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एडिटोरियल

  • 16 Jan, 2020
  • 14 min read
भारतीय अर्थव्यवस्था

मुद्रास्फीति और भारतीय अर्थव्यवस्था

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी हालिया मुद्रास्फीति दर से संबंधित आँकड़ों और उनके विभिन्न महत्त्वपूर्ण पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ

केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (CSO) ने हाल ही में दिसंबर 2019 के लिये उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) पर आधारित मुद्रास्फीति या महँगाई दर के आँकड़े जारी किये हैं। आँकड़ों के मुताबिक इस अवधि में CPI आधारित देश की मुद्रास्फीति दर 7.35 प्रतिशत रही, जो कि दिसंबर (2018) में 2.11 प्रतिशत और नवंबर (2019) में 5.54 प्रतिशत थी। दिसंबर (2019) में देश की मुद्रास्फीति दर बीते 65 महीनों के उच्च स्तर पर पहुँच गई है, इससे पूर्व जुलाई 2014 में मुद्रास्फीति दर में 7.39 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई थी। मंदी के दौर से गुज़र रही भारतीय अर्थव्यवस्था के लिये मुद्रास्फीति संबंधी हालिया आँकड़े किसी भयावह स्थिति से कम नहीं हैं। ऐसे में उक्त आँकड़ों का विश्लेषण कर यह जानना आवश्यक है कि इसका आम जनमानस के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।

क्या कहते हैं CSO के हालिया आँकड़े?

  • CSO द्वारा जारी आँकड़ों के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में CPI आधारित मुद्रास्फीति दर दिसंबर 2019 में 7.26 प्रतिशत रही, जो कि दिसंबर 2018 में 1.50 प्रतिशत थी। इसी प्रकार शहरी क्षेत्रों में CPI आधारित मुद्रास्फीति दर दिसंबर 2019 में 7.46 प्रतिशत आँकी गई, जो कि दिसंबर 2018 में 2.91 प्रतिशत थी।
  • साथ ही CSO ने दिसंबर 2019 के लिये उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक (CFPI) पर आधारित मुद्रास्फीति दर के आँकड़े भी जारी किये। इस दौरान ग्रामीण क्षेत्रों के लिये CFPI आधारित मुद्रास्फीति दर 12.96 प्रतिशत रही, जो कि दिसंबर 2018 में (-) 2.99 प्रतिशत थी। इसी प्रकार शहरी क्षेत्रों के लिये CFPI आधारित मुद्रास्फीति दर दिसंबर 2019 में 16.12 प्रतिशत आँकी गई, जो कि दिसंबर 2018 में (-) 1.89 प्रतिशत थी।
    • दिसंबर 2019 में उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक (CFPI) पर आधारित मुद्रास्फीति दर 14.12 प्रतिशत रही, जो कि दिसंबर 2018 में (-) 2.65 प्रतिशत थी।

मुद्रास्फीति

  • जब मांग और आपूर्ति में असंतुलन पैदा होता है तो वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें बढ़ जाती हैं। कीमतों में इस वृद्धि को मुद्रास्फीति कहते हैं। भारत अपनी मुद्रास्फीति की गणना दो मूल्य सूचियों के आधार पर करता है- थोक मूल्य सूचकांक (WPI) एवं उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI)।
  • गौरतलब है कि अत्यधिक मुद्रास्फीति अर्थव्यवस्था के लिये हानिकारक होती है, जबकि 2- 3 प्रतिशत की मुद्रास्फीति दर अर्थव्यवस्था के लिये अनुकूल मानी जाती है।
  • मुद्रास्फीति मुख्यतः दो कारणों से होती है- मांगजनित कारक एवं लागतजनित कारक।
    • यदि मांग के बढ़ने से वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि होती है तो वह मांगजनित मुद्रास्फीति (Demand-Pull Inflation) कहलाती है।
    • इसके विपरीत यदि उत्पादन के कारकों (भूमि, पूंजी, श्रम, कच्चा माल आदि) की लागत में वृद्धि से वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि होती है तो वह लागतजनित मुद्रास्फीति (Cost-Push Inflation) कहलाती है।
  • मुद्रास्फीति का प्रभाव
    • विदित है कि निवेशकर्त्ता मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं। पहले प्रकार के निवेशकर्त्ता वे होते हैं जो सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करते हैं और दूसरे प्रकार के निवेशकर्त्ता वे होते है जो संयुक्त पूंजी कंपनियों के हिस्से खरीदते हैं। मुद्रास्फीति से निवेशकर्त्ता के पहले वर्ग को नुकसान तथा दूसरे वर्ग को फायदा होगा।
    • मुद्रास्फीति में वृद्धि से निश्चित आय वर्ग पर भी काफी प्रभाव पड़ता है। निश्चित आय वर्ग में वे लोग शामिल हैं जिनकी आय निश्चित होती है जैसे- श्रमिक, अध्यापक, बैंक कर्मचारी आदि। मुद्रास्फीति के कारण वस्तुओं तथा सेवाओं की कीमतें बढ़ती हैं जिसका निश्चित आय वर्ग पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
    • जब ऋणदाता किसी को रुपए उधार देता है तो मुद्रास्फीति के कारण उसके रुपए का मूल्य कम हो जाएगा। इस प्रकार ऋणदाता को मुद्रास्फीति से हानि तथा ऋणी को लाभ होता है।
    • मुद्रास्फीति का कृषक वर्ग पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है, क्योंकि कृषक वर्ग उत्पादन करता है और मुद्रास्फीति के दौरान उत्पाद की कीमतें बढ़ती हैं। इस प्रकार मुद्रास्फीति के दौरान कृषक वर्ग को लाभ मिलता है।

मुद्रास्फीति में बढ़ोतरी के कारण?

  • आँकड़ों के अनुसार, कोर मुद्रास्फीति (Core Inflation) में दिसंबर में मामूली बढ़ोतरी (3.7 प्रतिशत) देखने को मिली, जबकि नवंबर (2019) में यह 3.5 प्रतिशत थी।
    • कोर मुद्रास्फीति में मामूली बढ़ोतरी के लिये टेलीकॉम सेक्टर, रेलवे और स्टील उद्योग में हुई मूल्य वृद्धि को उत्तरदायी माना जा सकता है।
  • कोर मुद्रास्फीति में हुई मामूली बढ़ोतरी यह स्पष्ट करती है कि देश में महँगाई को बढ़ाने में हेडलाइन मुद्रास्फीति के कारकों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। आँकड़े भी बताते हैं कि दिसंबर (2019) के दौरान उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक 14.12 प्रतिशत पर पहुँच गया था।
  • उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक में बढ़ोतरी के मामले में सब्जियों और दालों (Pulses) की कीमतों ने सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। आँकड़ों के मुताबिक सब्जियों की कीमतों में लगभग 60.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जिसमें प्याज़ की कीमतें काफी अहम थीं, जबकि दालों की कीमतों में 15.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
  • खाद्य पदार्थों की कीमत में बढ़ोतरी का सबसे मुख्य कारण असमय हुई बारिश को माना जा रहा है। वर्ष 2019 में दक्षिण-पश्चिम मानसून सीज़न (जून-सितंबर) में जुलाई के अंतिम हफ्ते तक काफी कम बारिश हुई। देर से शुरू हुए मानसून के कारण खरीफ फसल की बुआई में भी देरी हुई। इसके पश्चात् सितंबर, अक्तूबर और नवंबर में भारी बारिश हुई, जिससे फसल को नुकसान हुआ। फसल को नुकसान होने से पूर्ति कम हो गई और कीमतें अचानक से बढ़ने लगीं।
  • जिस असमय और भारी बारिश ने खरीफ की फसल को नुकसान पहुँचाया था, उसी ने भू-जल स्तर को बढ़ाने और देश के प्रमुख सिंचाई जलाशयों को पुनः भरने में काफी मदद की। यह रबी की फसल के लिये फायदेमंद साबित हो रहा है। इससे खाद्य पदार्थों की आपूर्ति में वृद्धि होगी और कीमतें पुनः कम हो जाएंगी।

हेडलाइन और कोर मुद्रास्फीति में अंतर

सामान्य शब्दों में कहा जा सकता है कि हेडलाइन मुद्रास्फीति, मुद्रास्फीति का प्राकृतिक आँकड़ा होता है जो कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के आधार पर तैयार की जाती है। हेडलाइन मुद्रास्फीति में खाद्य एवं ईंधन की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव को भी शामिल किया जाता है, जबकि कोर मुद्रास्फीति में खाद्य एवं ईंधन की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव को शामिल नहीं किया जाता है। दरअसल, कोर मुद्रास्फीति के आकलन में वैसे मदों पर ध्यान नहीं दिया जाता है जो किसी अर्थव्यवस्था में मांग और उत्पादन के पारंपरिक ढाँचे के बाहर हों, जैसे- पर्यावरणीय समस्याओं के कारण उत्पादन में देखी जाने वाली कमी।

क्या होगा प्रभाव?

  • मुद्रास्फीति दर रिज़र्व बैंक (RBI) की 6 प्रतिशत की अपर लिमिट को पार कर गई है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह आने वाले महीनों में और अधिक बढ़ सकती है और यदि ऐसा होता है तो नीति निर्माता के लिये भारतीय अर्थव्यवस्था को मंदी से बाहर निकालना और भी मुश्किल हो जाएगा।
  • ऐसे समय में सबसे बड़ी चुनौती RBI के समक्ष आ सकती है। ज्ञात हो कि RBI की मौद्रिक नीति समिति की बैठक अगले महीने होने वाली है और हालिया आँकड़ों के देखते हुए यह स्पष्ट कहा जा सकता है कि यह RBI की नीतिगत ब्याज दरों में कटौती को रोक देगा।
    • उम्मीद की जा रही थी कि केंद्रीय बजट के पश्चात् केंद्र की राजकोषीय स्थिति पर स्पष्टता आने से RBI की मौद्रिक ‍नीति समिति (MPC) नीतिगत ब्याज दरों में कमी करेगी, किंतु मुद्रास्फीति के हालिया रुझानों को देखते हुए यह अनुमान गलत साबित हो रहा है।
  • अगले महीने की पहली ही तारीख को केंद्र सरकार द्वारा बजट प्रस्तुत किया जाएगा। उक्त आँकड़ों का प्रभाव आगामी बजट पर भी देखने को मिल सकता है, क्योंकि सीमित राजकोषीय संसाधनों के साथ अर्थव्यवस्था को पुनः पटरी पर लाना वित्त मंत्रालय के लिये बड़ी चुनौती होगी।
  • साथ ही मध्य-पूर्व में फैली अशांति भी तेल की कीमतों में वृद्धि के रूप में भारत की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।

मुद्रास्फीति जनित मंदी का खतरा

  • स्थिर मांग और उच्च बेरोज़गारी के साथ मुद्रास्फीति में निरंतर वृद्धि की स्थिति को अर्थशास्त्र में मुद्रास्फीति जनित मंदी के रूप में परिभाषित किया जाता है। सामान्य शब्दों में इसे महँगाई दर में बढ़ोतरी और आर्थिक वृद्धि दर में गिरावट के रूप में परिभाषित किया जाता है।
  • हाल ही में राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) ने चालू वित्त वर्ष (2019-20) के लिये देश की अर्थव्यवस्था संबंधी आँकड़ों का पहला अग्रिम अनुमान (FAE) जारी किया था। इसके अनुसार, चालू वित्त वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) घटकर 5 प्रतिशत पर पहुँच सकता है। ज्ञातव्य है कि पिछले वित्त वर्ष (2018-19) में यह 6.8 प्रतिशत था।
  • इसके अतिरिक्त बीते वर्ष नवंबर माह में NSO द्वारा जारी आँकड़ों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही (Q2) में देश की GDP वृद्धि दर घटकर 4.5 प्रतिशत पर पहुँच गई थी, जो कि बीती 26 तिमाहियों का सबसे निचला स्तर था।
  • गौरतलब है कि यदि एक बार भारत ऐसी स्थिति में पहुँच जाता है तो उसके लिये इससे उबरना काफी चुनौतीपूर्ण होगा।

आगे की राह

  • खाद्य मुद्रास्फीति में बढ़ोतरी उन किसानों के लिये एक अच्छी खबर है जो लंबे समय से फसल की कम कीमतों के कारण नुकसान का सामना कर रहे हैं।
  • यह संभावना है कि प्याज़, टमाटर और दालों की आपूर्ति में वृद्धि के पश्चात् यह संकट टल जाएगा। न तो सरकार और न ही RBI द्वारा खाद्य मुद्रास्फीति की अनदेखी की जा सकती है क्योंकि यह आम उपभोक्ताओं को नुकसान पहुँचाने के साथ ही ब्याज़ दर में कटौती की संभावना को कम कर रहा है।

प्रश्न: मुद्रास्फीति को परिभाषित करते हुए मुद्रास्फीति से संबंधित केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी हालिया आँकड़ों के आलोक में इसके प्रभावों पर चर्चा कीजिये।


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