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विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

16 साइकी: एक रहस्यमयी क्षुद्रग्रह

  • 02 Nov 2020
  • 9 min read

प्रिलिम्स के लिये

नासा (NASA), हबल स्पेस टेलीस्कोप (HST), 16 साइकी क्षुद्रग्रह, मिशन साइकी

मेन्स के लिये

16 साइकी क्षुद्रग्रह संबंधी मुख्य बिंदु और इसके अध्ययन का महत्त्व

चर्चा में क्यों?

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) द्वारा किये गए एक हालिया अध्ययन से ज्ञात हुआ है कि मंगल और बृहस्पति ग्रह के बीच मौजूद क्षुद्रग्रह ‘16 साइकी’ (16 Psyche) पूरी तरह से धातु (Metal) से बना हो सकता है और इसकी अनुमानित कीमत पृथ्वी की समग्र अर्थव्यवस्था से भी कई गुना अधिक है।

प्रमुख बिंदु

  • नासा के हबल स्पेस टेलीस्कोप (HST) से प्राप्त जानकारी के मुताबिक, इस रहस्यमय क्षुद्रग्रह की सतह पर पृथ्वी के कोर के समान लोहा और निकेल (Nickel) की मौजूदगी हो सकती है।

‘16 साइकी’ के बारे में

  • पृथ्वी से लगभग 370 मिलियन किलोमीटर की दूरी पर स्थित ‘16 साइकी’ हमारे सौरमंडल की क्षुद्रग्रह बेल्ट (Asteroid Belt) में सबसे बड़े खगोलीय निकायों में से एक है।
  • नासा के मुताबिक, आलू के जैसे दिखने वाला इस क्षुद्रग्रह का व्यास लगभग 140 मील है।
  • खोज
    • इस रहस्यमयी क्षुद्रग्रह की खोज इतालवी खगोलशास्त्री एनीबेल डी गैस्पारिस द्वारा 17 मार्च, 1852 को की गई थी और इसका नाम ग्रीक की प्राचीन आत्मा की देवी साइकी (Psyche) के नाम पर रखा गया था। चूँकि यह वैज्ञानिकों द्वारा खोजा जाने वाला 16वाँ क्षुद्रग्रह है, इसलिये इसके नाम के आगे 16 जोड़ा गया है।
  • अधिकांश क्षुद्रग्रहों (Asteroids) के विपरीत, जो कि चट्टानों या बर्फ से बने होते हैं, वैज्ञानिकों का मानना ​​है कि ‘16 साइकी’ क्षुद्रग्रह एक बहुत बड़ा धातु निकाय है जिसे पूर्व के किसी ग्रह का कोर माना जा रहा है, जो कि पूर्णतः ग्रह के रूप में परिवर्तित होने में सफल नहीं हो पाया था।

‘16 साइकी’ का हालिया अध्ययन

  • नवीनतम अध्ययन में साउथवेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के शोधकर्त्ताओं ने हबल स्पेस टेलीस्कोप के माध्यम से क्षुद्रग्रह ‘16 साइकी’ के रोटेशन के दौरान इसके दो विशिष्ट बिंदुओं का अध्ययन किया ताकि इसका समग्र रूप से मूल्यांकन किया जा सके।
  • इस अध्ययन में पहली बार ‘16 साइकी’ क्षुद्रग्रह का पराबैंगनी अवलोकन (Ultraviolet Observation) भी किया गया है, जिससे पहली बार इस क्षुद्रग्रह की संरचना की एक तस्वीर प्राप्त की जा सकी है।
  • अध्ययन से ज्ञात हुआ है कि जिस तरह ‘16 साइकी’ क्षुद्रग्रह से पराबैंगनी प्रकाश परावर्तित हुआ वह उसी प्रकार था जिस तरह से सूर्य का प्रकाश लोहे से परावार्तित होता है, हालाँकि शोधकर्त्ताओं का मत है कि यदि इस क्षुद्रग्रह पर केवल 10 प्रतिशत लोहा भी उपस्थित होगा तो भी पराबैंगनी प्रकाश का परावर्तन ऐसा ही होगा।
  • ध्यातव्य है कि धातु के क्षुद्रग्रह आमतौर पर सौरमंडल में नहीं पाए जाते हैं और इसलिये वैज्ञानिकों का मानना ​​है कि ‘16 साइकी’ क्षुद्रग्रह का अध्ययन किसी भी ग्रह के भीतर की वास्तविकता को जानने में काफी मदद कर सकता है।

‘16 साइकी’ क्षुद्रग्रह का वास्तविक मूल्य

  • नासा के वैज्ञानिकों का मानना ​​है कि ‘16 साइकी’ क्षुद्रग्रह तकरीबन पूरी तरह से लोहा, निकेल और कई अन्य दुर्लभ खनिज जैसे- सोना, प्लैटिनम, कोबाल्ट और इरिडियम आदि से मिलकर बना है। 
  • ऐसे में नासा की गणना के अनुसार, यदि ‘16 साइकी’ क्षुद्रग्रह को किसी भी तरह पृथ्वी पर लाया जाता है तो इसमें मौजूद धातु की कीमत ही अकेले 10000 क्वाड्रिलियन डॉलर से अधिक होगी, जो कि पृथ्वी की संपूर्ण अर्थव्यवस्था से काफी अधिक है।
    • हालाँकि नासा अथवा किसी अन्य अंतरिक्ष एजेंसी के पास अभी तक ऐसी कोई तकनीक नहीं है, जिसके माध्यम से इस विशाल क्षुद्रग्रह को पृथ्वी पर लाया जा सके और न ही कोई अंतरिक्ष एजेंसी ऐसी किसी परियोजना पर कार्य कर रही है।
  • प्रभाव: यदि धातु से निर्मित इस विशालकाय क्षुद्रग्रह को किसी तरह पृथ्वी पर लाया जाता है और इस पर मौजूद दुर्लभ संसाधनों का खनन किया जाता है तो इससे पृथ्वी के खनिज बाज़ार का पतन हो जाएगा और सभी धातुएँ तुलनात्मक रूप से कम कीमत पर मिलने लगेंगी, हालाँकि निकट भविष्य में ऐसा संभव नहीं है।

नासा का ‘साइकी मिशन’

  • नासा ने इस अद्भुत और रहस्यमयी क्षुद्रग्रह का अध्ययन करने के लिये ‘साइकी मिशन’ की शुरुआत की है, जिसके तहत नासा द्वारा वर्ष 2022 में एक मानवरहित अंतरिक्ष यान भेजा जाएगा, जो कि काफी नज़दीक से इस क्षुद्रग्रह का अध्ययन कर इसकी संरचना और इसके उद्गम को जानने का प्रयास करेगा।
  • नासा द्वारा लॉन्च किया जाने वाला मानवरहित अंतरिक्षयान वर्ष 2026 में इस ‘16 साइकी’ क्षुद्रग्रह के पास पहुँचेगा और फिर तकरीबन 21 महीनों तक ‘16 साइकी’ क्षुद्रग्रह का चक्कर लगाएगा। ‘साइकी मिशन’ का प्राथमिक उद्देश्य धातु से निर्मित इस क्षुद्रग्रह की तस्वीर खींचना है, क्योंकि वैज्ञानिकों के पास अभी तक इस क्षुद्रग्रह की कोई वास्तविक तस्वीर उपलब्ध नहीं है।
    • इस मिशन के माध्यम से वैज्ञानिक यह जानने का भी प्रयास करेंगे कि क्या यह क्षुद्रग्रह वास्तव में किसी पूर्व ग्रह का हिस्सा है अथवा नहीं। साथ ही एकत्र किये गए आँकड़ों के आधार पर वैज्ञानिक इस क्षुद्रग्रह की आयु और उत्पत्ति का भी पता लगाएंगे।

‘16 साइकी’ क्षुद्रग्रह के अध्ययन का महत्त्व

  • ‘16 साइकी’ क्षुद्रग्रह का अध्ययन करने से पृथ्वी और पृथ्वी जैसे अन्य ग्रहों के कोर की उत्पत्ति के बारे में पता चल सकेगा। इस क्षुद्रग्रह का अध्ययन हमें यह जानने में मदद कर सकता है कि किसी ग्रह के भीतर का हिस्सा वास्तव में किस प्रकार का होता है।
  • चूँकि हम पृथ्वी के कोर में नहीं जा सकते, इसलिये ‘16 साइकी’ क्षुद्रग्रह के माध्यम से इसे जानने का एक अच्छा अवसर प्राप्त हो सकता है।
    • ज्ञात हो कि पृथ्वी का कोर लगभग 3,000 किलोमीटर की गहराई पर स्थित है और शोधकर्त्ता केवल 12 किलोमीटर तक ही पहुँच सके हैं। वहीं पृथ्वी के कोर का तापमान लगभग 5,000oC है, इसलिये वहाँ पहुँचना लगभग असंभव है।

स्रोत: इंडियन एक्स्प्रेस

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