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  • 26 Mar, 2020
  • 16 min read
आंतरिक सुरक्षा

नक्सलवाद: कारण और निवारण

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में नक्सलवाद तथा उसके कारण और निवारण से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ 

इस समय भारत कोरोना वायरस के संकट से जूझ रहा है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (Indian Council of Medical Research-ICMR) के अनुसार, कोरोना वायरस के कारण देश में अभी तक 12 लोगों की मृत्यु हो चुकी है। इस भीषण संकट की घड़ी में बरबस ही एक खबर ने लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। यह खबर छत्तीसगढ़ के सुकमा में स्पेशल टास्क फोर्स और डिस्ट्रिक्ट रिज़र्व गार्ड के जवानों पर हुए जानलेवा नक्सल हमले से संबंधित थी। इस घातक हमले में 17 जवान शहीद हो गए और 14 जवान घायल हुए हैं। 

निश्चित ही आज यह प्रश्न विचारणीय है कि नक्सलवाद मूल रूप से कानूनी समस्या है या विषमता से उत्पन्न लावा है। विचारकों का एक वर्ग जहाँ नक्सलवाद को आतंकवाद जैसी गतिविधियों से जोड़कर इसे देश की आतंरिक सुरक्षा के लिये सबसे बड़ी चुनौती मानता है तो दूसरा वर्ग इसे सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक विषमताओं एवं दमन-शोषण की पीड़ा से उपजा एक स्वतः स्फूर्त विद्रोह समझकर इसका पक्षपोषण करता है। 

“हाँ, अब हमने उठा ली हैं तुम्हारे खिलाफ बंदूक 

तुम जो समझते हो तमंचों की भाषा”  

इस आलेख में नक्सलवाद, नक्सलवाद के कारण व उससे उपजी परिस्थितियों का विश्लेषण करने का प्रयास किया जाएगा। इसके साथ ही इस समस्या से निपटने में सरकार के द्वारा किये जा रहे प्रयासों की भी समीक्षा की जाएगी।

नक्सलवाद की वैचारिक पृष्ठभूमि

  • भारत में नक्सली हिंसा की शुरुआत वर्ष 1967 में पश्चिम बंगाल में दार्जिलिंग ज़िले के नक्सलबाड़ी गाँव से हुई थी। नक्सलबाड़ी गाँव के नाम पर ही उग्रपंथी आंदोलन को नक्सलवाद कहा गया।  
  • ज़मींदारों द्वारा छोटे किसानों पर किये जा रहे के उत्पीड़न पर अंकुश लगाने के लिये भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कुछ नेता सामने आए। इन नेताओं में चारू मजूमदार, कानू सान्याल और कन्हाई चटर्जी का नाम प्रमुख है।
  • कुछ कम्युनिस्टों द्वारा गुरिल्ला युद्ध के ज़रिये राज्य को अस्थिर करने के लिये हिंसा का इस्तेमाल किया जाता है। इसे ही नक्सलवाद कहा जाता है। भारत में ज़्यादातर नक्सलवाद माओवादी विचारधाराओं पर आधारित है। इसके ज़रिये वे मौजूदा शासन व्यवस्था को उखाड़ फेंकना चाहते हैं और लगातार युद्ध के ज़रिये 'जनताना सरकार' लाना चाहते हैं।
  • भारत में जहाँ वामपंथी आंदोलन पूर्व सोवियत संघ से प्रभावित था वहीँ आज का माओवाद चीन से प्रभावित है। ये मौजूदा माओवाद हिंसा और ताकत के बल पर समानांतर सरकार बनाने का पक्षधर है। इसके अलावा अपने उद्देश्य के लिये ये किसी भी प्रकार की हिंसा को उचित मानते हैं।
  • इसके साथ ही इन दिनों शहरी नक्सलवादी गतिविधियाँ भी देखने को मिल रही हैं।

शहरी नक्सलवाद

  • विगत कुछ वर्षों में शहरी नक्सलवाद या अर्बन नक्सलिज़्म शब्द बड़ी तेजी से सामने आया है। शहरी नक्सलवाद से मतलब, उन शहरी आबादी में रहने वाले लोगों से हैं जो प्रत्यक्ष तौर पर तो नक्सलवादी नहीं है, लेकिन वो नक्सलवादी संगठनों के प्रति और उनकी गतिविधियों के प्रति सहानुभूति रखते हैं। 
  • कई बार इन पर नक्सलियों के लिये युवाओं की भर्ती मदद करने का भी आरोप लगता रहा है।

नक्सलवाद के चरण

  • प्रथम चरण- वर्ष 1967 से 1980 तक का समय नक्सलवादी गतिविधियों का प्रथम चरण था। इसका प्रथम चरण मार्क्सवादी-लेनिनवादी-माओवाद पर आधारित था, अर्थात यह ‘वैचारिक और आदर्शवादी’ आंदोलन का चरण रहा है। इस चरण में नक्सलवादियों को ‘ज़मीनी अनुभव तथा अनुमान की कमी’ देखने को मिली। इस चरण में नक्सलियों को ‘‘राष्ट्रीय पहचान” अवश्य मिली।
  • द्वितीय चरण- वर्ष 1980 से 2004 तक का समय  ज़मीनी अनुभव, ज़रुरत और आवश्यकता के आधार पर चलने वाला क्षेत्रीय नक्सली गतिविधियों का दौर था। इस चरण में नक्सलवाद का व्यवहारिक विकास हुआ।
  • तृतीय चरण- वर्ष 2004 से वर्तमान में ज़ारी इस चरण में नक्सलियों का ‘राष्ट्रीय स्वरूप’ उभरा और ‘विदेशी संपर्क’ बढ़े, जिससे अब नक्सलवाद राष्ट्र की ‘सबसे बड़ी आंतरिक चुनौती’ बनकर उभरा।

नक्सलवाद की उत्पत्ति के कारण

  • नक्सलियों का कहना है कि वे उन आदिवासियों और गरीबों के लिये लड़ रहे हैं, जिनकी सरकार ने दशकों से अनदेखी की है। वे ज़मीन के अधिकार एवं संसाधनों के वितरण के संघर्ष में स्थानीय सरोकारों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • माओवाद प्रभावित अधिकतर इलाके आदिवासी बहुल हैं और यहाँ जीवनयापन की बुनियादी सुविधाएँ तक उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन इन इलाकों की प्राकृतिक संपदा के दोहन में सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र की कंपनियों ने कोई कमी नहीं छोड़ी है। यहाँ न सड़कें हैं, न पीने के लिये पानी की व्यवस्था, न शिक्षा एवं स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएँ और न ही रोज़गार के अवसर।
  • नक्सलवाद के उभार के आर्थिक कारण भी रहे हैं। नक्सली सरकार के विकास कार्यों के कार्यान्वयन में बाधा उत्पन्न करते हैं। वे आदिवासी क्षेत्रों का विकास नहीं होने देते और उन्हें सरकार के खिलाफ भड़काते हैं। वे लोगों से वसूली करते हैं एवं समांतर अदालतें लगाते हैं।
  • प्रशासन तक पहुँच न हो पाने के कारण स्थानीय लोग नक्सलियों के अत्याचार का शिकार होते हैं।
  • अशिक्षा और विकास कार्यों की उपेक्षा ने स्थानीय लोगों एवं नक्सलियों के बीच गठबंधन को मज़बूत बनाया है।
  • सामाजिक विषमता ही वर्ग संघर्ष की जननी है। आज़ादी के बाद भी इस विषमता में कोई कमी नहीं आयी। नक्सलियों के लिये यह एक बड़ा मानसिक हथियार है।
  • शासन की जनहित के लिये बनने वाली योजनाओं के निर्माण एवं उनके क्रियान्वयन में गंभीरता, निष्ठा व पारदर्शिता का अभाव रहता है जिससे वंचितों को भड़काने और नक्सलियों की नई पौध तैयार करने के लिये इन माओवादियों को अच्छा बहाना मिल जाता है।
  • आम जनता को अब यह समझ में आने लगा है कि सत्ता के केंद्र में बैठे लोगों में न तो सामाजिक विषमतायें समाप्त करने, न भ्रष्टाचार को प्रश्रय देना बंद करने और न ही नक्सली समस्या के उन्मूलन के प्रति लेशमात्र भी राजनीतिक इच्छाशक्ति है। आर्थिक घोटालों के ज्वार ने नक्सलियों को देश में कुछ भी करने की मानसिक स्वतंत्रता प्रदान कर दी है।

सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयास

  • आमतौर पर  कानून-व्यवस्था राज्य सूची का विषय होता है यानी राज्य में कानून और व्यवस्था बनाए रखने का काम संबंधित राज्य का होता है। लेकिन नक्सलवाद की विकटता को देखते हुए वर्ष 2006 में तत्कालीन प्रधानमंत्री ने इसको राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षा के लिये सबसे बड़ी चुनौती बताया। उसके बाद गृह मंत्रालय में नक्सलवाद की समस्या से निपटने के लिये एक अलग प्रभाग बनाया गया।
  • सरकार वामपंथी चरमपंथ से प्रभावित क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचे, कौशल विकास, शिक्षा, ऊर्जा और डिजिटल कनेक्टिविटी के विस्तार पर काम कर रही है।
  • सरकार वामपंथी अतिवाद से प्रभावित क्षेत्रों में सड़कें बनाने की योजना पर तेज़ी से काम कर रही है और वर्ष 2022 तक 48,877 किमी. सड़कें बनाने का लक्ष्य रखा गया है।
  • वर्ष 2013 में आजीविका योजना के तहत ‘रोशनी’ नामक विशेष पहल की शुरूआत की गई थी ताकि सर्वाधिक नक्सल प्रभावित ज़िलों में युवाओं को रोज़गार के लिये प्रशिक्षित किया जा सके।
  • वर्ष 2008 में नक्सल समस्या से निपटने के लिये केंद्र सरकर ने आठ सूत्रीय 'समाधान’नाम से एक कार्ययोजना की शुरुआत की है।

समाधान पहल 

ऑपरेशन ‘समाधान’ भारत में नक्सली समस्या को हल करने के लिये गृह मंत्रालय द्वारा शुरू की गई  एक पहल है। समाधान से तात्पर्य है-

  • S-Smart leadership (कुशल नेतृत्व)
  • A-Aggressive strategy (आक्रामक रणनीति)
  • M-Motivation and training (अभिप्रेरणा एवं प्रशिक्षण)
  • A-Actionable intelligence (अभियोज्य गुप्तचर व्यवस्था)
  • D-Dashbord based key performance indicators and key result area (कार्ययोजना आधारित प्रदर्शन सूचकांक एवं परिणामोन्मुखी क्षेत्र) 
  • H-Harnessing technology (कारगर प्रौद्यौगिकी)
  • A-Action plan for each threat (प्रत्येक रणनीति की कार्ययोजना)
  • N-No access to financing (नक्सलियों के वित्त-पोषण को विफल करने की रणनीति)
  • सर्वाधिक नक्सल प्रभावित 30 ज़िलों में जवाहर नवोदय विद्यालय और केंद्रीय विद्यालय संचालित किये जा रहे हैं।
  • हिंसा का रास्ता छोड़कर समर्पण करने वाले नक्सलियों के लिये सरकार पुनर्वास की भी व्यवस्था करती है।

नक्सल समस्या के समाधान में आने वाली चुनौतियाँ 

  • दरअसल नक्सलवाद सामाजिक-आर्थिक कारणों से उपजा था। आदिवासी गरीबी और बेरोज़गारी के कारण एक निचले स्तर की जीवनशैली जीने को मज़बूर हैं। स्वास्थ्य-सुविधा के अभाव में गंभीर बीमारियों से जूझते इन क्षेत्रों में असामयिक मौत कोई आश्चर्य की बात नहीं। 
  • आदिवासियों का विकास करने के बजाय, उन्हें शिक्षा, चिकित्सा सेवा और रोजगार देने के बजाय उन्हें परेशान करने के नए-नए कानून बनाए जाते हैं।
  • आर्थिक असमानता, भ्रष्टाचार, खेती की दुर्दशा अभी भी जस की तस बनी हुई है। यकीनन इस तरह की समस्यायों में हमेशा असंतोष के बीज होते हैं, जिनमें विद्रोह करने की क्षमता होती है।
  • इन्हीं असंतोषों की वजह से ही नक्सलवादी सोच को बढ़ावा मिल रहा है। इससे बड़ी विडंबना ये है कि हमारी सरकारें शायद इस समस्या के सभी संभावित पहलुओं पर विचार नहीं कर रही। 
  • इसके साथ ही बुनियादी ढाँचे का अभाव तथा प्रशिक्षित मानव संसाधनों और संचार सुविधाओं की कमी है।
  • नक्सलियों द्वारा अंतर्राज्यीय सीमा का लाभ उठाया जाना तथा केंद्र और राज्यों तथा अन्य राज्यों के बीच आपसी समन्वय का अभाव।

आगे की राह

  • एक तरफ जहाँ इस समस्या की वजह आर्थिक और सामाजिक विषमता समझी जाती रही है, वहीं दूसरी ओर इसे अब एक राजनीतिक समस्या भी समझा जाने लगा है। यही कारण है कि जानकारों की नज़रों में नक्सलवाद सियासी दलों का एक ‘चुनावी तवा’ है जिस पर मौका मिलते ही रोटी सेंकने की कोशिश की जाती है।
  • ऐसा इसलिये भी कहा जाता है क्योंकि, हमारी सरकारें लगातार संविधान की पाँचवीं अनुसूची को तरजीह देने से कतराती रही हैं। गौरतलब है कि इस अनुसूची में अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण से जुड़े मामले आते हैं। 
  • पाँचवीं अनुसूची के तहत अनुसूचित क्षेत्रों में Tribes Advisory Council की स्थापना की बात की गई। दरअसल, इन क्षेत्रों में Advisory Council एक तरह की पंचायत है जो आदिवासियों को अपने क्षेत्रों में प्रशासन करने का अधिकार देती है। इस कौंसिल में अधिकतम 20 सदस्य होते हैं जिनके तीन-चौथाई सदस्य वे होते हैं जो संबंधित राज्य की विधान सभा में अनुसूचित क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं। 
  • यह सार्वभौमिक सत्य है कि हिंसा से प्राप्त की हुई व्यवस्था ज़्यादा दिन तक चल नहीं पाती और अंततः टूट जाती है। दूसरी ओर सरकार को भी कानून-व्यवस्था की समस्या से ऊपर उठकर इनकी मूलभूत समस्याओं को दूर करने के प्रयास करने चाहिये।  

प्रश्न- नक्सलवाद से आप क्या समझते हैं? नक्सलवाद के समाधान में आने वाली चुनौतियों का उल्लेख करते हुए, सरकार के द्वारा किये जा रहे प्रयासों का मूल्यांकन कीजिये।


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