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जैव विविधता और पर्यावरण

ड्राफ्ट एनवायरमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट नोटिफिकेशन 2020

  • 29 Jul 2020
  • 11 min read

प्रीलिम्स के लिये:

ड्राफ्ट एनवायरमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट नोटिफिकेशन, 2020, स्टॉकहोम घोषणा (1972)

मेन्स के लिये:

ड्राफ्ट एनवायरमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट नोटिफिकेशन, 2020 की पृष्ठभूमि 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय ने पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) अधिसूचना, 2020 के मसौदे पर जनता की प्रतिक्रिया के लिये समयसीमा बढ़ा दी है।

प्रमुख बिंदु:

  • दिल्ली उच्च न्यायालय ने पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) अधिसूचना, 2020 के मसौदे पर जनता की प्रतिक्रिया की समय सीमा 11 अगस्त तक बढ़ा दी। सरकार द्वारा 10 अगस्त से 30 जून तक की समयसीमा में बदलाव करने के बाद ऐसा हुआ।
  • COVID-19 के करण राजपत्र में मसौदे के प्रकाशन में 19 दिनों की देरी हुई थी। इसलिये जब हज़ारों लोगों ने सार्वजनिक प्रतिक्रिया के लिये अनिवार्य 60-दिवसीय खिड़की के विस्तार के निवेदन के लिये ईमेल किया तो पर्यावरण मंत्रालय के शीर्ष अधिकारियों ने 10 अगस्त तक 60 अतिरिक्त दिनों को अनुमति देने के लिये उपयुक्त माना।
  • लेकिन पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने 30 जून की नई समय-सीमा निर्धारित की गई। यह उन कार्यकर्ताओं के हित में नहीं था, जो ड्राफ्ट की वापसी के लिये पूरा ज़ोर लगा रहे थे। 

पृष्ठभूमि

  • पर्यावरण पर स्टॉकहोम घोषणा (1972) के एक हस्ताक्षरकर्ता के रूप में भारत ने जल (1974) और वायु (1981) प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिये जल्द ही कानून बनाए। लेकिन वर्ष 1984 में भोपाल गैस रिसाव आपदा के बाद ही देश ने 1986 में पर्यावरण संरक्षण के लिये एक अम्ब्रेला अधिनियम बनाया।

स्टॉकहोम घोषणा (1972)

  • अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण चेतना एवं पर्यावरण आंदोलन के प्रारंभिक सम्मेलन के रूप में 1972 में संयुक्त राष्ट्रसंघ ने स्टॉकहोम (स्वीडन) में दुनिया के सभी देशों का पहला पर्यावरण सम्मेलन आयोजित किया गया था। इस अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में 119 देशों ने भाग लिया और एक ही धरती के सिद्धांत को सर्वमान्य तरीके से मान्यता प्रदान की गई।
  • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत, भारत ने 1994 में अपने पहले ईआईए मानदंडों को अधिसूचित किया, जो प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग, उपभोग और (प्रदूषण) को प्रभावित करने वाली गतिविधियों को विनियमित करने के लिये एक कानूनी तंत्र स्थापित करता है। हर विकास परियोजना को पहले पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्त करने के लिये ईआईए प्रक्रिया से गुजरना आवश्यक है।
  • 1994, ईआईए अधिसूचना को वर्ष 2006 में संशोधित मसौदे के साथ बदल दिया गया था। इस वर्ष की शुरुआत में सरकार ने वर्ष 2006 से जारी संशोधनों और प्रासंगिक न्यायालय के आदेशों को शामिल करने और ईआईए की प्रक्रिया को "और अधिक पारदर्शी और तेज़ बनाने के लिये इसे फिर से तैयार किया।"

विवाद

  • हालांकि कार्यकर्ताओं के अनुसार, पर्यावरण की सुरक्षा के लिये स्थापित ईआईए प्रक्रिया ने, उद्योगों को दी गई वास्तविक रियायतों की एक श्रृंखला के लिये कानूनी कागजी कार्रवाई का मुखौटा पेश करके अक्सर विपरीत काम किया है।
  • उदाहरण के लिये, पर्यावरण पर परियोजनाओं के संभावित (हानिकारक) प्रभावों की रिपोर्ट जो ईआईए प्रक्रिया का आधार है, अक्सर संदेहपूर्ण और सलाहकार एजेंसियाँ ​​होती हैं जो उन रिपोर्टों को एक शुल्क के बदले तैयार करती हैं जिन्हें शायद ही कभी विश्वसनीय माना जाता है। अनुपालन सुनिश्चित करने की प्रशासनिक क्षमता का अभाव अक्सर निकासी अनुमति के शर्तों की लंबी सूचियों को अर्थहीन बना देता है। फिर समय के साथ किये गए संशोधन, उद्योगों के किसी वर्ग को जांच में छूट देते हैं।
  • दूसरी ओर, डेवलपर्स की शिकायत है कि ईआईए काल ने उदारीकरण की भावना को ठंडा कर दिया, जिससे लालफीताशाही और किराए के काम को बल मिल गया। UPA-II के कार्यकाल के दौरान प्रोजेक्ट क्लीयरेंस में देरी वर्ष 2014 में एक चुनावी मुद्दा बन गया।

समस्या 

  • वर्ष 2020 का मसौदा ईआईए प्रक्रिया पर राजनीतिक और नौकरशाही के लिये कोई उपाय नहीं करता है, और न ही उद्योगों के लिये। इसके बजाय, यह पर्यावरण की सुरक्षा में सार्वजनिक सहभागिता को सीमित करते हुए सरकार की विवेकाधीन शक्ति का बढ़ाया जाना प्रस्तावित करता है।
  • जबकि राष्ट्रीय रक्षा और सुरक्षा से संबंधित परियोजनाओं को स्वाभाविक रूप से रणनीतिक माना जाता है, सरकार अन्य परियोजनाओं के "रणनीतिक" टैग पर विचार करती है। 2020 के मसौदे में  "ऐसी परियोजनाओं को सार्वजनिक क्षेत्र में रखे जाने" जैसी कोई जानकारी नहीं है। यह वैसे किसी भी रणनीतिक योग्य समझे जाने वाले परियोजनाओ  के अविलंबित क्लियरेंस के लिये एक रास्ता खोल देता है, बिना किसी स्पष्टीकरण के।
  • इसके अतिरिक्त, नया मसौदा परियोजनाओं की एक लंबी सूची को सार्वजनिक परामर्श से मुक्त करता है। उदाहरण के लिये, सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़क और पाइपलाइन जैसी अनुक्रमिक परियोजनाओं को किसी भी सार्वजनिक सुनवाई की आवश्यकता नहीं होगी। 'सीमा क्षेत्र' को "भारत के सीमावर्ती देशों के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा से 100 किलोमीटर हवाई दूरी के भीतर गिरने वाले क्षेत्र" के रूप में परिभाषित किया गया है। यह पूर्वोत्तर के अधिकांश भाग जो देश की सबसे समृद्ध जैव विविधता के भंडार है, उनको कवर करेगा।

किसे छूट है?

  • सभी अंतर्देशीय जलमार्ग परियोजनाओं और राष्ट्रीय राजमार्गों के विस्तार/चौड़ीकरण जो सरकार द्वारा मुख्य रूप से केंद्रित क्षेत्र हैं, इन संबंधित क्षेत्रों को पूर्व अनुमति प्रदान किये जाने से छूट दी जाएगी। इनमें वे सड़कें शामिल हैं जो जंगलों से गुजरती हैं और प्रमुख नदियों को विभाजित करती हैं।
  • वर्ष 2020 के मसौदे में 1,50,000 वर्ग मीटर क्षेत्र में निर्मित अधिकांश भवन निर्माण परियोजनाओं को भी छूट दी गई है। यह पर्यावरण मंत्रालय के दिसंबर 2016 की अधिसूचना का पुनर्मूल्यांकन है जिसे दिसंबर 2017 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा अस्वीकार किया गया था। 

बड़ा परिवर्तन 

  • नए मसौदे में दो सबसे महत्वपूर्ण बदलाव कार्योत्तर परियोजना की मंज़ूरी और जन विश्वास के सिद्धांत को छोड़ने के प्रावधान हैं। पर्यावरण अधिनियम का उल्लंघन करने वाली परियोजनाएँ भी अब मंज़ूरी के लिये आवेदन कर सकेंगी। यह बिना मंज़ूरी के संचालित होने वाली परियोजनाओं के लिये मार्च, 2017 की अधिसूचना का पुनर्मूल्यांकन है।
  • सभी उल्लंघनकर्ता को सुधार करने और संसाधन वृद्धि के लिये "उल्लंघन के कारण व्युत्पन्न पारिस्थितिक क्षति और आर्थिक लाभ" के 1.5-2 गुना के बराबर दो योजनाओं की आवश्यकता होगी। 
  • 1 अप्रैल को एक आदेश में, सर्वोच्च न्यायालय ने कानून के विपरीत "कार्योत्तर पर्यावरणीय मंज़ूरी" को लागू किया था। 
  • वर्ष 2020 के मसौदे में यह भी बताया गया है कि सरकार इस तरह के उल्लंघनों का कैसे संज्ञान लेगी। इसकी रिपोर्ट या तो सरकारी प्राधिकरण या स्वयं डेवलपर्स को करनी होती है। उल्लंघन के बारे में किसी भी सार्वजनिक शिकायत की कोई गुंजाइश नहीं है। 

कानूनी प्रश्न

  • नई परियोजनाओं की स्थापना या मौजूदा परियोजनाओं के विस्तार या आधुनिकीकरण पर प्रतिबंध लगाने के लिये पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 3 के तहत एक ईआईए अधिसूचना जारी की जाती है। धारा यह निर्धारित करता है कि ऐसे उपायों से पर्यावरण को लाभ होना चाहिए।
  • 1 अप्रैल के आदेश में सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा: "धारा 3 के संदर्भ में की जाने वाली केंद्र सरकार की कार्रवाई , पर्यावरण के गुणवत्ता की रक्षा और सुधार करने और पर्यावरण प्रदूषण को रोकने, नियंत्रित करने और समाप्त करने के उद्देश्य से आवश्यक होने या वांछनीय होने के वैधानिक आवश्यकता का पालन करता हो ।
  • इसके विभिन्न प्रावधान जो सरकार के "ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस" सिद्धांत को सुविधाजनक बनाने के उद्देश्य से हैं, इस प्रश्न को प्रासंगिक बनाए रखते है कि क्या यह अधिसूचना पर्यावरण अधिनियम के उद्देश्य से जुड़ी है?

स्रोत- द हिंदू

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