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एडिटोरियल

  • 13 Jan, 2022
  • 13 min read
भारतीय अर्थव्यवस्था

ग्रहीय दबाव के साथ मानव विकास

यह एडिटोरियल 12/01/2022 को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित “Treating The Planet Well Can Aid Progress” लेख पर आधारित है। इसमें UNDP के मानव विकास सूचकांक (HDI) में देशों की रैंकिंग के लिये ‘ग्रहीय दबाव’ को एक मानदंड के रूप में शामिल करने के संबंध में चर्चा की गई है।

संदर्भ

मानव-प्रेरित पर्यावरणीय परिवर्तन पृथ्वी प्रणाली की दीर्घकालिक गतिशीलता को अपरिवर्तनीय रूप से अस्थिर कर सकता है, और इस प्रकार ग्रह की जीवन-सहायक प्रणाली बाधित हो सकती है। इसलिये, पर्यावरण को अब मानव विकास की माप के लिये एक आवश्यक घटक के रूप में देखा जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (United Nations Development Programme- UNDP) की वर्ष 2020 की मानव विकास रिपोर्ट (Human Development Report- HDI) ने ग्रहीय दबाव समायोजित मानव विकास सूचकांक (Planetary pressures-adjusted Human Development Index- PHDI) का प्रस्ताव रखा है। ग्रहीय सीमा की अवधारणा (concept of the planetary boundary) वर्ष 2009 में स्टॉकहोम रेज़िलियेंस सेंटर के जे. रॉकस्ट्रॉम (J. Rockström) के नेतृत्व में दुनिया भर के वैज्ञानिकों के एक समूह द्वारा पेश की गई थी। 

ग्रहीय दबाव समायोजित HDI

  • परिचय: PHDI मानक HDI को देश के प्रति व्यक्ति कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन और प्रति व्यक्ति ‘मटेरियल फुटप्रिंट’ स्तर से समायोजित करता है।   
    • PHDI का उद्देश्य वृहत समाज को वैश्विक संसाधन उपयोग और पर्यावरण प्रबंधन में मौजूदा अभ्यासों को जारी रखने में शामिल जोखिम और विकास पर पर्यावरणीय तनाव (environmental stress) द्वारा बनाए रखने वाले मंदकारी प्रभाव से अवगत कराना है। 
    • यह विकसित देशों द्वारा उत्पन्न ग्रहीय दबाव की प्रकृति को संक्षेप में सामने लाता है और परोक्ष रूप से स्थिति का मुकाबला करने में उनकी ज़िम्मेदारी को इंगित करता है।  
  • वैश्विक औसत HDI में गिरावट: जब ग्रहीय दबाव को समायोजित किया गया तो वर्ष 2019 में HDI का वैश्विक औसत 0.737 से घटकर 0.683 रह गया।  
    • यह समायोजन प्रति व्यक्ति कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) उत्सर्जन (उत्पादन) और प्रति व्यक्ति मटेरियल फुटप्रिंट को ध्यान में रखकर किया गया।
    • औसत प्रति व्यक्ति वैश्विक CO2 उत्सर्जन (उत्पादन) 4.6 टन है और प्रति व्यक्ति मटेरियल फुटप्रिंट 12.3 टन है।  
  • देशों पर व्यक्तिगत प्रभाव: ग्रहीय दबाव के समायोजन के साथ कई देशों की वैश्विक रैंकिंग को सकारात्मक और नकारात्मक अर्थों में परिवर्तित किया गया। 
    • उच्च मानव विकास वाले देशों के समूह में स्विट्ज़रलैंड एकमात्र ऐसा देश है जिसकी विश्व रैंकिंग में ग्रहीय दबाव के समायोजन के बाद कोई अंतर नहीं आया।   
      • हालाँकि आवश्यक समायोजन के बाद उसका HDI मान 0.955 से घटकर 0.825 रह गया।
    • 66 अत्यंत उच्च मानव विकास वाले (Very High HD) देशों में से 30 देशों के रैंक मान में गिरावट आई जो जर्मनी एवं मोंटेनेग्रो के लिये माइनस 1 से लेकर लक्ज़मबर्ग के लिये से माइनस 131 तक के रेंज में विस्तृत है।   
      • HDI में शीर्ष स्थान पर रहने वाला नॉर्वे 15 स्थान नीचे लुढ़क गया जबकि अमेरिका (17) एवं कनाडा (16) क्रमशः 45 और 40 स्थान नीचे और चीन (85) 16 स्थान नीचे खिसक गया।   
    • भारत की बात करें तो औसत 2.0 टन प्रति व्यक्ति CO2 उत्सर्जन (उत्पादन) और 4.6 टन मटेरियल फुटप्रिंट के साथ 0.645 HDI के मुकाबले उसका PHDI 0.626 है।     
      • भारत ने वैश्विक रैंकिंग में आठ अंकों (HDI के तहत 131वीं रैंक और PHDI के तहत 123वीं रैंक) की बढ़त हासिल की, और इसका प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन (उत्पादन) और मटेरियल फुटप्रिंट वैश्विक औसत से पर्याप्त नीचे है।     

PHDI

भारत के लिये चुनौतियाँ

  • पर्यावरणीय चिंता का अभाव: भारत के प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कुशलता से बहुत दूर है, पर्यावरणीय समस्याएँ बढ़ रही हैं और परिणामों पर मामूली चिंता रखते हुए प्रकृति पर हमला बेरोकटोक जारी है, जैसा कि विभिन्न कार्यान्वित और प्रस्तावित परियोजनाओं से स्पष्ट है।     
  • उच्च बहुआयामी गरीबी दर: भारत में बहुआयामी गरीबी सूचकांक (Multidimensional Poverty Index) के अंतर्गत 27.9% लोग शामिल हैं (केरल में 1.10% से लेकर बिहार में 52.50% तक) और उनमें से एक बड़ा वर्ग अपनी जीविका के लिये प्रत्यक्ष रूप से प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है।   
    • पर्यावरण संबंधी चिंताओं को दूर करने में सक्रिय भूमिका निभाना बेहद कठिन है जबकि भारत मानव विकास के अधिकाधिक प्राथमिक संकेतकों में पहले से ही कमतर प्रदर्शन कर रहा है।   
  • उपेक्षित विषय: मानव पर्यावरण पर वर्ष 1972 के स्टॉकहोम सम्मेलन में व्यक्त गरीबी उन्मूलन एवं पर्यावरण सुरक्षा की दोहरी चुनौतियाँ अभी भी उपेक्षित बनी हुई हैं और उन्हें संबोधित नहीं किया जा रहा है।   
    • पचास वर्ष बीत चुके हैं लेकिन परिदृश्य में मामूली बदलाव ही आया है। वास्तव में स्थिति अब और अधिक जटिल हो गई है।
  • स्टैंडअलोन कार्रवाइयों की अपर्याप्तता: उत्तराखंड में ‘चिपको आंदोलन’ और केरल में ‘साइलेंट वैली आंदोलन’ भारत के सबसे प्रसिद्ध पर्यावरण संरक्षण आंदोलनों में से एक रहे हैं, जिन्होंने पिछले पाँच दशकों के दौरान ऐसे कई अन्य आंदोलनों को प्रेरित किया है।     
    • लेकिन एंथ्रोपोसिन युग (पृथ्वी के इतिहास में सबसे हाल की अवधि जब मानव गतिविधियों का ग्रह की जलवायु एवं पारिस्थितिक तंत्र पर उल्लेखनीय प्रभाव पड़ने लगा) में आगे बढ़ने के लिये ऐसी पर्यावरणीय सुरक्षा कार्रवाइयाँ पर्याप्त नहीं हैं।

आगे की राह

  • पर्यावरणीय और सामाजिक विकास को आपस में जोड़ना: अब यह बात अच्छी तरह से स्थापित हो चुकी है कि सामाजिक प्रक्रियाओं सहित पृथ्वी प्रणाली प्रक्रियाओं की अन्योन्याश्रताएँ हैं और उनके संबंध गैर-रैखिक एवं द्वंद्वात्मक हैं।  
    • इसलिये सामाजिक एवं आर्थिक प्रणालियों सहित मानव विकास को पारिस्थितिकी तंत्र के साथ संयुक्त करने और प्रकृति-आधारित समाधानों (जहाँ लोगों को केंद्र में रखा जाता है) के प्रति एक व्यवस्थित दृष्टिकोण पर आधारित जीवमंडल का निर्माण करने की आवश्यकता है।   
  • स्थानीय स्तर की भागीदारी: अब लोगों और ग्रह को एक परस्पर संबद्ध सामाजिक-पारिस्थितिक तंत्र का अंग मानने पर विचार करना आवश्यक है। 
    • सामाजिक और पर्यावरणीय समस्याओं को अब अलग-अलग संबोधित नहीं किया जा सकता है; इसके लिये एक एकीकृत दृष्टिकोण आवश्यक है।
    • इसे स्थानीय स्तर पर अभिकल्पित और संबोधित किया जा सकता है, जिसके लिये भारत के पास 73वें और 74वें संशोधन के रूप में संवैधानिक प्रावधान मौजूद हैं।   
  • सरकार, संस्थानों और प्रौद्योगिकी का एक सहयोगात्मक प्रयास: रिमोट सेंसिंग एवं भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) की सक्षम प्रौद्योगिकी के साथ-साथ पृथ्वी प्रणाली विज्ञान एवं संवहनीयता अनुसंधान में उल्लेखनीय प्रगति ने ज़मीनी स्तर पर मानव गतिविधियों के प्रभाव के दस्तावेज़ीकरण एवं वर्णन में मदद की है और प्राकृतिक एवं सामाजिक विज्ञानों को शामिल करते हुए नए अंतःविषयक कार्यों को प्रोत्साहित किया है।   
    • वे इन प्रभावों को कम करने और जीवन को बेहतर बनाने के संबंध में अंतर्दृष्टि भी प्रदान करते हैं।
    • अब नियोजन प्रक्रिया का पुनर्विन्यास, एक विकेन्द्रीकृत दृष्टिकोण का अंगीकरण, उचित संस्थागत व्यवस्था के लिये एक योजना और पर्यावरणीय तनाव को कुशलतापूर्वक संबोधित करने हेतु राजनीतिक निर्णयों को सक्षम करने वाले कदम उठाये जाने की आवश्यकता है।       
  • HDR रिपोर्ट की सिफारिशें: वर्ष 2020 की HDI रिपोर्ट सामूहिक परिवर्तन के लिये तीन तंत्रों की रूपरेखा प्रदान करती है: 
    • सामाजिक मानदंड और मूल्य: चूँकि विश्व अपनी एजेंसी के विस्तार और मानव विकास के माध्यम से लोगों के सशक्तीकरण की इच्छा रखता है, उसे नए मानदंड भी स्थापित करने चाहिये जो ग्रहीय संतुलन एवं संवहनीयता को अधिकाधिक महत्त्व दें।   
    • प्रोत्साहन और नियमन: प्रोत्साहन और विनियमों का उपयोग कार्रवाई को बढ़ावा देने या रोकने के लिये किया जा सकता है, जो व्यवहार और मूल्यों के बीच की खाई को पाटने में मदद कर सकते हैं।  
    • प्रकृति-आधारित समाधान: ये पारिस्थितिक तंत्र की रक्षा, संवहनीय प्रबंधन और पुनर्स्थापना को बल देने वाली कार्रवाइयों के सृजन एवं समर्थन के माध्यम से मानव विकास और ग्रहों के स्वास्थ्य के बीच एक सुदृढ़ चक्र (virtuous cycle) का निर्माण कर सकते हैं।  

अभ्यास प्रश्न: ‘‘यदि हम दूसरों के लिये ग्रहीय दबाव बनाना जारी रखते हैं तो मानव विकास को आगे बढ़ाना असंभव है।’’ ग्रहीय दबाव समायोजित मानव विकास सूचकांक (PHDI) के संदर्भ में इस कथन का विश्लेषण कीजिये।


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