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भारतीय मूर्तिकला (भाग -2)

  • 11 Feb 2019
  • 9 min read

अमरावती (धान्यकटक) मूर्तिकला

  • इस शैली का विकास अमरावती में होने के कारण इसे अमरावती शैली कहा गया।
  • अमरावती दक्षिण भारत में कृष्णा नदी के निचले हिस्से में गुण्टूर ज़िले (आंध्र प्रदेश) के पास स्थित है।
  • सातवाहन काल (द्वितीय शताब्दी) में इस शैली का आगमन हुआ।
  • इस शैली में धार्मिक विषयवस्तु पर मूर्तियों का निर्माण हुआ है तथा प्रस्तर मूर्तियाँ ज़्यादा बनाई गई हैं।
  • यहीं एक अन्य मूर्ति में बुद्ध के दुष्ट चचेरे भाई देवदत्त द्वारा उन पर छोड़े गए पागल हाथी नीलगिरी को शांत करने का दृश्य उत्कीर्ण है।
  • दूसरी शताब्दी ई. में अमरावती से प्राप्त एक प्रसिद्ध उत्कीर्णन में चार स्त्रियों को बुद्ध के चरणों को पूजते हुए दिखाया गया है।
  • अमरावती की परिष्कृत शैली का एक अन्य उदाहरण सुंदर अर्गला जंगल में देखने को मिलता है। इसमें उत्कीर्ण दृश्य में राजकुमार राहुल को अपने पिता बुद्ध के सामने प्रस्तुत होते दिखाया गया है जब वे अपने पूर्व महल में अपने परिवार से मिलने पहुँचे।
  • इस शैली में जहाँ सजीवता एवं भक्ति भाव का दर्शन होता है, वहीं कुछ मूर्तियों में काम विषयक अभिव्यक्ति भी देखने को मिलती है।
  • अमरावती से प्राप्त स्तूप प्राचीनतम और काफी प्रसिद्ध है।

गुप्तकालीन मूर्तिकला

  • गुप्त मूर्तिकला में तीनों धर्मों (बौद्ध, जैन, ब्राह्मण-हिन्दू धर्म) के अलावा गैर-धार्मिक विषयों की भी मूर्तियाँ बनाई गई हैं।
  • सारनाथ, मथुरा और पाटलिपुत्र गुप्तकालीन मूर्तिकला के प्रमुख केन्द्र थे।
  • गुप्तकालीन मूर्तियों की निर्मलता, अंग सौंदर्य, वास्तविक हाव-भाव एवं जीवंतता ने कला को ऊँचाई प्रदान की।
  • सारनाथ से प्राप्त धर्म चक्र प्रवर्तन मुद्रा तथा सुल्तानगंज (बिहार) से प्राप्त 7.5 फीट ऊँची, 12 टन वज़नी बुद्ध की ताम्रमूर्ति अतिविशिष्ट हैं।
  • गुप्तकाल में जैन धर्म पर हिन्दू प्रभाव बढ़ रहा था, इसलिये तीर्थंकर के बगल में इन्द्र, सूर्य, कुबेर आदि की मूर्तियाँ बनने लगीं।
  • गुप्तकालीन जैन धर्म के अंतर्गत विशालकाय बाहुबली की मूर्तियाँ बननी शुरू हो गईं।
  • गुप्तकाल में दशावतार की मान्यता आई। अत: इस दौर में सर्वाधिक मूर्तियाँ ब्राह्मण-हिन्दू धर्म से संबंधित ही बनीं।
  • एलोरा (दशावतार मूर्तियाँ), खजुराहो, देवगढ़, आदि जगहों पर विष्णु के 10 अवतारों को मूर्त रूप दिया गया है। इनमें देवगढ़ की शेषसायी विष्णु मूर्ति प्रसिद्ध है।
  • ढाका से प्राप्त मत्स्यावतार और कच्छपावतार मूर्ति, उदयगिरि की गुफा से प्राप्त मूर्ति, भूमरा (राजस्थान) से प्राप्त नर-नारायण और कृष्ण की रास-लीला मूर्ति, भिलसा के मंदिर से प्राप्त वाराह अवतार की मूर्ति तथा एलिपेंटा से प्राप्त विख्यात त्रिमूर्ति गुप्तकालीन मूर्तिकला की विशिष्टता के प्रमाण हैं।
  • भूमि स्पर्श मुद्रा में बुद्ध मूर्ति (सारनाथ), 11 मानुषी बुद्ध मूर्ति (एलोरा) तथा बुद्ध के प्रथम उपदेश का चित्रण भी गुप्तकालीन मूर्तिकला के महत्त्वपूर्ण उदाहरण हैं।
  • हिन्दुकुश पर्वत शृंखला की बामियान घाटी (अफगानिस्तान) में ‘सिल्क रूट’ पर पहाड़ को काटकर बुद्ध की दो भव्य प्रतिमाएँ 6वीं-7वीं सदी में बनाई गईं जो गांधार कला का शीर्षस्थ नमूना था। इसे कट्टरपंथी तालिबान शासन ने मार्च 2001 में ध्वस्त कर दिया।

चालुक्यकालीन मूर्तिकला

  • इसके चार प्रमुख केन्द्र बादामी, ऐहोल,पट्टडकल और महाकूट हैं। ये चारों कर्नाटक राज्य में अवस्थित हैं।
  • चालुक्य मूर्तियाँ बलिष्ठ और विशालकाय हैं तथा अंग-प्रत्यंग समानुपातिक हैं।
  • बादामी (कर्नाटक) में मिली नटराज की 18 हाथों की मूर्ति, विष्णु के त्रिविक्रम स्वरूप की मूर्ति, वाराह अवतार मूर्ति तथा बैकुंठ नारायण विष्णु की प्रशंसनीय प्रतिमाएँ मिली हैं।
  • पट्टडकल की मूर्तियाँ चालुक्य शिल्प में शांत, संतुलित, ऊर्जा से युक्त, जीवंत और भव्य हैं।
  • पट्टडकल से मिली त्रिपुरांतक और अंधकार मूर्तियों के साथ-साथ कैलाश पर्वत को उठाए रावण की मूर्ति को विशेष प्रशंसा मिली है।
  • ऐहोल की मूर्तियों के आलंकारिक अंकनों में विशेष कुशलता दिखाई देती है; यथा- लयबद्धता, धोती एवं अन्य वस्त्रों पर गहरी धारी दिखती है।
  • ऐहोल में बना दुर्गा मंदिर चालुक्य मूर्तिशिल्प का महत्त्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है।
  • महाकूट के महाकूटेश्वर मंदिर में अर्द्धनारीश्वर, लकुलीश और हरिहर की मूर्तियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

राष्ट्रकूटकालीन मूर्तिकला

  • इस दौर में मुख्यत: महाराष्ट्र के एलोरा, एलीफेंटा और कन्हेरी में मूर्तिशिल्प का काम हुआ है।
  • एलोरा या वेरूल और एलीफेंटा में शिव के विविध रूपों का विस्तारपूर्वक अंकन हुआ है।
  • एलोरा में शिव, विष्णु, शक्ति और सूर्य की मूर्तियों के उदाहरण हैं, जबकि कन्हेरी (महाराष्ट्र) में बौद्ध शिल्प के उदाहरण मिलते हैं।
  • एलोरा की मूर्तियों का ओज कथावस्तु के अनुसार है, लेकिन उसमें सजीवता नहीं दिखती। मूर्तियाँ चट्टानों को काटकर उन्हें उभारकर बनाई गई हैं।
  • मूर्तियों को वस्त्र कम लेकिन आभूषण अधिक पहनाए गए हैं।
  • एलोरा की सभी गुफाओं के बाहर अधिकांशत: द्वारपाल के रूप में गंगा एवं यमुना की मूर्तियाँ बनाई गई हैं।

ओडिशा (कलिंग) की मूर्तिकला

  • ओडिशा भारतीय वास्तुकला और मूर्तिशिल्प का प्रमुख केन्द्र रहा है। इसमें पुरी के जगन्नाथ मंदिर, भुवनेश्वर के लिंगराज मंदिर तथा कोणार्क के सूर्य मंदिर के शिल्प को शामिल किया गया है।
  • पुरी के जगन्नाथ मंदिर में भगवान जगन्नाथ, सुभद्रा और बलराम की विशाल मूर्तियों के अलावा शिव-पर्वती, ब्रह्म-सावित्री और विष्णु-लक्ष्मी की भी मूर्तियाँ बनाई गई हैं।
  • कोणार्क के सूर्य मंदिर में सूर्य प्रतिमा का हास्य-भाव विशेष रूप से सराहा गया है।
  • सूर्य के अलावा सूर्य के साथी अरुण, ज्योतिष, नवग्रह, युद्ध, दरबार, मनुष्य की काम-क्रीड़ा सहित अन्य क्रियाकलाप, पशु आकृतियाँ, नृत्य एवं गायन से संबंधित मूर्तियाँ और विभिन्न हिस्सों पर राजा नरसिंह वर्मन से संबंधित 24 दृश्यों को उत्कीर्ण किया गया है।
  • लिंगराज मंदिर की मूर्तियों के अंग-प्रत्यंग का लालित्य, अलंकरण, केश-विन्यास आदि विशेष रूप से दर्शनीय हैं।
  • पांडवों का स्वर्गारोहण, प्रेम-पत्र लिखती स्त्री, माता-शिशु, श्रृंगाररत नारियाँ, काम-क्रीड़ा के दृश्य, सूर्य-गणेश-कार्तिकेय, ब्रह्मा आदि मूर्तियों को लिंगराज मंदिर में उत्कृष्टता प्राप्त है।
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