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एडिटोरियल

  • 09 Apr, 2020
  • 18 min read
सामाजिक न्याय

घरेलू हिंसा का अप्रभावी लॉकडाउन

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में लॉकडाउन के कारण उपज़ी घरेलू हिंसा की परिस्थितियों से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ 

वर्तमान में कोरोना वायरस के बढ़ते प्रसार ने वैश्विक आबादी को घरों में रहने को मज़बूर कर दिया है। भारत सहित विश्व के लगभग सभी देशों में स्वास्थ्य क्षेत्र के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में चल रही समस्त मानवीय गतिविधियों को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर संपूर्ण लॉकडाउन या आंशिक लॉकडाउन को अपना लिया गया है। इस समय लॉकडाउन का एकमात्र उद्देश्य अमूल्य मानवीय जीवन की रक्षा करना है। कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने में जहाँ एक ओर लॉकडाउन निश्चित ही एक प्रभावकारी उपाय साबित हो रहा है, वहीँ दूसरी ओर इस वैश्विक संकट के दौर में भी महिलाओं एवं बच्चों को घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ रहा है। 

घरेलू हिंसा की वैश्विक स्थिति की गंभीरता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुतरेस ने ऐसे हालात में महिलाओं एवं बच्चों के प्रति घरेलू हिंसा के मामलों में ‘भयावह बढ़ोत्तरी’ दर्ज किये जाने पर चिंता जताते हुए सरकारों से ठोस कार्रवाई का आहवान किया। अपने संदेश में यूएन महासचिव ने बताया कि हिंसा महज़ रणक्षेत्र तक ही सीमित नहीं है बल्कि  महिलाओं एवं बच्चों के लिये सबसे ज़्यादा ख़तरा तब होता है जब उन्हें अपने घरों में सबसे सुरक्षित होना चाहिये।

इस आलेख में घरेलू हिंसा तथा वैश्विक संकट से उपज़ी घरेलू हिंसा की परिस्थितियों पर विमर्श करने के साथ ही इस समस्या से निपटने के लिये राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किये जा रहे प्रयासों का भी अध्ययन किया जाएगा।

घरेलू हिंसा से तात्पर्य

  • घरेलू हिंसा अर्थात् कोई भी ऐसा कार्य जो किसी महिला एवं बच्चे (18 वर्ष से कम आयु के बालक एवं बालिका) के स्वास्थ्य, सुरक्षा, जीवन पर संकट, आर्थिक क्षति और ऐसी क्षति जो असहनीय हो तथा जिससे महिला व बच्चे को दुःख एवं अपमान सहन करना पड़े, इन सभी को घरेलू हिंसा के दायरे में शामिल किया जाता है।
  • घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत प्रताड़‍ित महिला किसी भी वयस्क पुरुष को अभियोजित कर सकती है अर्थात उसके विरुद्ध प्रकरण दर्ज करा सकती है।  

लॉकडाउन के बाद घरेलू हिंसा की वैश्विक स्थिति 

  • इस महामारी के कारण उपजी आर्थिक व सामाजिक चुनौतियों और आवाजाही पर पाबंदी लगने से लगभग सभी देशों में महिलाओं व बच्चों के साथ दुर्व्यवहार के मामलों में भारी वृद्धि दर्ज की गई है। 
  • हालाँकि कोरोना वायरस के फैलाव से पहले भी आँकड़े स्पष्टता से इस समस्या को बयाँ करते रहे हैं दुनिया भर में क़रीब एक-तिहाई महिलाएँ अपने जीवन में किसी ना किसी रूप में हिंसा का अनुभव अवश्य करती हैं यह मुद्दा विकसित और अल्पविकसित, दोनों प्रकार की अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित करता है
  • संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, COVID-19  महामारी के शुरू होने के बाद से लेबनान और मलेशिया में ‘महिला हेल्पलाइन’ पर आने वाली फ़ोन कॉल की संख्या दोगुनी हो गई है जबकि चीन में यह संख्या तीन गुनी हुई है
  • लॉकडाउन के बाद आस्ट्रेलिया में घरेलू हिंसा के मामलों में 75 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज़ की गई है। आस्ट्रेलिया के न्यूसाउथ वेल्स प्रांत में सर्वाधिक घरेलू हिंसा के मामलें रिपोर्ट किये गए हैं

क्या है लॉकडाउन?

  • लॉकडाउन एक प्रशासनिक आदेश होता है। लॉकडाउन को एपिडमिक डीज़ीज एक्ट, 1897 के तहत लागू किया जाता है। ये अधिनियम पूरे भारत पर लागू होता है।
  • इस अधिनियम का इस्तेमाल किसी विकराल समस्या के दौरान होता है।  जब केंद्र या राज्य सरकार को ये विश्वास हो जाए कि कोई गंभीर बीमारी देश या राज्य में आ चुकी है और सभी नागरिकों तक पहुँच रही है तो केंद्र व राज्य सरकार सोशल डिस्टेंसिंग (सामाजिक स्तर पर एक-दूसरे से दूरी बनाना) को क्रियान्वित करने के लिये इस अधिनियम को लागू कर सकते हैं। 
  • इसे किसी आपदा के समय शासकीय रूप से लागू किया जाता है।  इसमें लोगों से घर में रहने का आह्वान और अनुरोध किया जाता है। इसमें ज़रूरी सेवाओं के अलावा सारी सेवाएँ बंद कर दी जाती हैं।  कार्यालय, दुकानें, फ़ैक्टरियाँ और परिवहन सुविधा सब बंद कर दी जाती है। जहाँ संभव हो वहाँ कर्मचारियों को घर से काम करने के लिये कहा जाता है।
  • लॉकडाउन के दौरान आवश्यक सेवाएँ निर्बाध रूप से चलती रहती हैं। अपने दिशा-निर्देश में सरकार ने शासकीय आदेशों का पालन करना अनिवार्य बताया है।
  • कोरोना वायरस से बुरी तरह प्रभावित स्पेन से खबरें आईं कि कुछ महिलाओं ने घरेलू यातना से बचने के लिये खुद को कमरे या बाथरूम में बंद करना शुरू कर दिया। परिणामस्वरूप स्पेन की सरकार को लॉकडाउन के कड़े नियमों के बावजूद महिलाओं के लिये ढील बरतनी पड़ी।
  • इस वैश्विक संकट के दौर में जहाँ एक ओर अफ्रीका व पश्चिम एशिया में गृहयुद्ध से जूझ रहे देशों में भी संयुक्त राष्ट्र महासचिव के युद्धविराम की अपील का असर तो दिखाई दे रहा है, परंतु वहीँ दूसरी ओर इन देशों में भी महिलाओं के प्रति होने वाली घरेलू हिंसा में वृद्धि देखी जा रही है।
  • इतना ही नहीं सभ्यता व शिष्टाचार के शिखर पर होने का दावा करने वाले पश्चिमी दुनिया के देशों में भी घरेलू हिंसा के मामलों में वृद्धि देखी जा रही है।

भारत की स्थिति  

  • राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) द्वारा प्रस्तुत आँकड़ों के अनुसार, जहाँ एक ओर मार्च के पहले सप्ताह (2-8 मार्च) में महिलाओं के विरुद्ध होने वाली हिंसा के 116 मामले सामने आए वहीं मार्च के अंतिम सप्ताह (23 मार्च - 1 अप्रैल) में ऐसे मामलों की संख्या बढ़कर 257 हो गई।   
  • इस अवधि के दौरान बलात्कार अथवा बलात्कार के प्रयास के मामले में तेज़ी से वृद्धि देखी गई और ये 2 से बढ़कर 13 पर पहुँच गए हैं।
  • इसके अलावा महिलाओं की शिकायतों के प्रति पुलिस की उदासीनता के मामलों में भी लगभग तीन गुना वृद्धि हुई है, आँकड़ों के अनुसार, मार्च के पहले सप्ताह में ऐसी शिकायतों की संख्या 6 थी जो अंतिम सप्ताह में बढ़कर 16 पर पहुँच गई।
  • एक गैर-सरकारी संगठन चाइल्डलाइन इंडिया के अनुसार, पिछले 11 दिनों (25 मार्च से 4 अप्रैल) में घरेलू हिंसा की 92,000 से अधिक कॉल प्राप्त हुई।
  • इसी प्रकार ‘गरिमामयी जीने के अधिकार’ (अनुच्छेद-21) से संबंधित शिकायतें भी 35 से बढ़कर 77 अर्थात् लगभग दोगुनी हो गई हैं। ऐसे मामले लिंग, वर्ग अथवा जाति या उनमें से तीनों के आधार पर भेदभाव से संबंधित हो सकते हैं। 

घरेलू हिंसा के कारण

  • घरेलू हिंसा पर शोध कर रहे विशेषज्ञ यह बतातें है कि जब पुरुषों और महिलाओं को रोज़गार मिलता है, तो घरेलू हिंसा में गिरावट आती है क्योंकि पति-पत्नी के बीच बातचीत कम हो जाती है।
  • लॉकडाउन के कारण दंपति के सामने रोज़गार की असुरक्षा का प्रश्न उठ खड़ा हुआ है, जिससे महिला और पुरुष दोनों तनावग्रस्त हो गए हैं, तनाव के कारण पारिवारिक कलह बढ़ जाती है जो अंततः घरेलू हिंसा में परिणत होती है। 
  • लॉकडाउन के कारण बच्चों के स्कूलों में भी अनिश्चितकालीन अवकाश कर दिया गया है और पार्कों में खेलने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है, जिससे बच्चे घर में ही खेलकूद करते हैं परिणामस्वरूप अनावश्यक शोरगुल होता है, जो बच्चों व महिलाओं के प्रति हिंसा का कारण बनता है। 
  • लॉकडाउन के दौरान सामाजिक स्तर पर लोगों का मेल-मिलाप प्रतिबंधित हो गया है, जिससे लोग अपना समय व्यतीत करने व अपने परिजन व मित्रों से बात करने के लिये सोशल नेटवर्किंग साइट्स व मोबाइल फोन का अत्यधिक प्रयोग करने लगे हैं जो दंपतियों के बीच कलह का प्रमुख कारण बन गया है। 
  • लॉकडाउन के बाद से महिला पर परिवार, बच्चों की देखरेख, घरेलू कार्य के अलावा पति की यौनाचार इच्छाओं की पूर्ति की अतिरिक्त ज़िम्मेदारी से दबाव बढ़ गया है। जिससे अवसाद में वृद्धि होने से पारिवारिक कलह बढ़ा है। 
  • विवाहेत्तर संबंधों में लिप्त होने का शक, ससुराल वालों की देखभाल न करना, बच्चों की उपेक्षा करना तथा स्वादिष्ट खाना न बनाने के कारण भी परिवार के सदस्यों द्वारा उन पर हमले का कारण बनता है।
  • लॉकडाउन के पालन में लगी पुलिस की व्यस्तता के कारण इन शिकायतों का त्वरित समाधान नहीं हो पा रहा है जिससे इस प्रकार के कृत्यों को अंजाम देने वाले पुरुषों को प्रोत्साहन मिल रहा है

घरेलू हिंसा के प्रभाव 

  • यदि किसी व्यक्ति ने अपने जीवन में घरेलू हिंसा का सामना किया है तो उसके लिये इस डर से बाहर आ पाना अत्यधिक कठिन होता है। अनवरत रूप से घरेलू हिंसा का शिकार होने के बाद व्यक्ति की सोच में नकारात्मकता हावी हो जाती है। उस व्यक्ति को स्थिर जीवनशैली की मुख्यधारा में लौटने में कई वर्ष लग जाते हैं। 
  • घरेलू हिंसा का सबसे बुरा पहलू यह है कि इससे पीड़ित व्यक्ति मानसिक आघात से वापस नहीं आ पाता है। ऐसे मामलों में अक्सर देखा गया है कि लोग या तो अपना मानसिक संतुलन खो बैठते हैं या फिर अवसाद का शिकार हो जाते हैं। 
  • घरेलू हिंसा की यह सबसे खतरनाक और दुखद स्थिति है कि जिन लोगों पर हम इतना भरोसा करते हैं और जिनके साथ रहते हैं जब वही हमें इस तरह का दुख देते हैं तो व्यक्ति का रिश्तों पर से विश्वास उठ जाता है और वह स्वयं को अकेला कर लेता है। कई बार इस स्थिति में लोग आत्महत्या तक कर लेते हैं।
  • घरेलू हिंसा का सबसे व्यापक प्रभाव बच्चों पर पड़ता है। सीटी स्कैन से पता चलता है कि जिन बच्चों ने घरेलू हिंसा में अपना जीवन बिताया है उनके मस्तिष्क का कॉर्पस कॉलोसम और हिप्पोकैम्पस नामक भाग सिकुड़ जाता है, जिससे उनकी सीखने, संज्ञानात्मक क्षमता और भावनात्मक विनियमन की शक्ति प्रभावित हो जाती है। 
  • प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है क्योंकि हिंसा की शिकार हुई महिलाएँ समाजिक जीवन की विभिन्न गतिविधियों में कम भाग लेती हैं। 
  • बालक अपने पिता से गुस्सैल व आक्रामक व्यवहार सीखते हैं। इस का असर ऐसे बच्चों का अन्य कमज़ोर बच्चों व जानवरों के साथ हिंसा करते हुए देखा जा सकता है।
  • बालिकाएँ नकारात्मक व्यवहार सीखती हैं और वे प्रायः दब्बू, चुप-चुप रहने वाली या परिस्थितियों से दूर भागने वाली बन जाती हैं। 

समाधान के प्रयास    

  • आस्ट्रेलिया की सरकार ने घरेलू हिंसा की बढ़ रही घटनाओं को रोकने के लिये 15 करोड़ डॉलर की राशि निर्गत की है जो घरेलू हिंसा को रोकने में ज़मीनी स्तर पर कार्य कर रहे संस्थानों के प्रयासों को प्रभावी करेगी 
  • आस्ट्रेलियाई सरकार ऑनलाइन मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं, टेलिफोनिक चिकित्सकीय परामर्श और आपाताकलीन भोजन सेवा जैसी सुविधाओं में निवेश बढ़ा रही है।
  • इटली ने घरेलू हिंसा से निपटने के लिये गैर-सरकारी संगठनों का उत्तरदायित्व दिया है
  • फ्रांस ने घरेलू हिंसा से निपटने के लिये मेडिकल स्टोर और नर्सिंग होम को सरकार के प्राधिकारी के रूप में नियुक्त  किया है
  • भारत में सुधार लाने के लिये सबसे पहले कदम के तौर पर यह आवश्यक होगा कि “पुरुषों को महिलाओं के खिलाफ रखने” के स्थान पर पुरुषों को इस समाधान का भाग बनाया जाए। मर्दानगी की भावना को स्वस्थ मायनों में बढ़ावा देने और पुराने घिसे-पिटे ढर्रे से छुटकारा पाना अनिवार्य होगा।
  • भारत सरकार ने महिलाओं और बच्चों को घरेलू हिंसा से संरक्षण देने के लिये घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 को संसद से पारित कराया है। इस कानून में निहित सभी प्रावधानों का पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिये यह समझना ज़रूरी है कि पीड़ित कौन है। यदि आप एक महिला हैं और रिश्तेदारों में कोई व्यक्ति आपके प्रति दुर्व्यवहार करता है तो आप इस अधिनियम के तहत पीड़ित हैंl 
  • भारत ने सरकार ने वन-स्टॉप सेंटर’ जैसी योजनाएँ प्रारंभ की हैं, जिनका उद्देश्य हिंसा की शिकार महिलाओं की सहायता के लिये चिकित्सीय, कानूनी और मनोवैज्ञानिक सेवाओं की एकीकृत रेंज तक उनकी पहुँच को सुगम व सुनिश्चित करता है।
  • महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा के बारे में जागरूकता फैलाने के लिये वोग इंडिया ने ‘लड़के रुलाते नहीं’ अभियान चलाया, जबकि वैश्विक मानवाधिकार संगठन ‘ब्रेकथ्रू’ द्वारा घरेलू हिंसा के खिलाफ ‘बेल बजाओ’ अभियान चलाया गया। ये दोनों ही अभियान महिलाओं के साथ होने वाली घरेलू हिंसा से निपटने के लिये निजी स्तर पर किये गए शानदार प्रयास थे।
  • इस संकट की घड़ी में घरेलू हिंसा से निपटने के लिये पुलिस की अलग विंग बनाने की आवश्यकता है, इस कार्य में सिविल डिफेंस में कार्यरत लोगों की सहायता ली जा सकती है।
  • राष्ट्रीय महिला आयोग ने घरेलू हिंसा पीड़ितों की मदद के लिये 15 से अधिक गैर-सरकारी संगठनों की एक टास्क फोर्स बनाने का निर्णय लिया है ताकि महिलाओं की ज़रूरत के हिसाब से मदद की जा सके

प्रश्न- लॉकडाउन के दौरान घरेलू हिंसा के बढ़ने के कारणों का उल्लेख करते हुए इस समस्या के समाधान हेतु किये जा रहे प्रयासों का विश्लेषण कीजिये।


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