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एडिटोरियल

  • 24 Jan, 2023
  • 16 min read
भारतीय राजनीति

पंचायत स्तर पर स्वायत्तता

यह एडिटोरियल 21/01/2023 को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित “There is hardly any autonomy at the panchayat level” लेख पर आधारित है। इसमें भारत में पंचायत स्तर पर विद्यमान मुद्दों के बारे में चर्चा की गई है।

संदर्भ

73वें और 74वें संशोधन अधिनियम— जिन्होंने स्थानीय सरकारों को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया, के तीन दशक से भी अधिक समय के बाद भी राज्य सरकारों द्वारा स्थानीय नौकरशाही के माध्यम से पंचायतों पर पर्याप्त विवेकाधीन अधिकार एवं प्रभाव का प्रयोग किया जाना जारी है।

  • भारत में स्थानीय निर्वाचित कार्यकारियों की शक्तियाँ राज्य सरकारों और स्थानीय नौकरशाहों द्वारा कई तरीकों से गंभीर रूप से नियंत्रित हैं, जिससे स्थानीय निकायों को सशक्त बनाने हेतु व्यक्त संवैधानिक संशोधनों की भावना को तनु कर दिया गया है।

पंचायत के कार्यकरण से संबद्ध प्रमुख समस्याएँ

  • वित्तीय स्वायत्तता का अभाव:
    • ग्राम पंचायतें अपनी दैनिक गतिविधियों के लिये राज्य और केंद्र से मिलने वाले अनुदान (विवेकाधीन एवं गैर-विवेकाधीन अनुदान) पर आर्थिक रूप से निर्भर बनी रहती हैं।
    • पंचायतों के पास धन के मुख्यतः तीन मुख्य स्रोत होते हैं:
      • राजस्व के अपने स्रोत: यह पंचायत की निधियों का एक छोटा सा भाग होता है। उदाहरण के लिये: स्थानीय कर, सामान्य संपत्ति संसाधनों से प्राप्त राजस्व आदि।
        • पंचायतों के लिये विवेकाधीन अनुदान तक पहुँच राजनीतिक और नौकरशाही संबंधों पर निर्भर करती है।
      • विवेकाधीन या योजना-आधारित निधि:
        • भारत में इन निधियों के साथ एक प्रमुख समस्या यह है कि वे प्रायः कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार से ग्रस्त होते हैं। यह स्थिति तब बनती है जब सरकारी अधिकारी व्यक्तिगत लाभ के लिये इन निधियों का दुरुपयोग करते हैं या जब इन निधियों का उपयोग इच्छित उद्देश्य के लिये नहीं किया जाता है।
    • यहाँ तक कि जब सरकार के उच्च स्तर से स्थानीय सरकारों को धन आवंटित किया जाता है, तब भी सरपंचों को उन तक पहुँच के लिये सहायता की आवश्यकता होती है। पंचायत खातों में स्वीकृत धन का सुस्त हस्तांतरण स्थानीय विकास को बाधित करता है।
  • अनुमोदन की धीमी प्रक्रिया:
    • सरकारें स्थानीय नौकरशाही के माध्यम से स्थानीय सरकारों को नियंत्रित रखती हैं।
    • सार्वजनिक निर्माण परियोजनाओं के अनुमोदन के लिये प्रायः तकनीकी स्वीकृति (इंजीनियरिंग विभाग की ओर से) और ग्रामीण विकास विभाग के स्थानीय अधिकारियों (जैसे खंड विकास अधिकारी की ओर से) से प्रशासनिक अनुमोदन की आवश्यकता होती है।
    • सरपंचों को सरकारी कार्यालयों का बार-बार चक्कर लगाना पड़ता है और स्थानीय नौकरशाहों की बाट जोहनी पड़ती है।
    • स्थानीय कर्मचारियों पर प्रशासनिक नियंत्रण रख सकने की सरपंचों की क्षमता भी सीमित है।
      • कई राज्यों में पंचायत को रिपोर्ट करने वाले स्थानीय पदाधिकारियों (जैसे ग्राम चौकीदार या सफाई कर्मचारी) की भर्ती ज़िला या प्रखंड स्तर पर की जाती है।
  • राजनीतिक हस्तक्षेप:
    • अन्य स्तरों पर निर्वाचित अधिकारियों के विपरीत, सरपंचों को पदावधि के दौरान बर्खास्त किया जा सकता है।
    • कई राज्यों में ग्राम पंचायत अधिनियमों ने ज़िला स्तर के नौकरशाहों, प्रायः ज़िला कलेक्टरों को आधिकारिक कदाचार के आधार पर सरपंचों के विरुद्ध कार्रवाई की शक्ति सौंप रखी है।
      • उदाहरण के लिये, तेलंगाना ग्राम पंचायत अधिनियम जिला कलेक्टरों को निवर्तमान सरपंचों को निलंबित और बर्खास्त करने की अनुमति देता है।
    • देश भर में नौकरशाहों द्वारा सरपंचों को पद से बर्खास्त करने के लगातार दृष्टांत प्राप्त होते रहे हैं, जो केवल एक कानूनी प्रावधान भर नहीं है।
      • तेलंगाना में हाल के वर्षों में 100 से अधिक सरपंचों को पद से बर्खास्त किया गया है।
  • प्रशिक्षित कर्मियों की कमी:
    • प्रशिक्षित कर्मियों की कमी भारत में पंचायतों के समक्ष मौजूद एक प्रमुख समस्या है।
    • कई पंचायत सदस्यों के पास अपने समुदायों के प्रभावी शासन के लिये आवश्यक प्रशिक्षण और कौशल की कमी होती है।
    • इससे पंचायतों के कार्यकरण में गलत निर्णयन, जवाबदेही की कमी और अक्षमता जैसी स्थिति बन सकती है ।
    • प्रशिक्षण की इस कमी के कुछ प्रमुख कारणों में शामिल हैं:
      • पंचायत सदस्यों के लिये, विशेष रूप से ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में प्रशिक्षण के अवसरों तक सीमित पहुँच।
      • पंचायत सदस्यों के प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण हेतु बजट आवंटन की अपर्याप्तता।
      • प्रभावी प्रशासन के लिये प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण के महत्त्व के बारे में पंचायत सदस्यों के बीच सीमित जागरूकता।
  • अपर्याप्त भागीदारी:
    • पंचायत की बैठकों और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में प्रायः नागरिकों की भागीदारी कम होती है।
    • बैठकों के बारे में जागरूकता की कमी, सरकार या स्थानीय नेताओं में विश्वास की कमी, भागीदारी के लिये नागरिकों के पास समय या संसाधनों की कमी या चर्चा के मुद्दों में रुचि की कमी कुछ अन्य संभावित कारण हैं जो भागीदारी को कम करते हैं।
    • इसके अतिरिक्त, कुछ नागरिकों में इस भरोसे की कमी हो सकती है कि उनकी आवाज़ सुनी जाएगी या उनकी चिंताओं को दूर किया जाएगा, जिससे वे भागीदारी के लिये हतोत्साहित हो सकते हैं।
  • भ्रष्टाचार:
    • कई पंचायतों में भ्रष्टाचार एक प्रमुख समस्या है, जहाँ धन और संसाधनों का दुरुपयोग या गबन किया जाता है।
    • स्थानीय सरकारी अधिकारी, जैसे भूमि रिकॉर्ड और भवन परमिट के प्रभारी, प्रायः भ्रष्ट आचरण (जैसे सेवाओं के बदले रिश्वत लेना) में संलग्न होते हैं।
    • यह विलंब और नागरिकों के लिये लागत में वृद्धि की स्थिति उत्पन्न कर सकता है तथा यह भूमि एवं अन्य संसाधनों के अवैध अधिग्रहण में भी योगदान दे सकता है।
    • इसके अतिरिक्त, स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार आर्थिक विकास और स्वास्थ्य सेवा एवं शिक्षा जैसी आवश्यक सेवाओं के वितरण को बाधित कर सकता है।
  • लैंगिक पक्षपात:
    • महिलाओं और वंचित समूहों को पंचायतों में प्रायः कम प्रतिनिधित्व प्राप्त होता है तथा उन्हें भागीदारी और निर्णयन के मामले में भेदभाव का सामना करना पड़ता है।
    • पंचायतों में महिलाओं की भागीदारी के लिये एक प्रमुख बाधा सामाजिक दृष्टिकोण है जो महिलाओं को पुरुषों की तुलना में हीन और कम सक्षम के रूप में देखता है।
      • इससे उन महिलाओं के लिये समर्थन की कमी की स्थिति बनती है जो पंचायत का नेतृत्व करना चाहती हैं और यह उनके लिये आवश्यक कौशल एवं अनुभव प्राप्त करना कठिन बना सकता है।
    • पंचायत में महिलाओं के लिये आरक्षित सीटों की कमी एक अन्य प्रमुख बाधा है।
      • हालाँकि भारत ने पंचायत राज संस्थानों में महिलाओं के लिये आरक्षण की शुरुआत की है, लेकिन आरक्षण का प्रतिशत अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग है और सभी राज्यों ने इसे लागू नहीं किया है।

अन्य प्रमुख पहलें

  • ‘स्वामित्व’ योजना:
    • प्रत्येक ग्रामीण परिवार के स्वामी को "अधिकारों का रिकॉर्ड" प्रदान करके ग्रामीण भारत की आर्थिक प्रगति को सक्षम करने के लिये राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस 2020 पर प्रधानमंत्री द्वारा ग्राम क्षेत्रों में सुधार प्रौद्योगिकी के साथ गाँवों का सर्वेक्षण और मानचित्रण (Survey of Villages and Mapping with Improvised Technology in Village Areas- SVAMITVA) योजना शुरू की गई थी।
  • ई-ग्राम स्वराज ई-वित्तीय प्रबंधन प्रणाली:
    • ई-ग्राम स्वराज पंचायती राज के लिये एक सरलीकृत कार्य आधारित लेखा अनुप्रयोग है।
  • संपत्ति की जियो-टैगिंग:
    • मंत्रालय ने एक मोबाइल आधारित समाधान “mActionSoft” विकसित किया है जो उन कार्यों के लिये जियो-टैग (यानी जीपीएस निर्देशांक) के साथ फोटो लेने में मदद करता है, जिनके पास आउटपुट के रूप में आस्तियाँ होती हैं।
  • सिटीज़न चार्टर:
    • सेवाओं के मानक के संबंध में अपने नागरिकों के प्रति पंचायती राज संस्थानों (PRI) की प्रतिबद्धता पर ध्यान केंद्रित करने के लिये, मंत्रालय ने ‘‘मेरी पंचायत मेरा अधिकार - जन सेवा हमारे द्वार’’ के नारे के साथ नागरिक चार्टर दस्तावेज़ अपलोड करने के लिये मंच प्रदान किया है।
  • संशोधित राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान (2022-23 से 2025-26):
    • संशोधित RGSA की योजना का मुख्य ध्यान पंचायती राज संस्थाओं को स्थानीय स्वशासन के जीवंत केंद्रों के रूप में पुन:कल्पना करने पर है जिसमें केंद्रीय मंत्रालयों और राज्यस्तरीय विभागों तथा अन्य हितधारकों के सुदृढ़ एवं सहयोगात्मक प्रयासों के माध्यम से विषयगत दृष्टिकोण अपनाते हुए ज़मीनी स्तर पर सतत विकास लक्ष्यों (LSDG) के स्थानीयकरण पर विशेष ध्यान दिया गया है।

आगे की राह

  • पंचायतों के लिये केंद्र और राज्य सरकार के आवंटन में वृद्धि करना:
    • मध्यस्थों के माध्यम से धन हस्तांतरण के बजाय पंचायतों को प्रत्यक्षतः धन का हस्तांतरण किया जा सकता है।
  • निर्णयन प्रक्रिया का विकेंद्रीकरण:
    • पंचायतों को धन के आवंटन और उपयोग के बारे में स्वयं निर्णय लेने का अधिकार सौंपा जाना चाहिए बजाय इसके कि सरकार के उच्च स्तरों द्वारा उनके लिये निर्णय लिये जाएँ।
  • पंचायतों का क्षमता निर्माण:
    • पंचायत सदस्यों और कर्मचारियों के लिये प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण कार्यक्रमों के माध्यम से इसे साकार किया जा सकता है ताकि वे वित्तीय संसाधनों का प्रभावी ढंग से प्रबंधन करने और विकास परियोजनाओं को लागू करने में सक्षम हो सकें।
  • लैंगिक पक्षपात को संबोधित करना:
    • पंचायत स्तर पर लैंगिक पूर्वाग्रह को संबोधित किया जाना चाहिए। इसके लिये पंचायत का नेतृत्व करने की इच्छुक महिलाओं के लिये प्रशिक्षण एवं संसाधन प्रदान करना और लैंगिक असमानता को बनाए रखने वाले सांस्कृतिक दृष्टिकोण को संबोधित करना आवश्यक है।
  • पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना:
    • नियमित बैठकों के आयोजन, सूचना के प्रसार, ई-गवर्नेंस प्रणाली को लागू करने, सूचनादाता/व्हिसलब्लोअर की सुरक्षा और सामाजिक लेखापरीक्षा के माध्यम से पारदर्शिता और जवाबदेही के मुद्दों को संबोधित किया जा सकता है।

अभ्यास प्रश्न: ज़मीनी स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में नागरिकों की भागीदारी और सेवाओं के अधिक प्रभावी एवं कुशल वितरण सुनिश्चित करने के लिये भारत में पंचायतों के कार्यकरण में सुधार के लिये कौन-से कदम उठाये जा सकते हैं?

  यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)  

Q. एक सुशिक्षित और संगठित स्थानीय स्तर की सरकारी प्रणाली के अभाव में, 'पंचायत' और 'समितियाँ मुख्य रूप से राजनीतिक संस्थाएँ बनी हुई हैं और शासन के प्रभावी साधन नहीं हैं। समालोचनात्मक चर्चा कीजिये। (वर्ष 2015)

Q. आप एक पंचायत के सरपंच हैं। आपके क्षेत्र में सरकार द्वारा संचालित एक प्राथमिक विद्यालय है। विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों को मध्याह्न भोजन दिया जाता है। प्रधानाध्यापक ने अब भोजन तैयार करने के लिये स्कूल में एक नया रसोइया नियुक्त किया है। हालाँकि जब यह पाया गया कि रसोइया दलित समुदाय से है तो उच्च जातियों के लगभग आधे बच्चों को उनके माता-पिता द्वारा भोजन करने की अनुमति नहीं है। नतीजतन स्कूलों में उपस्थिति तेज़ी से गिरती है। इसके परिणामस्वरूप मध्याह्न भोजन योजना को बंद करने उसके बाद शिक्षण कर्मचारियों और बाद में स्कूल को बंद करने की संभावना हो सकती है।

 (A) संघर्ष को दूर करने और सही माहौल बनाने के लिये कुछ व्यवहार्य रणनीतियों पर चर्चा करें।

 (B) ऐसे परिवर्तनों को स्वीकार करने के लिये सकारात्मक सामाजिक माहौल बनाने के लिये विभिन्न सामाजिक वर्गों और एजेंसियों की क्या ज़िम्मेदारियाँ होनी चाहिये? (वर्ष 2015)


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