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शासन व्यवस्था

विद्युत क्षेत्र की डिस्कॉम कंपनियाँ और RDSS

  • 08 Feb 2022
  • 11 min read

यह एडिटोरियल 07/02/2022 को ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित “Plugging Power Reforms” लेख पर आधारित है। इसमें बिजली वितरण कंपनियों की चुनौतियों और पुर्नोत्थान वितरण क्षेत्र सुधार योजना (RDSS) के संबंध में चर्चा की गई है।

संदर्भ

भारत की बिजली आपूर्ति शृंखला में वितरण सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका रखता है, लेकिन वही संभवतः सबसे कमज़ोर कड़ी भी है। भारत में बिजली क्षेत्र की वितरण कंपनियाँ AT&C हानियों, पर्याप्त निवेश की कमी और मीटरिंग संबंधी समस्याओं से पीड़ित हैं।

पुर्नोत्थान वितरण क्षेत्र सुधार योजना (Revamped Distribution Sector Reform Scheme- RDSS) विशेष रूप से वितरण कंपनियों की परिचालन कमियों और वित्तीय बाधाओं को दूर करने के लिये शुरू की गई थी, लेकिन यह योजना स्वयं ही कार्यान्वयन संबंधी समस्याओं से ग्रस्त है।

RDSS द्वारा पेश विभिन्न अवसरों का लाभ उठाने के लिये राज्यों को अपनी कार्ययोजनाओं में निवेश को प्राथमिकता देने के मामले में लचीलेपन की आवश्यकता पर बल देना चाहिये। इस प्रयास के साथ-साथ त्वरित लेकिन सुविचारित कार्यान्वयन की दिशा में पूर्ण प्रतिबद्धताओं की भी आवश्यकता है।

बिजली क्षेत्र की वितरण कंपनियाँ

बिजली वितरण कंपनियों (DISCOMs) के समक्ष विद्यमान चुनौतियाँ 

  • वितरण कंपनियों को कुल तकनीकी एवं वाणिज्यिक (Aggregate Technical and Commercial- AT&C) हानियाँ उठानी पड़ती है।
    • तकनीकी हानि: यह पारेषण और वितरण प्रणालियों में बिजली के प्रवाह के कारण होती है।
    • व्यावसायिक हानि: यह बिजली की चोरी, मीटरिंग की कमी आदि के कारण होती है।
  • पिछले दशक में ग्रामीण नेटवर्क में 50,000 करोड़ रुपए से अधिक का निवेश किया गया है, हालाँकि वास्तविक निवेश योजना से बहुत कम रहा है।
  • इसके अलावा, इन क्षेत्रों में ट्रांसफार्मर और सब-स्टेशन 250 या 500 वाट की न्यूनतम मांग की पूर्ति के लिये अभिकल्पित थे जहाँ माना गया था कि केवल रोशनी, पंखे और टीवी के लिये बिजली की खपत होगी, न कि रेफ्रिजरेटर और मिक्सर जैसे उपकरणों के लिये।
  • बिजली की बिक्री का लगभग 25% अत्यधिक सब्सिडीयुक्त है। कृषि उपभोक्ताओं को भी अनियमित एवं खराब गुणवत्ता की आपूर्ति प्राप्त होती है।
  • प्रयासों के बावजूद उपभोक्ता और फीडर के स्तर पर बिना मीटर वाले उपभोक्ताओं और खराब मीटरों की समस्या बनी हुई है।
    • मीटरों के बिना सटीक ऊर्जा लेखांकन और हानि की निगरानी एक चुनौती है।

बिजली वितरण कंपनियों (DISCOMs) के लिये शुरू की गई पहलें 

पुर्नोत्थान वितरण क्षेत्र सुधार योजना (RDSS)

  • यह वितरण कंपनियों (निजी क्षेत्र के डिस्कॉम को छोड़कर) की परिचालन क्षमता और वित्तीय स्थिरता में सुधार लाने पर लक्षित है।
    • यह वितरण कंपनियों की आपूर्ति अवसंरचना को सुदृढ़ करने के लिये सशर्त वित्तीय सहायता प्रदान करेगा।
  • परिव्यय का आधा भाग बेहतर फीडर और ट्रांसफॉर्मर मीटरिंग एवं प्री-पेड स्मार्ट कंज्यूमर मीटरिंग के लिये रखा गया है। शेष आधा भाग, जिसमें से 60% केंद्र सरकार के अनुदान द्वारा वित्तपोषित किया जाएगा, बिजली हानि में कमी लेन और नेटवर्क को मज़बूत बनाने पर खर्च किया जाएगा।
  • यह एक समग्र योजना है जिसमें सभी मौजूदा बिजली क्षेत्र सुधार योजनाओं—एकीकृत बिजली विकास योजना, दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना और प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना का विलय किया जाएगा।
  • ग्रामीण विद्युतीकरण निगम (Rural Electrification Corporation) और विद्युत वित्त निगम (Power Finance Corporation) इस कार्यक्रम के कार्यान्वयन के लिये नोडल एजेंसियाँ हैं।

RDSS से संबद्ध समस्याएँ

  • RDSS ने जटिल प्रक्रियाओं और फंड वितरण की शर्तों जैसी कई डिज़ाइन संबंधी समस्याएँ पूर्ववर्ती कार्यक्रमों से विरासत में पाई हैं।
    • पिछली योजनाओं में आवंटित कुल 2.5 लाख करोड़ रुपए के अनुदान में से मात्र 60% का ही वितरण किया गया था।
  • राज्यों में सार्वजनिक समीक्षा और नियामक निरीक्षण की कमी एक और समस्या है। योजना के डिज़ाइन का निर्देशात्मक दृष्टिकोण प्रभावी कार्यान्वयन में बाधा उत्पन्न करता है।
    • यह योजना तंत्र को सुदृढ़ करने से अधिक ज़ोर नुकसान में कमी लाने हेतु निवेश पर देती है।
    • जबकि उच्च हानि आमतौर पर निरंतर खराब गुणवत्तापूर्ण सेवा से जुड़ी होती है, जो स्वयं तंत्र को मज़बूत करने में अपर्याप्त निवेश से प्रभावित होती है।
  • RDSS सार्वभौमिक प्रीपेड मीटरिंग का प्रावधान रखता है लेकिन पोस्ट-पेड विकल्प कई संदर्भों में अधिक उपयुक्त हो सकते हैं।

आगे की राह

  • ग्रामीण नेटवर्क को मज़बूत करना: बढ़ती मांग की पूर्ति के लिये ग्रामीण नेटवर्क को मज़बूत करना महत्त्वपूर्ण है। आपूर्ति के घंटों में वृद्धि, उपकरण उपयोग और ग्रामीण उद्यमों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये अधिक नेटवर्क निवेश की आवश्यकता होगी।
    • इसके बिना बिजली कटौती का जोखिम बना रहेगा। RDSS तंत्र की सशक्तिकरण योजनाओं को इस चुनौती पर केंद्रित होना चाहिये।
  • कृषि उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं को पूरा करना: पीएम-कुसुम योजना के तहत मेगावाट स्केल सौर संयंत्र—जो समर्पित कृषि फीडरों को प्रत्यक्ष रूप से निर्बाध आठ घंटे बिजली प्रदान कर सकते हैं, स्थापित कर किसानों की बड़ी संख्या को दिन के समय, कम लागतपूर्ण आपूर्ति प्रदान की जा सकती है। 
    • यह किसानों की आश्वस्त आपूर्ति की मांग को पूरा करेगा और डिस्कॉम की लागत एवं सब्सिडी आवश्यकताओं को लगभग आधा कर देगा।
    • RDSS फीडर सोलराइज़ेशन में तेज़ी लाने हेतु समर्पित कृषि फीडरों के लिये निवेश और अनुदान को प्राथमिकता देता है। यह अनुदान सहायता विश्वसनीय आपूर्ति प्रदान कर सकती है और सब्सिडी आवश्यकताओं को कम कर सकती है।
  • वितरण फीडरों की स्वचालित मीटरिंग: वितरण कंपनियाँ नुकसान में कमी दिखाने के लिये प्रायः मीटर रहित उपभोग का अति-आकलन कर नुकसानों का अल्प-आकलन करती हैं।
    • सही परिदृश्य के लिये सभी फीडरों को ऐसे मीटरों से सुसज्जित किया जाना चाहिये जो मानवीय हस्तक्षेप के बिना रीडिंग को संप्रेषित करने में सक्षम हों। राज्यों को इसके लिये स्वचालित मीटर रीडिंग पर RDSS के ज़ोर का लाभ उठाना चाहिये।
  • राज्यों की भूमिका: राज्यों को कार्यान्वयन संबंधी समस्याओं की पहचान करनी चाहिये और मीटरिंग के लिये उपयुक्त रणनीति अपनानी चाहिये। उन्हें लागतों की तुलना में लाभों का आकलन करने के लिये रूपरेखाएँ विकसित करनी चाहिये।
    • अपनी कार्ययोजनाओं में राज्यों को लचीलेपन की आवश्यकता पर ज़ोर देना चाहिये और वितरण कंपनियों को प्रीपेड एवं पोस्टपेड मीटरिंग के बीच एक सूचित विकल्प चुनने की अनुमति देनी चाहिये।
    • इसके साथ ही, राज्य नियामक को स्मार्ट मीटर के कारण लागत में कमी और प्रदर्शन में सुधार का मूल्यांकन करने और ऐसे निवेशों के कारण उपभोक्ताओं को अनुचित टैरिफ प्रभावों से बचाने के लिये एक रूपरेखा तैयार करनी चाहिये।
    • केंद्र सरकार की एजेंसियों को भी निगरानी, ट्रैकिंग और फंड वितरण व्यवस्था के मामले में पर्याप्त लचीला होना चाहिये।

अभ्यास प्रश्न: बिजली वितरण कंपनियों (DISCOMs) के समक्ष विद्यमान समस्याओं की चर्चा कीजिये और विचार कीजिये कि पुर्नोत्थान वितरण क्षेत्र सुधार योजना (RDSS) में संशोधन किस प्रकार इसकी वर्तमान स्थिति में सुधार कर सकते हैं।

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