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  • 09 May, 2019
  • 17 min read
जैवविविधता और पर्यावरण

ब्रिटेन में जलवायु आपातकाल

संदर्भ

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये आपातकाल घोषित करने वाला ब्रिटेन दुनिया का पहला देश है। इस मुद्दे पर लंदन में ग्यारह दिनों तक विरोध चलने के बाद ब्रिटेन की संसद ने पर्यावरण और जलवायु संकट को लेकर आपातकाल की घोषणा की है। देश में जलवायु संकट की गंभीरता को देखते हुए विपक्ष ने इमरजेंसी घोषित करने का प्रस्ताव किया और इसे मान लिया गया। इमरजेंसी की इस घोषणा से पहले ही देश के कई शहरों और कस्बों में जलवायु संकट को लेकर आपातस्थिति महसूस की जा रही थी। ब्रिटेन के इस कदम के बाद उम्मीद की जाती है कि दुनियाभर में संसदें और सरकारें जलवायु संकट को धरती का सबसे बड़ा खतरा मानते हुए इस दिशा में गंभीरता से काम करेंगी।

जलवायु परिवर्तन क्या है?

  • औसत मौसमी दशाओं के पैटर्न में भारी बदलाव आने के स्थिति को जलवायु परिवर्तन कहते हैं। सामान्यतः इन बदलावों का अध्ययन पृथ्वी के इतिहास को दीर्घ अवधियों में बाँट कर किया जाता है। जलवायु परिवर्तन का मतलब मौसम में आने वाले व्यापक बदलाव से भी है। यह बदलाव ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में अत्यधिक वृद्धि के कारण हो रहा है।
  • दरअसल, पिछली कुछ सदियों से वैश्विक जलवायु में धीरे-धीरे बदलाव हो रहा है। दुनिया के विभिन्न देशों में सैकड़ों वर्षों से जो औसत तापमान बना हुआ था, वह अब बदल रहा है। इधर पिछले कुछ वर्षों से जलवायु में अचानक तेज़ी से बदलाव हो रहे हैं। यह सर्वविदित है कि हर मौसम की अपनी विशेषता होती है, लेकिन अब इसका रंग-ढंग बदल रहा है...पूरी दुनिया में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव देखने को मिल रहा है।

प्रमुख ग्रीनहाउस गैसें और उनके स्रोत

कार्बन डाइ- ऑक्साइड यह मुख्य ग्रीनहाउस गैस है। मुख्य स्रोत- कोयले का दहन, वनों का कटान, सीमेंट उद्योग
मीथेन यह दूसरी सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रीनहाउस गैस है। मुख्य स्रोत- ऑक्सीजन, जीवाणुओं की प्रक्रिया, कोयला खदानों के भीतर
नाइट्रस ऑक्साइड यह गैस ग्रीनहाउस इफेक्ट में 8% योगदान देती है। मुख्य स्रोत- उर्वरक, कोयला दहन
हैलो कार्बन यह मानव उत्पादित रासायनिक यौगिक है, जिसमें हैलोजन परिवार के तत्त्व तथा कार्बन और अन्य गैसों से मिलकर बनी हाइड्रो फ्लोरोकार्बन (HFC), परफ्लोरोकार्बन (PFC) और सल्फर-हेक्साफ्लोराइड (SF6) शामिल हैं।
सतही ओज़ोन ट्रोपोस्फीयर में मौजूद यह एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ग्रीनहाउस गैस है। जो औद्योगिक गतिविधियों की वज़ह से निकलती है।
जल वाष्प यह प्राकृतिक श्वसन तथा वाष्पीकरण से प्राप्त होती है। पृथ्वी का तापमान बढ़ने पर वायुमण्डल में इसकी मात्रा बढ़ जाती है।

 

ग्रीनहाउस इफेक्ट

ग्रीनहाउस इफेक्ट या हरितगृह प्रभाव (Greenhouse Effect) एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी ग्रह या उपग्रह के वातावरण में मौजूद कुछ गैसें वातावरण के तापमान में अपेक्षाकृत अधिक वृद्धि कर देती हैं। इन्हें ग्रीनहाउस गैस कहा जाता है और इनमें कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और जल-वाष्प अदि शामिल हैं।

क्यों कहा गया ग्रीनहाउस इफेक्ट?

ग्रीनहाउस या ग्लास हाउस का प्रयोग ठंडे देशों में किया जाता है जहाँ वाह्य तापमान बेहद कम होता है। इनका इस्तेमाल आंतरिक वायुमंडल को गर्म रखने के लिये किया जाता है। इन ग्रीनहाउसों में सूर्य की रोशनी पारदर्शी काँच के द्वारा आती है, जिनसे परावर्तित ऊष्मा या विकिरण आर-पार नहीं हो पाती है। ऊष्मा या विकिरण का कुछ विशिष्ट भाग काँच के द्वारा अवशोषित हो जाता है। इससे ग्रीनहाउस की आंतरिक सतह गर्म रहती है, जो पौधों आदि के लिये उपयोगी होती है।

वाहनों पर कंजेशन टैक्स

कुछ समय पहले दिल्ली में सड़कों पर गाड़ियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए सरकार ने दिल्ली की चुनिंदा सड़कों पर कंजेशन टैक्स लगाने पर विचार किया था। इस तरह का टैक्स एक निश्चित अवधि के लिये ही लगाया जाता है। समय-समय पर कंजेशन टैक्स का विश्व के कई शहरों में प्रयोग किया गया है। सिंगापुर में भी कुछ ऐसी भीड़भाड़ वाली सड़कों के लिये यह व्यवस्था है कि अगर कोई वहाँ गाड़ी लेकर जाता है तो उसे टैक्स देना पड़ता है। इसके लिये इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम काम करता है।

कंजेशन टैक्स लगाने के लिये इलेक्ट्रॉनिक रोड प्राइसिंग सिस्टम बनाया जाता है। इस सिस्टम के तहत नेशनल हाइवे के लिये बनाए गए फास्ट टैग की तरह ही व्यवस्था की जाती है। इसमें एक खास तरह का स्टिकर वाहन पर लगाना होता है। वह वाहन जैसे ही कंजेशन टैक्स ज़ोन की सड़क पर पहुँचता है तो उसमें पहले से जमा राशि में से टैक्स कट जाता है।

गौरतलब है कि आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय से संबंधित संसदीय कमिटी ने भी सिफारिश की थी कि दिल्ली की वाहनों से भरी सड़कों पर कंजेशन टैक्स लगाया जाए। उसी कमिटी ने इलेक्ट्रॉनिक रोड प्राइसिंग का रास्ता भी सुझाया था।

आपातस्थिति क्यों है जलवायु संकट?

  • जलवायु संकट आपातस्थिति क्यों है, इसे समझने के लिये जानना होगा कि आखिर यह संकट क्या है, क्यों है और इसे कैसे कम किया जाए।
  • दरअसल, भारी औद्योगीकरण, ऊर्जा संसाधनों का लगातार दोहन और उसमें लगातार वृद्धि इस स्थिति के लिये सर्वाधिक ज़िम्मेदार हैं।
  • इसे नियंत्रण में लाने के लिये सभी देशों को कार्बन उत्सर्जन शून्य करने की नीतियाँ तय करनी होंगी और लक्ष्य को 2050 तक हासिल करने के प्रयास करने होंगे।
  • सरकार को ऐसी व्यवस्था करनी होगी जिससे आने वाला हर नया वाहन बिजली या सौर ऊर्जा से चलने वाला हो। लेकिन इन वाहनों को चार्ज करने के लिये बुनियादी ढाँचे का निर्माण करना एक बड़ी चुनौती है।
  • कृषि आधारित नीतियों को मजबूत करना होगा ताकि अधिक-से-अधिक किसानों को प्रोत्साहन मिले। वन्य क्षेत्र में इज़ाफा करना होगा ताकि वर्ष 2050 तक इसे 13 से बढ़ाकर 17 फीसदी किया जा सके।

ब्रिटेन में लोग 2030 तक कार्बन से मुक्ति चाहते हैं, यानी कार्बन उतना ही बने जितना प्राकृतिक रूप से समायोजित किया जा सके। जलवायु परिवर्तन पर आपात स्थिति की मांग एक छोटे से समूह ने लंदन में की थी। इसके बाद यह आंदोलन बढ़ता हुआ पूरे देश में एक जनांदोलन बन गया। प्रदर्शनकारियों ने शहर की सड़कों को तो बंद कर ही दिया और साथ ही लंदन की भूमिगत परिवहन प्रणाली को भी अवरुद्ध कर दिया गया। इसके बाद ही सरकार ने जलवायु संकट पर इमरजेंसी की घोषणा की।

  • औद्योगिक क्रांति के बाद से पृथ्वी का औसत तापमान साल-दर-साल बढ़ रहा है। इंटर-गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) की रिपोर्ट ने पहली बार इसके प्रति आगाह किया था। अब इसके दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। गर्मियाँ लंबी होती जा रही हैं और सर्दियाँ छोटी...वर्षा का क्रम भी अनियमित हो गया है...और ऐसा पूरी दुनिया में हो रहा है। प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति और प्रवृत्ति बढ़ रही है।
  • ऐसा ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के कारण हो रहा है, जो कारखानों, मशीनों और वाहनों की वज़ह से होता है। यह कहना गलत नहीं होगा कि इस मामले में भी ब्रिटेन गंभीर और अग्रणी दिखाई दे रहा है और यह केवल वहाँ की सरकार के कारण नहीं है। ब्रिटेन के आम नागरिकों के सहयोग से जलवायु संकट को लेकर इमरजेंसी की घोषणा हुई है...और जब ऐसा हो गया है तो यह भी तय है कि आगे भी कार्रवाई होगी।
  • लेकिन जलवायु के मामले में यह सोच कर निश्चिन्त नहीं बैठा जा सकता कि यह केवल ब्रिटेन की समस्या है। ब्रिटेन तो इससे निपटने के उपाय करेगा ही, लेकिन अन्य स्थानों पर इसका असर ज्यादा महसूस किया जाएगा। इसलिये ज़रूरी है कि हर जगह इस पर काम हो और जो स्थिति है, उसमें युद्धस्तर पर काम किये जाने की ज़रूरत है।

भारत में निजी क्षेत्र की कुछ कंपनियों ने अपने स्तर पर इस दिशा में पहल की है, लेकिन आमतौर पर अभी मामला बहुत ढीला-ढाला है। सरकार ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) बनाया जरूर है और यह प्रदूषण फैलाने वालों की निगरानी भी करता है, पर विकल्प नहीं होने के कारण समस्या कहीं अधिक गंभीर है। परिणामस्वरूप NGT के फैसले प्रभावी होने के बावजूद उलझाने वाले होते हैं, जबकि इसके आदेशों-प्रयासों को समझने की ज़रूरत है।

green house gas

  • ब्रिटेन में यह फैसला किया गया है कि वर्ष 2050 तक कार्बन उत्सर्जन को 80 प्रतिशत तक कम करना है। इसके बाद वह कार्बन उत्सर्जन के मामले में 1990 के स्तर पर आ जाएगा।
  • जलवायु संकट रोकने की दिशा में काम कर रहे सलाहकारों का कहना है कि वर्ष 2050 तक ग्रीनहाउस गैसों को शून्य तक करना संभव है, लेकिन उसके लिये सार्वजनिक उपभोग, उद्योग और सरकार की नीतियों में बड़े बदलाव की जरूरत है। 
  • तथ्य यह भी है कि जो उपाय अभी किये जाएंगे उनका प्रभाव 2030 से दिखना शुरू होगा, जबकि 2018 में जलवायु संकट से संबंधित सभी रिकार्ड टूट चुके हैं।
  • ब्रिटेन 18 विकसित देशों में अकेला है जहाँ एक दशक में कार्बन उत्सर्जन सबसे कम रहा है। इसकी वज़ह यह है कि ब्रिटेन 1990 में ही कोयले के स्थान पर प्राकृतिक गैस का उपयोग करने लगा था।
  • 1980-90 में ब्रिटेन का कोयला उद्योग लगभग समाप्त हो गया था। इसकी वज़ह से उद्योग के अन्य क्षेत्रों में वर्ष 2000 के अंत में लगभग एक लाख से अधिक नौकरियाँ चली गई थीं।
  • लेकिन अक्षय ऊर्जा और प्रौद्योगिकी के निम्न-कार्बन रूपों में अनुसंधान और विकास ने तेज़ी से प्रगति की है। हाल के दशकों में देखा जा रहा है कि कई विकासशील देश अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा दे रहे हैं, जबकि पहले विभिन्न कारणों से उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया था।

संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि जलवायु परिवर्तन की तबाही को सीमित करने के लिये हमारे पास सिर्फ केवल 12 साल बचे हैं। हमें यह मान लेना चाहिये कि स्थिति गंभीर है। कार्बन उत्सर्जन में कमी के लिये सिर्फ स्थानीय स्तर पर काम करना काफी नहीं है। इसके बारे में सबको जागरूक करने की जरूरत है। इस बात को जब सबने महसूस किया तो संयुक्त राष्ट्र ने पेरिस समझौत पर ध्यान केंद्रित किया। पेरिस समझौता 2016 में हुआ था। इसके प्रस्ताव पर 197 देशों ने हस्ताक्षर किये थे। इसके अनुसार सभी देश इस बात पर राज़ी हो गए थे कि वैश्विक तापमान को कम करने के लिये कार्बन उत्सर्जन में भी कमी करनी होगी।

  • जलवायु संकट एक बड़ी समस्या है और ज्यादातर देशों के लिये कार्बन उत्सर्जन में कमी कर पाना आसान नहीं है। हालाँकि धीरे-धीरे ये देश जागरूक हो रहे हैं। जब ब्रिटेन ने कार्बन उत्सर्जन को कम करने में कामयाबी हासिल कर ली, तो उसका अनुसरण कर चीन ने भी कार्बन उत्सर्जन को कुछ मात्रा में कम किया।

कार्बन उत्सर्जन कम होने से भारत-चीन को होगा सर्वाधिक लाभ

वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों का आँकड़ा भारत और चीन में सर्वाधिक है। लेकिन कार्बन उत्सर्जन कम करने वाली मज़बूत जलवायु नीति से इन दोनों को सर्वाधिक स्वास्थ्य लाभ मिलेंगे। अमेरिका में वर्मोन्ट विश्वविद्यालय के शोधकर्त्ताओं ने पाया कि वैश्विक कार्बन उत्सर्जन कम करने की कीमत अधिक हो सकती है, जब तक कि वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन से होने वाली मौतों के तथ्यों को इसमें शामिल न किया जाए। इस अध्ययन में पाया गया कि पेरिस जलवायु समझौते की शर्तों को पूरा करने के लिये कार्बन उत्सर्जन में तत्काल, अभूतपूर्व कटौती आर्थिक रूप से फायदेमंद है, यदि इसमें मनुष्य के स्वास्थ्य लाभों को शामिल कर लिया जाए। ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने से वायु प्रदूषण से होने वाली मौतें भी कम होंगी।

ऐसे समय में जब राजनेता ‘संसाधनों के भीतर रहने’ की बात करते हैं, उस पर चर्चा करते हैं, लेकिन इसमें फंड की व्यवस्था की बात आती है तो हम आने वाली पीढ़ियों पर विचार करने लगते हैं। पर्यावरण पर काम करने के बजाय, हम उसमें आने वाली लागत को लेकर बहस करने लगते हैं और उसमें फँसे रह जाते हैं। पृथ्वी को बचाने के लिये ब्रिटेन जिस रास्ते पर बढ़ा है, बाकी देशों को भी उसी का अनुसरण करना चाहिये।

अभ्यास प्रश्न: ब्रिटेन ने जलवायु आपातकाल घोषित कर विश्वभर का ध्यान जलवायु परिवर्तन के ज्वलंत मुद्दे की ओर आकर्षित किया है। इस प्रकार के प्रयास कार्बन उत्सर्जन कम करने की दिशा में कितने सहायक हो सकते हैं? पक्ष-विपक्ष में अपने विचार प्रकट कीजिये।


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