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भारत में जनजातियों की स्थिति

  • 05 Mar 2019
  • 20 min read

संदर्भ

कुछ समय पहले अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह की सेंटिनलीज जनजाति व्यापक चर्चा का विषय बनी हुई थी। माजरा कुछ यूँ था कि इस जनजाति के कुछ सदस्यों ने एक अमेरिकी पर्यटक की हत्या कर दी थी। गौरतलब है कि बाहरी दुनिया तथा बाहरी हस्तक्षेप के प्रति इनका रवैया अमूमन शत्रुतापूर्ण ही रहा है।

  • इस प्रकार का वाकया पहली बार देखने को नहीं मिला है। जब-जब बाहरी लोगों ने इन जनजातियों के साथ संपर्क साधने की कोशिश की तब-तब इन्होंने हिंसक तेवर अपनाए। इनके इसे रवैये के कारण देश की आज़ादी से पहले ब्रिटिश शासन ने इन्हें Criminal Tribes Act,1871 के तहत क्रिमिनल जनजाति तक का दर्जा दे दिया था और इनके बच्चों को 6 वर्ष की आयु के पश्चात् इनके माता-पिता से दूर कर दिया जाता था।
  • हालाँकि आज़ादी के बाद भारत सरकार ने इनके क्रिमिनल जनजातियों के दर्जे को बदलकर गैर-अधिसूचित जनजातियाँ (De-notified Tribes) कर दिया। ये जनजातियाँ मसलन डी-नोटिफाईड और नोमेडिक/सेमि-नोमेडिक, सरल शब्दों में कहें तो घुमंतू जनजातियाँ आज भी कई समस्याओं का सामना कर रही हैं। समाज के अन्य सदस्यों के बीच इनकी दयनीय स्थिति किसी से छुपी नहीं है।
  • ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर क्या कारण है कि ये जनजातियाँ बाहरी लोगों से अपना संपर्क नहीं साध पाती हैं? क्यों ये आधुनिक दुनिया से अलगाव महसूस करती हैं? सवाल यह भी है कि ये जनजातियाँ किन-किन समस्याओं का सामना कर रही हैं? इस लेख में इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की गई है। यहीं पर एक और सवाल मन में कौंधता है कि जनजाति किसे कहते हैं? इसकी परिभाषा क्या है? इस लेख के माध्यम से हम इन्हीं कुछ प्रश्नों का जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे।

भारत में जनजातियाँ

जनजातियाँ वह मानव समुदाय हैं जो एक अलग निश्चित भू-भाग में निवास करती हैं और जिनकी एक अलग संस्कृति, अलग रीति-रिवाज, अलग भाषा होती है तथा ये केवल अपने ही समुदाय में विवाह करती हैं। सरल अर्थों में कहें तो जनजातियों का अपना एक वंशज, पूर्वज तथा सामान्य से देवी-देवता होते हैं। ये अमूमन प्रकृति पूजक होते हैं।

  • भारतीय संविधान में जहाँ इन्हें 'अनुसूचित जनजाति' कहा गया है तो दूसरी ओर, इन्हें अन्य कई नामों से भी जाना जाता है मसलन- आदिवासी, आदिम-जाति, वनवासी, प्रागैतिहासिक, असभ्य जाति, असाक्षर, निरक्षर तथा कबीलाई समूह इत्यादि। हालाँकि भारतीय जनजातियों का मूल स्रोत कभी देश के संपूर्ण भू-भाग पर फैली प्रोटो ऑस्ट्रेलॉयड तथा मंगोल जैसी प्रजातियों को माना जाता है। इनका एक अन्य स्रोत नेग्रिटो प्रजाति भी है जिसके वंशज अण्डमान- निकोबार द्वीपसमूह में अभी भी मौजूद हैं।
  • गौरतलब है कि अनेकता में एकता ही भारतीय संस्कृति की पहचान है और इसी के मूल में निश्चित रूप से भारत के विभिन्न प्रदेशों में स्थित जनजातियाँ हैं जो विभिन्न क्षेत्रों में रहते हुए अपनी संस्कृति के ज़रिये भारतीय संस्कृति को एक अनोखी पहचान देती हैं।
  • वर्तमान में भी भारत में उत्तर से लेकर दक्षिण तथा पूर्व से लेकर पश्चिम तक जनजातियों के साथ-साथ संस्कृति का विविधीकरण देखने को मिलता है। भारत भर में जनजातियों की स्थिति का जायजा उनके भौगोलिक वितरण को समझकर आसानी से लिया जा सकता है।

जनजातियों का भौगोलिक वितरण

भौगोलिक आधार पर भारत की जनजातियों को विभिन्न भागों में विभाजित किया गया है जैसे-उत्तर तथा पूर्वोत्तर क्षेत्र, मध्य क्षेत्र, दक्षिण क्षेत्र और द्वीपीय क्षेत्र।

  • उत्तर तथा पूर्वोत्तर क्षेत्र के अंतर्गत हिमालय के तराई क्षेत्र, उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र सम्मिलित किये जाते हैं। कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, दक्षिणी उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड तथा पूर्वोत्तर के सभी राज्य इस क्षेत्र में आते हैं। इन क्षेत्रों में बकरवाल, गुर्जर, थारू, बुक्सा, राजी, जौनसारी, शौका, भोटिया, गद्दी, किन्नौरी, गारो, ख़ासी, जयंतिया इत्यादि जनजातियाँ निवास करती हैं।
  • गर बात करें मध्य क्षेत्र की तो इसमें प्रायद्वीपीय भारत के पठारी तथा पहाड़ी क्षेत्र शामिल हैं। मध्य प्रदेश, दक्षिण राजस्थान, आंध्र प्रदेश, दक्षिणी उत्तर प्रदेश, गुजरात, बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, ओडिशा आदि राज्य इस क्षेत्र में आते हैं जहाँ भील, गोंड, रेड्डी, संथाल, हो, मुंडा, कोरवा, उरांव, कोल, बंजारा, मीणा, कोली आदि जनजातियाँ रहती हैं।
  • दक्षिणी क्षेत्र के अंतर्गत कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल राज्य आते हैं जहाँ टोडा, कोरमा, गोंड, भील, कडार, इरुला आदि जनजातियाँ बसी हुई हैं।
  • द्वीपीय क्षेत्र में अमूमन अंडमान एवं निकोबार की जनजातियाँ आती हैं। मसलन- सेंटिनलीज, ओंग, जारवा, शोम्पेन इत्यादि। हालिया चर्चा का विषय रहने के कारण यह ज़रूरी हो जाता है कि हम एक सरसरी नज़र सेंटिनलीज जनजाति पर डाल लें।

सेंटिनलीज जनजाति

  • यह जनजाति एक प्रतिबंधित उत्तरी सेंटिनल द्वीप पर रहने वाली एक नेग्रिटो जनजाति है। 2011 के जनगणना आँकड़ों के अनुसार द्वीप पर इनकी संख्या 15 के आस-पास थी।
  • जहाँ एक तरफ अंडमान द्वीप में चार नेग्रिटो जनजातियों- ग्रेट अंडमानी, ओंगे/ओंज, जारवा तथा सेंटिनलीज का निवास है तो वहीं दूसरी तरफ निकोबार में दो मंगोलॉइड जनजातियाँ मसलन- निकोबारी और शोम्पेन का निवास है।
  • सेंटिनलीज के साथ ही अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह की अन्य जनजातियाँ- ग्रेट अंडमानी, ओंगे, जारवा तथा शोम्पेन भारत की विशेष रूप से अति संवेदनशील जनजातीय समूहों यानी Particularly Vulnerable Tribal Groups (PVTGs) में शामिल हैं।

“आज दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का दर्जा भारत ने हासिल तो कर लिया है लेकिन अब भी एक तबका ऐसा है जो हाशिये पर है। इस तबके के अंतर्गत वे जनजातियाँ आती हैं जो सुदूरवर्ती इलाकों में जीवन यापन कर रही हैं और कई समस्याओं को झेल रही हैं।”

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाली जनजातियों की समस्याएँ

जनजातियाँ ऐसे इलाकों में निवास करती हैं जहाँ तक बुनियादी सुविधाओं की पहुँच न के बराबर है। लिहाज़ा ये बहुत सारी समस्याओं को झेल रही हैं।

  • अगर बात करें सामाजिक समस्याओं की तो ये आज भी सामाजिक संपर्क स्थापित करने में अपने-आप को सहज नहीं पाती हैं। इस कारण ये सामाजिक-सांस्कृतिक अलगाव, भूमि अलगाव, अस्पृश्यता की भावना महसूस करती हैं। इसी के साथ इनमें शिक्षा, मनोरंजन, स्वास्थ्य तथा पोषण संबंधी सुविधाओं से वंचन की स्थिति भी मिलती है।
  • आज भी जनजातीय समुदायों का एक बहुत बड़ा वर्ग निरक्षर है जिससे ये आम बोलचाल की भाषा को समझ नहीं पाती हैं। सरकार की कौन-कौन सी योजनाएँ इन तबकों के लिये हैं इसकी जानकारी तक इनको नहीं हो पाती है जो इनके सामाजिक रूप से पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण है।
  • इनके आर्थिक रूप से पिछड़ेपन की बात की जाए तो इसमें प्रमुख समस्या गरीबी तथा ऋणग्रस्तता है। आज भी जनजातियों के समुदाय का एक तबका ऐसा है जो दूसरों के घरों में काम कर अपना जीवनयापन कर रहा है। माँ-बाप आर्थिक तंगी के कारण अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा नहीं पाते हैं तथा पैसे के लिये उन्हें बड़े-बड़े व्यवसायियों या दलालों को बेच देते हैं। लिहाज़ा बच्चे या तो समाज के घृणित से घृणित कार्य को अपनाने हेतु विवश हो जाते हैं अन्यथा उन्हें मानव तस्करी का सामना करना पड़ता है। रही बात लड़कियों की तो उन्हें अमूमन वेश्यावृत्ति जैसे घिनौने दलदल में धकेल दिया जाता है। दरअसल जनजातियों के पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण उनका आर्थिक रूप से पिछड़ापन ही है जो उन्हें उनकी बाकी सुविधाओं से वंचित करता है।
  • धार्मिक अलगाव भी जनजातियों की समस्याओं का एक बहुत बड़ा पहलू है। इन जनजातियों के अपने अलग देवी-देवता होते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है समाज में अन्य वर्गों द्वारा इनके प्रति छुआछूत का व्यवहार। अगर हम थोड़ा पीछे जायें तो पाते हैं कि इन जनजातियों को अछूत तथा अनार्य मानकर समाज से बेदखल कर दिया जाता था; सार्वजनिक मंदिरों में प्रवेश तथा पवित्र स्थानों के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया जाता था। आज भी इनकी स्थिति ले-देकर यही है।

यही सब पहलू हैं जिसके कारण जनजातियाँ आज भी बाहरी दुनिया से अपना संपर्क स्थापित नहीं कर पा रही हैं। इन्हीं सब समस्याओं का हल ढूंढने के लिये सरकार द्वारा अपनाए गए कुछ विकासात्मक पहलुओं पर चर्चा करना मुनासिब होगा।

जनजातियों के उत्थान के लिये सरकार द्वारा उठाए गए कदम

संविधान के पन्नों को देखें तो जहाँ एक तरफ अनुसूची 5 में अनुसूचित क्षेत्र तथा अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण का प्रावधान है तो वहीं दूसरी तरफ, अनुसूची 6 में असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम राज्यों में जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन का उपबंध है। इसके अलावा अनुच्छेद 17 समाज में किसी भी तरह की अस्पृश्यता का निषेध करता है तो नीति निदेशक तत्त्वों के अंतर्गत अनुच्छेद 46 के तहत राज्य को यह आदेश दिया गया है कि वह अनुसूचित जाति/जनजाति तथा अन्य दुर्बल वर्गों की शिक्षा और उनके अर्थ संबंधी हितों की रक्षा करे।

  • अनुसूचित जनजातियों के हितों की अधिक प्रभावी तरीके से रक्षा हो, इसके लिये 2003 में 89वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम के द्वारा पृथक राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की स्थापना भी की गई। संविधान में जनजातियों के राजनीतिक हितों की भी रक्षा की गई है। उनकी संख्या के अनुपात में राज्यों की विधानसभाओं तथा पंचायतों में स्थान सुरक्षित रखे गए हैं।
  • संवैधानिक प्रावधानों से इतर भी कुछ कार्य ऐसे हैं जिन्हें सरकार जनजातियों के हितों को अपने स्तर पर भी देखती है। इसमें शामिल हैं- सरकारी सहायता अनुदान, अनाज बैंकों की सुविधा, आर्थिक उन्नति हेतु प्रयास, सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व हेतु उचित शिक्षा व्यवस्था मसलन- छात्रावासों का निर्माण और छात्रवृत्ति की उपलब्धता तथा सांस्कृतिक सुरक्षा मुहैया कराना इत्यादि। इसी के साथ केंद्र तथा राज्यों में जनजातियों के कल्याण हेतु अलग-अलग विभागों की स्थापना की गई है। जनजातीय सलाहकार परिषद इसका एक अच्छा उदाहरण है।
  • इन्हीं पहलों का परिणाम है कि जनजातियों की साक्षरता दर जो 1961 में लगभग 10.3% थी वह 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 66.1% तक बढ़ गई। सरकारी नौकरी प्राप्त करने की सुविधा देने की दृष्टि से अनुसूचित जातियों के सदस्यों की आयु सीमा तथा उनके योग्यता मानदंड में भी विशेष छूट की व्यवस्था की गई है।
  • हालिया सरकार ने भी जनजातियों के उत्थान की दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य किये हैं। मसलन अनुसूचित जनजाति (एसटी) के छात्रों के लिये एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय योजना शुरू हुई है। इसका उद्देश्य दूरदराज़ के क्षेत्रों में रहने वाले विद्यार्थियों को मध्यम और उच्च स्तरीय शिक्षा प्रदान करना है। वहीं अनुसूचित जनजाति कन्या शिक्षा योजना निम्न साक्षरता वाले जिलों में अनुसूचित जनजाति की लड़कियों के लिये लाभकारी सिद्ध होगी।

इन सराहनीय कदमों के बावजूद देश भर में जनजातीय विकास को और मज़बूत करने की दरकार है। यह सही है कि जनजातियों का एक खास तबका समाज की मुख्यधारा में आने से कतराता है, लेकिन ऐसे में इनका समुचित विकास और संरक्षण भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

आगे की राह

  • हालाँकि सरकार अपने स्तर पर जनजातियों की स्थिति को सुधारने की दिशा में बेहतर प्रयास कर रही है लेकिन शासन के कार्यों में और ज़्यादा तब्दीली की ज़रुरत है। योजनाओं का लाभ जनजातियों तक नहीं पहुँच पाता है। इस रुकावट को दूर करना होगा।
  • साथ ही जनजातियों के प्रति मीडिया की उदासीनता को खत्म करने की दरकार है। अमूमन देखा गया है कि जब तक जनजातियों से संबंधित कोई बड़ा हादसा नहीं हो जाता है अथवा कोई सरकारी हस्तक्षेप नहीं होता तब तक प्रायः मीडिया भी सचेत नहीं होती है। मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना गया है तो यह ज़रूरी हो जाता है कि वह समाज के हर तबके के प्रति अपने कर्त्तव्यों का पालन बखूबी करे। यहाँ पर राज्यसभा टी.वी. चैनल द्वारा चलाये गए ‘मैं भी भारत’ कार्यक्रम का जिक्र लाजिमी हो जाता है। जनजातीय जीवनचर्या पर आधारित इस कार्यक्रम ने कुछ हद तक ज़रूर भारत के जनजातीय समुदाय की पहचान को मुखर करने का काम किया है।
  • वहीं आर्थिक पहलुओं के स्तर पर इनसे जुड़ी समस्याओं को हल करने के लिये आदिवासी परिवारों को कृषि हेतु पर्याप्त भूमि देने तथा स्थानांतरित खेती पर भी रोक लगाने की आवश्यकता है। कृषि के अत्याधुनिक तरीकों से उन्हें अवगत कराना भी एक विकल्प है।
  • इसके अलावा शिक्षा संबंधी समस्याओं को दूर करने हेतु यह ज़रूरी है कि आदिवासियों के लिये सामान्य शिक्षा तथा प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाए। स्कूलों में उन्हें व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाए जिससे कि शिक्षा ग्रहण करने के बाद उन्हें बेकारी की समस्या से न जूझना पड़े। कृषि, पशु-पालन, मुर्गी-पालन, मत्स्य-पालन, मधुमक्खी-पालन एवं अन्य प्रकार की हस्तकलाओं का भी उन्हें प्रशिक्षण दिया जाए।
  • स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को हल करने के लिये आदिवासी क्षेत्रों में चिकित्सालय, चिकित्सक एवं आधुनिक दवाइयों का प्रबंधन भी ज़रूरी है। उनके लिये पौष्टिक आहार तथा विटामिन की गोलियों की व्यवस्था की जाए ताकि इनमें कुपोषण से होने वाली बीमारियों को समाप्त किया जा सके।
  • जनजातियों की सबसे प्रमुख समस्याओं में से एक है- उनका सांस्कृतिक अलगाव। लिहाज़ा उनकी इस समस्या को हल करने के लिये ऐसे विश्वविद्यालयों की स्थापना की जाए जहाँ आदिम ललित कलाओं की रक्षा की जा सके। जनजातियों के लिये किये जाने वाले मनोरंजनात्मक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम उन्हीं की भाषा में हों। इसमें उनकी भाषा संबंधी समस्या का भी समाधान निहित है।
  • रही बात समाज के सदस्यों की तो सभी आम नागरिकों का यह कर्त्तव्य होना चाहिये कि वे अपने हितों के साथ-साथ जनजातियों के हितों की भी रक्षा करें। जब ऐसा होगा तभी हम सेंटिनलीज जनजाति जैसे विशेष समूह के मनोविज्ञान को समझ सकेंगे और उनके जीवन में बेवज़ह हस्तक्षेप नहीं करेंगे। साथ ही जो जनजातीय समुदाय संपर्क में आने को इच्छुक हैं उनका स्वागत करने में भी हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिये।

प्रश्न : आखिर क्या कारण है कि जनजातियाँ आज भी समाज से कटाव महसूस करती हैं? भारत की प्रमुख जनजातियों की चर्चा करते हुए उनकी समस्याओं तथा समाधान पर एक संक्षिप्त टिप्पणी कीजिये।

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