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UN ‘ग्रीनहाउस गैस बुलेटिन’ (Greenhouse gas bulletin) रिपोर्ट

  • 24 Nov 2018
  • 8 min read

चर्चा में क्यों?


संयुक्त राष्ट्र में मौसम विज्ञान से जुड़ी संस्था विश्व मौसम विज्ञान संगठन (World Meteorological Organisation) ने हाल ही में ‘ग्रीनहाउस गैस बुलेटिन’ नामक एक वार्षिक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट के अनुसार, वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गई है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने 2018 में की गई प्रतिबद्धताओं पर यह रिपोर्ट जारी की है। यह रिपोर्ट 2017 के आँकड़ों पर आधारित है।

रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु

  • कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड का स्तर पूर्व औद्योगिक स्तर से काफी अधिक और इसमें कमी होने की कोई संभावना दूर-दूर तक नहीं दिखाई दे रही।
  • कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों में कटौती किये बिना जलवायु परिवर्तन (Climate change) का खतरा तेज़ी से बढ़ता जाएगा और पृथ्वी पर इसका अपरिवर्तनीय प्रभाव पड़ेगा।
  • कार्बन डाइऑक्साइड व अन्य ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भारी कटौती नहीं की गई तो जलवायु परिवर्तन का पृथ्वी के जीव-जगत पर विनाशकारी असर होगा।
  • वातावरण में मौजूद आवश्यकता से अधिक कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा को हटाने के लिये वर्तमान में कोई प्रभावी उपाय नहीं है।
  • कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन की मात्रा में भारी कटौती करना ही जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटने का एकमात्र रास्ता है।

क्या हैं ग्रीनहाउस गैसें?


कार्बन डाइऑक्साइड (Co2): वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा 2015 और 2016 के मुकाबले 2017 में ज़्यादा बढ़ी है। 2017 में वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर 405.5 parts per million (ppm) वैश्विक औसत पर पहुँच गया, जो औद्योगिक क्रांति से पहले की तुलना में ढाई गुना अधिक है। 2016 में वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर 403.3 ppm और 2015 में 400.1 ppm था।

मीथेन (Methane) : 2017 में वायुमंडल में मीथेन 1859 ppb (part per billion) के नए ऊँचे स्तर पर पहुँच गया। यह पूर्व-औद्योगिक स्तर से 257 फीसदी ज़्यादा है।
नाइट्रस ऑक्साइड (Nitrous Oxide): वायुमंडल में नाइट्रस ऑक्साइड का स्तर 2017 में 329.9 ppb रहा। यह पूर्व-औद्योगिक स्तर का 122 फीसदी है।

CFC-11: इनके अलावा ओज़ोन (Ozone) परत को नुकसान पहुँचाने वाली CFC-11 गैसों का स्तर भी वायुमंडल में काफी अधिक बढ़ा है। यह एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है जो ओज़ोन परत के क्षरण के लिये ज़िम्मेदार है। CFC-11 गैसों को मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (Montreal Protocol) के तहत विनियमित किया गया है।

विश्व मौसम विज्ञान संगठन के प्रमुख Petteri Taalas के अनुसार, “कार्बन डाइऑक्साइड व अन्य ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भारी कटौती नहीं की गई तो जलवायु परिवर्तन का पृथ्वी पर जीवन के लिये विनाशकारी असर होगा। इस समस्या से मुकाबला करने का अवसर लगभग खत्म हो चुका है। ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने के लिये तुरंत कुछ बड़े कदम उठाने होंगे।“

विश्व मौसम विज्ञान संगठन

WMO


इसकी शुरुआत 1873 में स्थापित अंतर्राष्ट्रीय मौसम संगठन के रूप में हुई थी। इसके बाद 23 मार्च, 1950 को WMO कन्वेंशन के अनुमोदन से विश्व मौसम विज्ञान संगठन की स्थापना हुई।  यह पृथ्वी के वायुमंडल की परिस्थिति और व्यवहार, महासागरों के साथ इसके संबंध, मौसम और परिणामस्वरूप जल संसाधनों के वितरण के बारे में जानकारी देने के लिये संयुक्त राष्ट्र (UN) की आधिकारिक संस्था है। 191 सदस्यों वाले विश्व मौसम विज्ञान संगठन का मुख्यालय जिनेवा (Geneva) में स्थित है।


ग्लोबल वार्मिंग (Global warming) पर IPCC की रिपोर्ट


कुछ समय पहले जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) द्वारा भी इसी प्रकार की एक विशेष रिपोर्ट जारी की गई थी। तब IPCC को विशेष रूप से ग्लोबल वार्मिंग पर पेरिस समझौते (Paris agreement) में तय किये गए 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान की वैज्ञानिक व्यवहार्यता का पता लगाने के लिये कहा गया था। IPCC की आकलन रिपोर्ट में भी पृथ्वी के भविष्य की खतरनाक तस्वीर उजागर की गई थी।

IPCC क्या है?

IPCC


जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) जलवायु परिवर्तन से संबंधित वैज्ञानिक आकलन करने हेतु संयुक्त राष्ट्र का एक निकाय है, जिसमें 195 सदस्य देश हैं। इसे संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) और विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) द्वारा 1988 में स्थापित किया गया था।

इसका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन, इसके प्रभाव और भविष्य के संभावित जोखिमों के साथ-साथ अनुकूलन तथा जलवायु परिवर्तन को कम करने हेतु नीति निर्माताओं को रणनीति बनाने के लिये नियमित वैज्ञानिक सूचनाएँ प्रदान करना है। IPCC सभी स्तरों पर सरकारों को वैज्ञानिक सूचनाएँ प्रदान करता है और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये अंतर्राष्ट्रीय वार्ताओं में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

आपको बता दें कि अगले महीने पोलैंड (Poland) में CoP 24 जलवायु शिखर सम्मेलन (Climate summit) का आयोजन होने जा रहा है। ऐसे में विश्व मौसम संगठन द्वारा ‘ग्रीनहाउस गैस बुलेटिन’ नामक यह वार्षिक रिपोर्ट और इससे पहले IPCC द्वारा रिपोर्ट जारी करना बहुत मायने रखता है। इन रिपोर्टों के माध्यम से CoP 24 जलवायु शिखर सम्मेलन के पहले संयुक्त राष्ट्र एक बार फिर 2015 पेरिस समझौते में तय किये गए तापमान में दो डिग्री सेल्सियस की कमी लाने के लक्ष्य के लिये सरकारों पर दबाव बनाने का प्रयास कर रहा है।


स्रोत: The Hindu BusinessLine, Live Mint, Indian Express

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