य चुनौतियाँ: वर्ष 2020 में हमें केवल महामारी ही नहीं बल्कि बाढ़, सूखा, तूफान और वनाग्नि जैसी विनाशकारी आपदाएँ भी देखने को मिली हैं, जिन्होंने विश्व भर में लगभग 50 मिलियन लोगों को प्रभावित किया।

जलवायु परिवर्तन के लिये वैश्विक अनुकूलन: विश्व के लगभग तीन-चौथाई देशों ने कम-से-कम एक जलवायु परिवर्तन अनुकूलन उपकरण को अपनाया है और अधिकांश विकासशील देश राष्ट्रीय अनुकूलन योजनाओं को अपनाने की दिशा में कार्य कर रहे हैं।

जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिये भारत की पहलें

  • भारत ने 1 अप्रैल, 2020 को भारत स्टेज- IV (BS-IV) उत्सर्जन मानदंडों के स्थान पर भारत स्टेज-VI (BS-VI) को अपना लिया है, ज्ञात हो कि पहले इन मापदंडों को वर्ष 2024 तक अपनाया जाना था।
  • राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP)
    • इसे जनवरी 2019 में लॉन्च किया गया था।
    • यह 2024 तक PM10 और PM2.5 की सांद्रता में 20-30 प्रतिशत की कमी करने हेतु अस्थायी लक्ष्य वाली एक पंचवर्षीय कार्ययोजना है, जिसमें वर्ष 2017 को आधार वर्ष के तौर पर चुना गया है।
  • उजाला (UJALA) योजना के तहत 360 मिलियन से अधिक LED बल्ब वितरित किये गए हैं, जिसके परिणामस्वरूप प्रतिवर्ष लगभग 47 बिलियन यूनिट विद्युत की बचत हुई और प्रतिवर्ष 38 मिलियन टन CO2 की कमी हुई है।
  • जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय सौर मिशन
    • वर्ष 2009 में शुरू किये गए इस मिशन के तहत वर्ष 2022 तक 20,000 मेगावाट ग्रिड से जुड़ी सौर ऊर्जा के उत्पादन का महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया गया था।
    • इस मिशन का उद्देश्य भारत के ऊर्जा उत्पादन में सौर ऊर्जा की हिस्सेदारी को बढ़ाना है।
  • जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्ययोजना (NAPCC)
    • जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्ययोजना का शुभारंभ वर्ष 2008 में किया गया था।
    • इसका उद्देश्य जनता के प्रतिनिधियों, सरकार की विभिन्न एजेंसियों, वैज्ञानिकों, उद्योग और समुदायों को जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न खतरे और इससे मुकाबला करने के उपायों के बारे में जागरूक करना है।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP)

  • 05 जून, 1972 को स्थापित संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP), एक प्रमुख वैश्विक पर्यावरण प्राधिकरण है।
  • कार्य: इसका प्राथमिक कार्य वैश्विक पर्यावरण एजेंडा को निर्धारित करना, संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के भीतर सतत् विकास को बढ़ावा देना और वैश्विक पर्यावरण संरक्षण के लिये एक आधिकारिक अधिवक्ता के रूप में कार्य करना है।
  • प्रमुख रिपोर्ट्स: उत्सर्जन गैप रिपोर्ट, वैश्विक पर्यावरण आउटलुक, इंवेस्ट इनटू हेल्थी प्लेनेट रिपोर्ट
  • प्रमुख अभियान: ‘बीट पॉल्यूशन’, ‘UN75’, विश्व पर्यावरण दिवस, वाइल्ड फॉर लाइफ। 
  • मुख्यालय: नैरोबी (केन्या) 

स्रोत: डाउन टू अर्थ

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