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  • 08 Aug, 2020
  • 15 min read
शासन व्यवस्था

त्रि-भाषा सूत्र : महत्त्व और चुनौतियाँ

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में त्रि-भाषा सूत्र व उससे संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ 

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में प्रस्तावित ‘त्रि-भाषा सूत्र’ को तमिलनाडु समेत अन्य दक्षिण भारतीय राज्यों ने खारिज कर दिया है और यह आरोप लगाया है कि ‘त्रि-भाषा सूत्र’ के माध्यम से सरकार शिक्षा का संस्कृतिकरण करने का प्रयास कर रही है। हिंदी भाषा की बाध्यता के विरुद्ध कई दशक पूर्व हुए शक्तिशाली आन्दोलन के बाद तमिलनाडु में द्विभाषा नीति (Two-language policy) को अपनाया गया था। वर्ष 2019 में जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मसौदा पेश किया गया था तब भी दक्षिण भारतीय राज्यों ने स्कूलों में हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में पढ़ाने के प्रस्ताव को वापस लेने के लिये केंद्र सरकार पर  दबाव बनाया था।

नई शिक्षा नीति सतत विकास के लिये एजेंडा 2030 के अनुकूल है और इसका उद्देश्य 21वीं शताब्दी की आवश्यकताओं के अनुकूल स्कूल और कॉलेज की शिक्षा को अधिक समग्र, लचीला बनाते हुए भारत को एक ज्ञान आधारित जीवंत समाज और वैश्विक महाशक्ति में बदलकर प्रत्येक छात्र में निहित अद्वितीय क्षमताओं को सामने लाना है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में बहुभाषावाद और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के लिये ‘त्रि-भाषा सूत्र’ पर बल देने का निर्णय लिया गया। इस नीति ने संपूर्ण भारत में त्रि-भाषा सूत्र की उपयुक्तता पर बहस को फिर से प्रारंभ कर दिया है। 

पृष्ठभूमि 

  • ‘त्रि-भाषा सूत्र’ तीन भाषाएँ हिंदी, अंग्रेजी और संबंधित राज्यों की क्षेत्रीय भाषा से संबंधित है।
  • हालाँकि संपूर्ण देश में हिंदी भाषा में शिक्षण एक लंबे समय से चली आ रही व्यवस्था का हिस्सा था, लेकिन इसे सर्वप्रथम राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1968 में एक आधिकारिक दस्तावेज़ के रूप में वर्गीकृत किया गया था।
  • त्रि-भाषा सूत्र कोई नया विषय नहीं है, बल्कि इसकी चर्चा स्वतंत्रता के बाद विश्वविद्यालय शिक्षा संबंधी सुझावों के लिये गठित राधाकृष्णन आयोग (1948-49) की रिपोर्ट से ही प्रारंभ हो गई थी। जिसमें तीन भाषाओं में पढ़ाई की व्यवस्था का परामर्श दिया गया था। आयोग का कहना था कि माध्यमिक स्तर पर प्रादेशिक भाषा, हिंदी भाषा और अंग्रेजी भाषा की शिक्षा दी जाए।
  • इसके बाद वर्ष 1955 में डॉ लक्ष्मण स्वामी मुदालियर के नेतृत्व में माध्यमिक शिक्षा आयोग का गठन किया गया, जिसने प्रादेशिक भाषा के साथ हिंदी के अध्ययन का द्विभाषा सूत्र दिया और अंग्रेजी व किसी अन्य भाषा को वैकल्पिक भाषा बनाने का प्रस्ताव रखा।
  • कोठारी आयोग की सिफारिश पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1968 में ‘त्रि-भाषा सूत्र’ को स्वीकार कर लिया गया परंतु इसे धरातल पर नहीं लाया जा सका

क्या है त्रि-भाषा सूत्र?

  • पहली भाषा: यह मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा होगी। 
  • दूसरी भाषा: हिंदी भाषी राज्यों में यह अन्य आधुनिक भारतीय भाषा या अंग्रेज़ी होगी। गैर-हिंदी भाषी राज्यों में यह हिंदी या अंग्रेज़ी होगी।
  • तीसरी भाषा: हिंदी भाषी राज्यों में यह अंग्रेज़ी या एक आधुनिक भारतीय भाषा होगी। गैर-हिंदी भाषी राज्य में यह अंग्रेज़ी या एक आधुनिक भारतीय भाषा होगी। 

त्रि-भाषा सूत्र की आवश्यकता

  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के अनुसार भाषा सीखना बच्चे के संज्ञानात्मक विकास का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। इसका प्राथमिक उद्देश्य बहुउद्देश्यीयता (Multilingualism) और राष्ट्रीय सद्भाव (National Harmony) को बढ़ावा देना है।
  • त्रि-भाषा सूत्र का उद्देश्य हिंदी व गैर-हिंदी भाषी राज्यों में भाषा के अंतर को समाप्त करना है।
    • इसके अंतर्गत एक आधुनिक भारतीय भाषा का अध्ययन शामिल था, अधिमानतः हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी और अंग्रेजी के अलावा दक्षिणी भारतीय भाषाओं में से कोई एक।
    • गैर-हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी भाषा का क्षेत्रीय भाषा और अंग्रेजी भाषा के साथ अध्ययन किया जाना शामिल था। 

कार्यान्वयन में चुनौतियाँ 

  • दक्षिण भारत में व्यापक विरोध 
    • दक्षिण भारत में हिंदी विरोध की शुरुआत स्वतंत्रता से पूर्व हो गई थी। वर्ष 1937 में हुए प्रांतीय चुनावों में मद्रास प्रेसिडेंसी में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत मिला और शासन की बागडोर चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के हाथ आई, जिन्होंने राज्य में हिंदी की शिक्षा को बढ़ावा देने को लेकर अपने विचार व्यक्त किये। 
    • अप्रैल 1938 में मद्रास प्रेसिडेंसी के लगभग 125 माध्यमिक स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य भाषा के तौर पर लागू कर दिया गया।
    • तमिलों में इस निर्णय के प्रति कड़ी प्रतिक्रिया दिखी और जल्द ही इस विरोध ने एक जनांदोलन का रूप ले लिया। अन्नादुरई ने इस आंदोलन को अपनी राजनीतिक पहचान स्थापित करने का उपकरण बना लिया। यह आंदोलन लगभग दो वर्ष तक चला। 
  • ब्रिटिश शासन ने समाप्त की हिंदी की अनिवार्यता
    • वर्ष 1939 में राजगोपालाचारी की सरकार ने त्यागपत्र दे दिया और फिर ब्रिटिश शासन ने सरकार के फैसले को वापस लेते हुए हिंदी की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया। 
    • तब यह आंदोलन थम अवश्य गया, मगर यहाँ से राज्य में हिंदी विरोधी राजनीति का जो बीजारोपण हुआ, जो आगे फलता-फूलता ही गया। 
  • तमिलनाडु के लिये राजनीतिक मुद्दा 
    • वर्ष 1967 में इस हिंदी विरोधी आंदोलन पर चढ़कर एक राजनीतिक दल द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (Dravida Munnetra Kazhagam-DMK) तमिलनाडु की सत्ता हासिल करने में कामयाब हो गई। इसी के साथ हिंदी विरोध दक्षिण, खासकर तमिलनाडु की राजनीति का एक आवश्यक उपकरण बन गया जो आज भी यथावत कायम है।
  • हिंदी-भाषी राज्य भी उत्तरदायी
    • दक्षिण भारतीय राज्यों में हिंदी भाषा के विरोध का अवसर देने के लिये काफी हद तक हिंदी भाषी राज्यों के लोगों का दक्षिण भारतीय भाषाओं के प्रति उदासीन रवैया भी जिम्मेदार है। 
    • हिंदी भाषी राज्यों में तमिल-तेलुगू जैसी भाषाओं को सीखने-सिखाने के प्रति कोई उत्साह नहीं दिखाई देता है, इसलिये दक्षिण भारतीय राज्यों में भी हिंदी भाषा के प्रति कोई विशेष लगाव नहीं हैं।

भाषा नीति पर तमिलनाडु मॉडल 

  • वर्ष 1968 के बाद तमिलनाडु ने द्विभाषा नीति के अंतर्गत तमिल और अंग्रेजी भाषा को अपनाया। 
  • दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु ने वैश्वीकरण के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए संपर्क भाषा के रूप में अंग्रेजी को महत्त्व दिया। अंग्रेजी भाषा के ज्ञान ने तमिल लोगों को विकास के बेहतर अवसर प्रदान किये।    
  • तमिलनाडु समेत दक्षिण भारतीय राज्यों में सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी पर्यावरण के विकास में अंग्रेजी भाषा व तकनीकी ज्ञान का बड़ा योगदान रहा है।
  • घरेलू स्तर पर अपनी क्षेत्रीय भाषा तमिल, तेलगू के विकास ने बंधुत्व की भावना में विकास किया है।

तमिलनाडु में हिंदी का प्रसार

  • तमिलनाडु का हिंदी भाषा के प्रति विरोध छात्रों को राष्ट्रीय संपर्क भाषा के रूप में हिंदी भाषा को सीखने से वंचित कर रहा है।
  • हालाँकि हिंदी भाषा की स्वैच्छिक शिक्षा को कभी भी प्रतिबंधित नहीं किया गया है और CBSE स्कूलों की संख्या में पिछले एक दशक में वृद्धि हुई है, जहाँ हिंदी भाषा का अध्ययन कराया जाता  है।
  • चेन्नई स्थित 102 वर्ष प्राचीन दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा (Dakshina Bharat Hindi Prachar Sabha) हिंदी भाषा के संरक्षण के लिये लगातार कार्य कर रहा है। प्रचार सभा के शताब्दी वर्ष में दक्षिण भारत में सक्रिय हिंदी प्रचारकों (शिक्षकों) का 73 प्रतिशत हिस्सा तमिलनाडु से संबंधित था।  

भाषा संबंधी संवैधानिक प्रावधान

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 29 अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करता है। अनुच्छेद में कहा गया है कि नागरिकों के किसी भी वर्ग "जिसकी स्वयं की विशिष्ट भाषा, लिपि या संस्कृति है" को उसका संरक्षण करने का अधिकार होगा।
  • अनुच्छेद 343 भारत संघ की आधिकारिक भाषा से संबंधित है। इस अनुच्छेद के अनुसार, हिंदी देवनागरी लिपि में होनी चाहिये और अंकों के संदर्भ में भारतीय अंकों के अंतर्राष्ट्रीय रूप का अनुसरण किया जाना चाहिये। इस अनुच्छेद में यह भी कहा गया है कि संविधान को अपनाए जाने के शुरुआती 15 वर्षों तक अंग्रेज़ी का आधिकारिक भाषा के रूप में उपयोग जारी रहेगा। 
  • अनुच्छेद 346 राज्यों और संघ एवं राज्य के बीच संचार हेतु आधिकारिक भाषा के विषय में प्रबंध करता है। अनुच्छेद के अनुसार, उक्त कार्य के लिये "अधिकृत" भाषा का उपयोग किया जाएगा। हालाँकि यदि दो या दो से अधिक राज्य सहमत हैं कि उनके मध्य संचार की भाषा हिंदी होगी, तो आधिकारिक भाषा के रूप में हिंदी का उपयोग किया जा सकता है। 
  • अनुच्छेद 347 किसी राज्य की जनसंख्या के किसी भाग द्वारा बोली जाने वाली भाषा के संबंध में विशेष उपबंध। यह अनुच्छेद राष्ट्रपति को किसी राज्य की आधिकारिक भाषा के रूप में एक भाषा को चुनने की शक्ति प्रदान करता है, यदि किसी राज्य की जनसंख्या का पर्याप्त भाग यह चाहता है कि उसके द्वारा बोली जाने वाली भाषा को राज्य द्वारा मान्यता दी जाए तो वह निदेश दे सकता है कि ऐसी भाषा को भी उस राज्य में सर्वत्र या उसके किसी भाग में ऐसे प्रयोजन के लिये, जो वह विनिर्दिष्ट करे, शासकीय मान्यता दी जाए।
  • अनुच्छेद 350A  प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की सुविधाएँ प्रदान करता है।
  • अनुच्छेद 350B भाषाई अल्पसंख्यकों के लिये एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति का प्रावधान करता है। विशेष अधिकारी को राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाएगी, यह भाषाई अल्पसंख्यकों के सुरक्षा उपायों से संबंधित सभी मामलों की जाँच करेगा तथा सीधे राष्ट्रपति को रिपोर्ट सौंपेगा। तत्पश्चात् राष्ट्रपति उस रिपोर्ट को संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है या उसे संबंधित राज्य/राज्यों की सरकारों को भेज सकता है।

निष्कर्ष

  • इस प्रकार त्रि-भाषा सूत्र राज्यों के बीच भाषाई अंतर को समाप्त कर राष्ट्रीय एकता में वृद्धि का  विचार रखता है। हालाँकि यह भारत की जातीय विविधता को एकीकृत करने के लिये एकमात्र उपलब्ध विकल्प नहीं है। तमिलनाडु जैसे राज्यों ने अपनी भाषा नीति के साथ न केवल शिक्षा मानक स्तरों को बढ़ाने में कामयाबी हासिल की है, बल्कि त्रि-भाषा सूत्र को अपनाए बिना राष्ट्रीय अखंडता को भी बढ़ावा दिया है। इसलिये त्रि-भाषा सूत्र पर व्यापक विचार-विमर्श की आवश्यकता है।

प्रश्न- ‘त्रि-भाषा सूत्र’ से आप क्या समझते हैं? इसकी आवश्यकता का उल्लेख करते हुए क्रियान्वयन में आने वाली चुनौतियों का विश्लेषण कीजिये।


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