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विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

डार्क नेट

  • 17 Dec 2019
  • 12 min read

परिचय

  • इंटरनेट पर ऐसी कई वेबसाइट्स हैं जो आमतौर पर प्रयोग किये जाने वाले गूगल, बिंग जैसे सर्च इंजनों और सामान्य ब्राउज़िंग के दायरे से परे होती हैं। इन्हें डार्क नेट या डीप नेट कहा जाता है। यह केवल TOR (The Onion Router), या I2P (Invisible Internet Project) जैसे विशेष सॉफ्टवेयर का उपयोग करने वाली इंटरनेट की एक परत है।
  • सामान्य वेबसाइट्स के विपरीत ये ऐसे नेटवर्क हैं जिन तक लोगों के चुनिंदा समूहों की ही पहुँच होती है और केवल विशेष ऑथराइज़ेशन प्रक्रिया, विशिष्ट सॉफ़्टवेयर व विन्यास (Configuration) के माध्यम से ही इन तक पहुँचा जा सकता है।
  • इसमें शैक्षणिक डेटाबेस और कार्पोरेट साइट्स जैसे सामान्य क्षेत्रों के साथ ही काला बाज़ार, फेटिश समुदाय (Fetish Community) एवं हैकिंग व पायरेसी जैसे गूढ़ क्षेत्र भी शामिल हैं।
  • "डार्क नेट" (Dark Net) और "डार्क वेब" (Dark Web) शब्दों का उपयोग कई बार एक ही आशय में किया जाता है लेकिन इनके अर्थ में सूक्ष्म भेद है -
    • डार्क नेट, इंटरनेट पर निर्मित एक नेटवर्क है।
    • डार्क वेब, डार्क नेट पर उपस्थित वेबसाइटों को संदर्भित करता है।

Dark Net

डीप वेब (Deep Web), सतही वेब (Surface Web) और डार्क वेब (Dark Web):

  • डीप वेब (Deep Web):
    • डीप वेब तक केवल सर्च इंजन से प्राप्त परिणामों की सहायता से नहीं पहुँचा जा सकता है।
    • डीप वेब वर्ड वाइड वेब (World Wide Web) का वह भाग है जो गूगल जैसे सर्च इंजन द्वारा अनुक्रमित नहीं होता है। यह आकार में सतही वेब से लगभग 500 से 600 गुना बड़ा है।
    • डीप वेब के किसी डॉक्यूमेंट तक पहुँचने के लिये यूज़र नेम और पासवर्ड के द्वारा उसके URL एड्रेस पर जाकर लॉग-इन करना होता है।
    • जीमेल अकाउंट, ब्लॉगिंग वेबसाइट, सरकारी प्रकाशन, अकादमिक डेटाबेस, वैज्ञानिक अनुसंधान आदि ऐसी ही वेबसाइट्स होती हैं जो अपने प्रकृति में वैधानिक हैं किंतु इन तक पहुँच के लिये एडमिन की अनुमति आवश्यकता होती है।
  • सतही वेब (Surface Web):
    • यह इंटरनेट का वह भाग है जिसका आमतौर पर हम दिन-प्रतिदिन के कार्यों में प्रयोग करते हैं।
    • जैसे गूगल या याहू पर कुछ भी सर्च करते हैं तो हमें सर्च रिज़ल्ट्स प्राप्त होते हैं और इसके लिये किसी विशिष्ट अनुमति की आवश्यकता नहीं होती।
    • ऐसी वेबसाइट्स की सर्च इंजन द्वारा इंडेक्सिंग की जाती है। इसलिये इन तक सर्च इंजन के माध्यम से पहुँचा जा सकता है।
    • इसे विजिबल वेब (Visible Web), इंडेक्सेड वेब (Indexed Web), इंडेक्सेबल वेब (Indexable Web) या लाइटनेट (Lightnet) भी कहा जाता है।
  • डार्क वेब (Dark Web):
    • डार्क वेब अथवा डार्क नेट इंटरनेट का वह भाग है जिसे आमतौर पर प्रयुक्त किये जाने वाले सर्च इंजन से एक्सेस नहीं किया जा सकता।
    • इसका इस्तेमाल मानव तस्करी, मादक पदार्थों की खरीद और बिक्री, हथियारों की तस्करी जैसी अवैध गतिविधियों में किया जाता है।
    • डार्क वेब की साइट्स को टॉर (TOR-The Onion Router) एन्क्रिप्शन टूल की सहायता से छुपा दिया जाता है जिससे इन तक सामान्य सर्च इंजन से नहीं पहुँचा जा सकता।
    • इन तक पहुँच के लिये एक विशेष टूल टॉर (TOR) का इस्तेमाल किया जाता है क्योंकि इसमें एकल असुरक्षित सर्वर के विपरीत नोड्स के एक नेटवर्क का उपयोग करते हुए परत-दर-परत डेटा का एन्क्रिप्शन होता है जिससे इसके प्रयोगकर्त्ताओं की गोपनीयता बनी रहती है।
    • समग्र इंटरनेट का 96% भाग डार्क वेब से निर्मित है, जबकि सतही वेब केवल 4% है।

डार्क नेट की उपयोगिता:

  • नियंत्रण/सेंसरशिप से बचाव के लिये: संवृत समाज (Closed Society) और अत्यधिक नियंत्रण या सेंसरशिप का सामना कर रहे लोग डार्क नेट का उपयोग अपने समाज से बाहर के दूसरे व्यक्तियों के साथ संवाद के लिये कर सकते हैं।
  • गुमनामी और गोपनीयता: वैश्विक स्तर पर विभिन्न देशों में सरकार द्वारा जासूसी और डेटा संग्रह के बारे में बढ़ रही अनियमितताओं के कारण खुले समाज (Open Society) के व्यक्तियों को भी डार्क नेट के उपयोग में रुचि हो सकती है।
  • यह मुखबिरों (Whistleblowers) और पत्रकारों के लिये संचार में गोपनीयता बनाए रखने तथा जानकारी लीक करने एवं स्थानांतरित करने हेतु उपयोगी है।

डार्क नेट को लेकर चिंताएँ:

  • अवैध गतिविधियों की सुगमता: डार्क नेट पर संचालित गतिविधियों का एक बड़ा भाग अवैध है। डार्क नेट एक स्तर की पहचान सुरक्षा प्रदान करता है जो कि सतही नेट प्रदान नहीं करता है।
    • डार्क नेट एक काला बाज़ार (Black Market) की तरह है जहाँ अवैध गतिविधियाँ संचालित होती हैं।
    • अपराधी वर्ग किसी की नज़र में आने और पकड़े जाने से बचने के लिये अपनी पहचान छुपाने के उद्देश्य से डार्क नेट की ओर आकर्षित हुए हैं। इसलिये यह आश्चर्यजनक नहीं है कि कई चर्चित हैक (Hack) और डेटा उल्लंघनों के मामले किसी-न-किसी प्रकार डार्क नेट से संबद्ध पाए गए हैं।
    • डार्क नेट की सापेक्ष अभेद्यता ने इसे ड्रग डीलरों, हथियार तस्करों, चाइल्ड पोर्नोग्राफी संग्रहकर्त्ताओं तथा वित्तीय और शारीरिक अपराधों में शामिल अन्य अपराधियों के लिये एक प्रमुख ज़ोन बना दिया है।
    • यदि संभावित क्रेता की डार्क नेट पर ऐसी वेबसाइट्स तक पहुँच हो जाए तो इनके माध्यम से विलुप्तप्राय वन्यजीव से लेकर विस्फोटक सामग्री एवं किसी भी प्रकार के मादक पदार्थों की खरीद की जा सकती है।
    • सिल्क रोड मार्केटप्लेस नामक वेबसाइट डार्क नेटवर्क का एक प्रसिद्ध उदाहरण है जिस पर हथियारों सहित विभिन्न प्रकार की अवैध वस्तुओं की खरीद एवं बिक्री की जाती थी। यद्यपि इसे वर्ष 2013 में सरकार द्वारा बंद करा दिया गया किंतु इसने ऐसे कई अन्य बाज़ारों के उभार को प्रेरित किया।
  • सक्रियतावादियों (Activists) और क्रांतिकारियों द्वारा डार्क नेट का उपयोग अपने संगठन के लिये किया जाता है जहाँ सरकार द्वारा उनकी गतिविधियों की निगरानी या उन्हें पकड़े जाने का भय कम होता है।
  • आतंकवादियों द्वारा डार्क नेट का उपयोग साथी आतंकवादियों तक सूचनाओं के प्रसार, उनकी भर्ती और उनमें कट्टरता का प्रसार, अपने आतंकी विचारों के प्रचार-प्रसार, धन जुटाने तथा अपने कार्यों व हमलों के समन्वय के लिये किया जाता है।
  • आतंकवादी बिटकॉइन (Bitcoin) एवं अन्य क्रिप्टोकरेंसी जैसी आभासी मुद्राओं का उपयोग करके विस्फोटक पदार्थों एवं हथियारों की अवैध खरीद के लिये भी डार्क नेट का उपयोग करते हैं।
  • सुरक्षा विशेषज्ञों का दावा है कि हैकिंग और धोखेबाज़ी में शामिल व्यक्ति डार्क वेब पर चर्चा मंचों के माध्यम से पर्यवेक्षी नियंत्रण और डेटा अधिग्रहण (Supervisory Control and Data Acquisition-SCADA) और औद्योगिक नियंत्रण प्रणाली (Industrial Control System-ICS) तक पहुँच की पेशकश करने लगे हैं जो विश्व भर के महत्तवपूर्ण अवसंरचनात्मक नेटवर्कों की सुरक्षा के लिये बड़ी चुनौती हो सकती है।
    • पर्यवेक्षी नियंत्रण और डेटा अधिग्रहण (SCADA) प्रणाली का उपयोग परमाणु ऊर्जा स्टेशनों, तेल रिफाइनरियों और रासायनिक संयंत्रों जैसी सुविधाओं के संचालन के लिये किया जाता है इसलिये यदि साइबर अपराधियों को इन प्रमुख नेटवर्कों तक पहुँच प्राप्त हो गई तो इसके परिणाम अत्यंत घातक हो सकते हैं।

आगे की राह

  • वित्तीय क्षेत्र में क्रिप्टोकरेंसी के बढ़ते महत्त्व को देखते हुए यह संभव है कि भविष्य में प्रतिदिन के इंटरनेट उपयोगकर्त्ताओं के लिये भी डार्क नेट सामान्य रूप से उपलब्ध हो जाएगा। वहीं अपराधियों के लिये पहचान और गतिविधियों को गुप्त रखने का माध्यम होने के साथ यहाँ पूर्ण गोपनीयता की गारंटी नहीं है।
  • डार्क नेट द्वारा उत्पन्न खतरों से निपटने के लिये दुनिया भर की सरकारों को अपने साइबर सुरक्षा ढाँचे को मज़बूत करना चाहिये तथा विश्व भर के साइबर स्पेस की सुरक्षा के लिये सरकारों को खुफिया ज़ानकारी, सूचना, तकनीकी और अनुभवों को साझा करते हुए एक-दूसरे का सहयोग करना चाहिये।
  • भारत को साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास और कर्मियों के प्रशिक्षण व क्षमता निर्माण पर पर्याप्त निवेश करना चाहिये।
    • केरल पुलिस विभाग की पहल ‘साइबरडोम’ (Cyberdome) एक तकनीकी अनुसंधान एवं विकास केंद्र है जो साइबर अपराध को रोकने तथा राज्य के महत्त्वपूर्ण सूचना ढाँचे को मज़बूत करने के उद्देश्य से साइबर सुरक्षा खतरों को कम करने के प्रति समर्पित है।
    • यह सही दिशा में बढ़ाया गया कदम है जिससे देश के अन्य संबंधित प्राधिकारी वर्ग को भी प्रेरणा लेनी चाहिये।
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