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अंतर्राष्ट्रीय संबंध

अंडमान सागर क्षेत्र में ‘सैन्य विस्तार’

  • 20 Oct 2017
  • 5 min read

संदर्भ

हाल ही में रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह पर स्थित भारतीय चौकियों का दौरा किया तथा वहाँ उपस्थित देश के एकमात्र ‘त्रिकोणीय सेवा कमांड’ (tri-service command) के सैनिकों से उस क्षेत्र के हालातों का जायजा भी लिया| विदित हो कि भारत, बंगाल की खाड़ी और अंडमान सागर के संधि बिंदु (juncture) पर मौजूद अपनी चौकी की सैन्य प्रभाविता का विस्तार करने के लिये कार्य कर रहा है|

प्रमुख बिंदु

  • भारत द्वारा इस द्वीपसमूह में अधिकाधिक नौसैनिकों की उपस्थिति के लिये ‘सैन्य अवसंरचना’ का निर्माण भी किया जा रहा है| यह द्वीपसमूह सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण मलक्का जलसंधि के महत्त्व को परिभाषित करता है| 
  • ‘एक्ट ईस्ट’ नीति को ध्यान में रखकर और हिन्द महासागर क्षेत्र और दक्षिण-पूर्व एशिया में भावी परिदृश्य का अवलोकन करते हुए भारत का ध्यान इस समय सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह के विकास पर ही है| वे इससे पहले भी अंडमान और निकोबार कमांड (Andaman and Nicobar Command -ANC) के कमांडर पद पर कार्य कर चुके हैं|
  • दरअसल, भारत द्वारा इस क्षेत्र में ‘सैन्य विस्तार’ करने का तात्पर्य चीन की उपस्थिति का विरोध करना है, जो कि एक चिंताजनक विषय है| भारतीय नौसेना द्वारा इस क्षेत्र में चीनी पनडुब्बियाँ देखी गई हैं| यह दक्षिणवर्ती द्वीप सुमात्रा (इंडोनेशिया) से मात्र 150 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है|
  • आई.एन.ए.एस. बाज़ (INAS Baaz) पर स्थिति हवाई पट्टी का विस्तार वर्तमान में 10,000 फीट (इससे पहले यह 3,050 फीट ही था) तक कर दिया गया है|
  • आई.एन.ए.एस. बाज़ ग्रेट निकोबार की कैम्पबेल खाड़ी में स्थित एक ‘नौसैनिक विमानन बेस’ (naval aviation base) है|  इस विस्तार के कारण नौसेना अपने अत्याधुनिक P-8I निगरानी विमान को आई.एन.ए.एस बाज़ पर रखने में सक्षम होगी| 
  • वर्तमान में नौसेना अपने आठ P-8I विमानों का संचालन करती है, जिन्हें इसने वर्ष 2013 में अमेरिका से खरीदा था| यह इन विमानों का संचालन तमिलनाडु में ‘अरकोनम’ स्थित ‘आई.एन.एस. राजाली बेस’ (INS Rajali base) से करती है|
  • यदि इन P-8I विमानों को कैम्पबेल खाड़ी में भेजा जाता है तो देश का निगरानी तंत्र कई हज़ार किलोमीटर दूरी का तक निगरानी करने में सक्षम होगा| बाज़ के कारण ऐसा संभव है| यह भारत के निगरानी तंत्र को मजबूत करेगा जोकि दक्षिण चीन सागर को भी कवर करेगा| इसके अतिरिक्त, बाज़ मलक्का जलसंधि से भी सटा हुआ है|  मलक्का जलसंधि भारत के लिये अत्यधिक सामरिक महत्त्व का क्षेत्र है|
  • नौसेना ने दिसम्बर 2017 तक पोर्ट ब्लेयर के समीप अपने दूसरे ‘फ्लोटिंग ड्राई डॉक नेवी’ (Floating Dry Dock Navy -FDDN)  की शुरुआत करने की भी योजना बनाई है| इसका निर्माण लार्सन और टुर्बो द्वारा किया गया था| इसके बाद इस द्वीपसमूह में  द्वीप समूह अधिकाधिक नौसैनिक जहाजों का प्रबंधन और संचालन किया जा सकेगा|
  • नौसेना इस द्वीपसमूह पर अवस्थित डिगलीपुर (Diglipur), कामोर्ता(Kamorta) और कैम्पबेल खाड़ी में तीन ‘अग्र संचालक बेसों’ (forward operating bases-FOBs)  का भी निर्माण कर रही है, जिनके माध्यम से ‘खुखरी वर्ग के लड़ाकू जलपोतों’(Khukri class corvettes) का द्वीपसमूह के विभिन स्थानों पर वितरण किया जा सकेगा|
  • अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह पर सैन्य अवसंरचना का निर्माण करने के लिये इस द्वीपसमूह के ‘असैन्य प्रशासन’ के साथ समन्वय स्थापित करने की आवश्यकता होगी|
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