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एडिटोरियल

  • 10 Jul, 2021
  • 12 min read
भारतीय राजनीति

कॉलेजियम प्रणाली और लोकतंत्र

यह एडिटोरियल दिनांक 09/07/2021 को इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित लेख “The Judicious Choice” पर आधारित है। यह भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में एक स्वतंत्र और पारदर्शी कॉलेजियम प्रणाली के महत्त्व से संबंधित है।

लोकतंत्र की रक्षा के लिये बनाई गई संवैधानिक संस्थाओं में भारतीय न्यायपालिका को गौरवशाली स्थान  प्राप्त है। अतः राष्ट्र, नागरिकों और न्यायपालिका को इसकी स्वतंत्रता को कमज़ोर होने से बचाना चाहिये।

न्यायिक प्रणाली में लोकतंत्र सुनिश्चित करने के लिये वर्ष1993 में कॉलेजियम प्रणाली का एक नया तंत्र स्थापित किया गया था।

कॉलेजियम प्रणाली का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की राय उनकी व्यक्तिगत राय नहीं है बल्कि न्यायपालिका में सर्वोच्च सत्यनिष्ठा वाले न्यायाधीशों के एक निकाय द्वारा सामूहिक रूप से बनाई गई राय है।

हालाँकि कॉलेजियम प्रणाली की दक्षता को समय-समय पर इसकी स्वतंत्रता और न्यायिक नियुक्तियों तथा अन्य निर्णयों की पारदर्शिता के संदर्भ में चुनौती दी गई है।

न्यायपालिका में नागरिकों के विश्वास को बनाए रखने के लिये कॉलेजियम को कानून का सतर्कतापूर्वक पालन करते हुए अपनी स्वतंत्रता के हनन से खुद को बचाना चाहिये।

कॉलेजियम सिस्टम

  • कॉलेजियम प्रणाली: यह न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण की प्रणाली है जो सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के माध्यम से विकसित हुई है, न कि संसद के अधिनियम या संविधान के प्रावधान द्वारा।
    • सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम का नेतृत्त्व CJI द्वारा की जाती है और इसमें न्यायालय के चार अन्य वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं।
    • एक उच्च न्यायालय कॉलेजियम का नेतृत्त्व उसके मुख्य न्यायाधीश और उस न्यायालय के चार अन्य वरिष्ठतम न्यायाधीश करते हैं
    • 1990 में सर्वोच्च न्यायालय के दो फैसलों के बाद यह व्यवस्था बनाई गई थी और 1993 से इसी के माध्यम से उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्तियाँ होती हैं। 
    • सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों में जजों की नियुक्ति तथा तबादलों का फैसला भी कॉलेजियम ही करता है। उच्च न्यायालयों के कौन से जज पदोन्नत होकर सर्वोच्च न्यायालय जाएंगे यह फैसला भी कॉलेजियम ही करता है। 
    • कॉलेजियम की सिफारिशें प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को भेजी जाती हैं और उनकी मंज़ूरी मिलने के बाद ही नियुक्ति की जाती है।
  • संवैधानिक प्रावधान: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124 (2) में यह प्रावधान है कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति सर्वोच्च न्यायालय और राज्यों के उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की इतनी संख्या जिसे राष्ट्रपति इस प्रयोजन के लिये आवश्यक समझे, से परामर्श के बाद राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।।
    • अनुच्छेद 217 के अनुसार, उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा CJI और राज्य के राज्यपाल के परामर्श से की जाएगी और मुख्य न्यायाधीश के अलावा किसी अन्य न्यायाधीश की नियुक्ति के मामले में उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से भी परामर्श किया जाएगा । 
  • सरकार की भूमिका: यदि किसी वकील को उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किया जाता है तो सरकार की भूमिका इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) द्वारा जाँच कराने तक ही सीमित है।
    • यह कॉलेजियम की पसंद के बारे में आपत्तियाँ उठा सकता है और स्पष्टीकरण भी मांग सकता है लेकिन अगर कॉलेजियम उन्हीं नामों को दोहराता है तो सरकार संविधान पीठ के फैसलों के तहत उन्हें न्यायाधीशों के रूप में नियुक्त करने के लिये बाध्य है।

कॉलेजियम सिस्टम से जुड़े मुद्दे

  • पारदर्शिता की कमी: कामकाज के लिये लिखित मैनुअल का अभाव, चयन मानदंड का अभाव, पहले से लिये गए निर्णयों में मनमाने ढंग से उलटफेर, बैठकों के रिकॉर्ड का चयनात्मक प्रकाशन कॉलेजियम प्रणाली की अपारदर्शिता को साबित करता है।
    • कोई नहीं जानता कि न्यायाधीशों का चयन कैसे किया जाता है और इस प्रकार की नियुक्तियों ने औचित्य, आत्म-चयन तथा भाई-भतीजावाद जैसी  चिंताओं को जन्म दिया है।
    • यह प्रणाली अक्सर कई प्रतिभाशाली कनिष्ठ न्यायाधीशों और अधिवक्ताओं की अनदेखी करती है।
  • NJAC का लागू न होना: राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) अनुचित राजनीतिकरण से न्यायिक नियुक्ति प्रणाली की स्वतंत्रता की गारंटी दे सकता है, नियुक्तियों की गुणवत्ता को बेहतर कर सकता है और इस प्रणाली में जनता के विश्वास का पुनर्निर्माण कर सकता है।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2015 में इस फैसले को इस आधार पर रद्द कर दिया था कि इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता को खतरा है।

राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग 

केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति तथा स्थानांतरण के लिये राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम बनाया था, जिसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी। 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस अधिनियम को यह कहते हुए असंवैधानिक करार दिया था कि ‘राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग’ अपने वर्तमान स्वरूप में न्यायपालिका के कामकाज में हस्तक्षेप है। उल्लेखनीय है कि शीर्ष न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति की कॉलेजियम प्रणाली में व्यापक पारदर्शिता लाने की बात लंबे समय से होती रही है। शीर्ष अदालत का यह मानना है कि जजों की योग्यता का निर्धारण/आकलन करना न्यायपालिका का ज़िम्मा है।

  • सदस्यों के बीच सहमति का अभाव: कॉलेजियम के सदस्यों को अक्सर न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में आपसी सहमति के मुद्दे का सामना करना पड़ता है।
    • कॉलेजियम के सदस्यों के बीच अविश्वास की भावना न्यायपालिका के भीतर की खामियों को उजागर करती है।
    • उदाहरण के लिये हाल ही में सेवानिवृत्त CJI शरद ए बोबडे शायद पहले मुख्य न्यायाधीश थे जिन्होंने कॉलेजियम सदस्यों के बीच आम सहमति की कमी के कारण सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिये एक भी सिफारिश नहीं की थी।
  • असमान प्रतिनिधित्व: चिंता का अन्य क्षेत्र उच्चतर न्यायपालिका की संरचना है। उच्चतर न्यायपालिका में महिलाओं का प्रतिनिधित्व काफी कम है, जबकि जाति संबंधी आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं।
  • न्यायिक नियुक्तियों में देरी: उच्चतर न्यायपालिका के लिये कॉलेजियम द्वारा सिफारिशों में देरी के कारण न्यायिक नियुक्ति की प्रक्रिया में देरी हो रही है।

आगे की राह

  • न्यायपालिका की स्वतंत्रता का संरक्षण: कार्यपालिका और न्यायपालिका को शामिल करते हुए रिक्तियों को भरना एक सतत् और सहयोगी प्रक्रिया है।
    • हालाँकि यह एक स्थायी स्वतंत्र निकाय के बारे में सोचने का समय है जो न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिये पर्याप्त सुरक्षा उपायों के साथ प्रक्रिया को संस्थागत बनाने हेतु न्यायिक प्रधानता की गारंटी देता है लेकिन न्यायिक अनन्यता की नहीं।
    • इसे स्वतंत्रता सुनिश्चित करनी चाहिये, विविधता को प्रतिबिंबित करना चाहिये, पेशेवर क्षमता और अखंडता का प्रदर्शन करना चाहिये।
  • सिफारिश की प्रक्रिया में बदलाव: एक निश्चित संख्या में रिक्तियों के लिये आवश्यक न्यायाधीशों की संख्या का चयन करने के बजाय कॉलेजियम द्वारा राष्ट्रपति को वरीयता और अन्य वैध मानदंडों के क्रम में नियुक्त करने के लिये संभावित नामों का एक पैनल प्रदान करना चाहिये।
  • NJAC की स्थापना पर पुनर्विचार: सर्वोच्च न्यायालय NJAC अधिनियम में संशोधन कर सकता है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि न्यायपालिका अपने निर्णयों में बहुमत का नियंत्रण बरकरार रखती है। 
  • पारदर्शिता सुनिश्चित करना: कॉलेजियम के सदस्यों को एक नई शुरुआत करनी होगी और एक-दूसरे के साथ जुड़ना होगा।
    • एक पारदर्शी प्रक्रिया जवाबदेही सुनिश्चित करती है जो गतिरोध को हल करने के लिये बहुत आवश्यक है।
    • कुछ नामों पर व्यक्तिगत मतभेद होते रहेंगे लेकिन इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिये कि न्याय देने की संस्थागत अनिवार्यता प्रभावित न हो।

निष्कर्ष

यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि न्यायपालिका जो नागरिक स्वतंत्रता का मुख्य कवच है, पूरी तरह से स्वतंत्र हो और कार्यपालिका के प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रभाव से अलग रहे।

देश के उच्चतर न्यायालयों में नियुक्ति के लिये उच्चतम सत्यनिष्ठा वाले न्यायाधीशों की पहचान और उनका चयन करके भारत की न्यायिक प्रणाली की स्वतंत्रता को सुनिश्चित किया जा सकता है।

प्रश्न: कॉलेजियम सिस्टम में लोकतंत्र एवं इसके प्रतिकूल प्रभावों पर चर्चा कीजिये तथा विश्लेषण कीजिये कि यह भारत से कैसे धीरे-धीरे खत्म हो रहा है और इस संबंध में अपने सुझाव दीजिये।


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