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उत्तराखंड

देश का सबसे लंबा रेस्क्यू ऑपरेशन बना सिलक्यारा

  • 29 Nov 2023
  • 5 min read

चर्चा में क्यों?

28 नवंबर, 2023 को उत्तरकाशी ज़िले के सिलक्यारा में निर्माणाधीन सुरंग में भू-धंसाव से फँसे 41 मज़दूरों को 17 दिन की कड़ी मशक्कत के बाद सफलतापूर्वक बाहर निकल लिया गया। इसके साथ ही ऑपरेशन सिलक्यारा किसी सुरंग या खदान में फँसे मज़दूरों को निकालने वाला देश का सबसे लंबा रेस्क्यू ऑपरेशन बन गया है।

प्रमुख बिंदु

  • विदित हो कि 12 नवंबर को दीपावाली के दिन उत्तरकाशी ज़िले के सिलक्यारा में निर्माणाधीन सुरंग में भू-धंसाव से 41 मज़दूर अंदर फँस गए थे। उन्हें सुरक्षित बाहर निकालने के लिये विभिन्न एजेंसियाँ जुटी थीं।
  • मिशन सिलक्यारा में बचाव कार्य में एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, बीआरओ, आरवीएनएल, एसजेवीएनएल, ओएनजीसी, आईटीबीपी, एनएचएआईडीसीएल, टीएचडीसी, उत्तराखंड राज्य शासन, ज़िला प्रशासन, थल सेना, वायुसेना, श्रमिकों की अहम भूमिका रही।
  • उल्लेखनीय है कि 17 दिन तक चला ऑपरेशन सिलक्यारा किसी सुरंग या खदान में फँसे मज़दूरों को निकालने वाला देश का सबसे लंबा रेस्क्यू ऑपरेशन बन गया है। इससे पहले भी देश में इस तरह के अभियान को अंजाम दिया जा चुका है।
  • रानीगंज कोयला खदान अभियान-
    • 13 नवंबर, 1989 को पश्चिम बंगाल के महाबीर कोल्यारी रानीगंज कोयला खदान जलमग्न हो गई थी। इसमें 65 मज़दूर फँस गए थे। इनको सुरक्षित बाहर निकालने के लिये खनन इंजीनियर जसवंत गिल के नेतृत्व में टीम बनाई गई। दो दिन के ऑपरेशन के बाद आखिरकार सभी मज़दूरों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया।
    • उस अभियान में गिल लोगों को बचाने के लिये खुद एक स्टील कैप्सूल के माध्यम से खदान के भीतर गए थे। 1991 में तत्कालीन राष्ट्रपति आर. वेंकटरमन ने उन्हें सर्वोत्तम जीवन रक्षा पदक से नवाजा था।
    • उस अभियान में मज़दूरों की संख्या सिलक्यारा से ज्यादा थी, लेकिन उन्हें निकालने में समय कम लगा था। सिलक्यारा में 13वाँ दिन बीतने के बाद मज़दूर बाहर निकाले जा सके।
  • कुछ ऐसा ही एक अभियान वर्ष 2006 में हरियाणा के कुरुक्षेत्र के हल्ढेरी गाँव में हुआ था, जहाँ एक पाँच साल का बच्चा प्रिंस बोरवेल में गिर गया था। करीब 50 घंटे की कड़ी जद्दोजहद के बाद बचाव दलों ने बच्चे को बाहर निकालने में कामयाबी पाई थी। इस अभियान में बराबर के ही अन्य बोरवेल को तीन फीट व्यास के लोहे के पाइप के माध्यम से जोड़कर बच्चे को बाहर निकाला गया था।
  • कुछ ऐसे ही अभियान विदेशों में भी हुए हैं-
    • थाई गुफा अभियान: 23 जून, 2018 को थाईलैंड की थाम लुआंग गुफा में गई वाइल्ड बोअर्स फुटबॉल टीम बारिश के कारण हुए जलभराव की वजह से भीतर फँस गई। गुफा में लगातार बढ़ रहे पानी के बीच खिलाड़ियों को खोजना बेहद चुनौतीपूर्ण काम था। करीब दो सप्ताह तक चले अभियान में 90 गोताखोर भी लगाए गए। इस बचाव अभियान में पूर्व थाईलैंड के नेवी सील समन कुनान को जान गवानी पड़ी। यह दुनिया के सबसे जटिल रेस्क्यू अभियान में से एक माना जाता है।
    • चीली खदान अभियान: 5 अगस्त, 2010 को सैन जोस सोने और तांबे की खदान के ढहने से 33 मज़दूर उसमें दब गए थे। ज़मीन के ऊपर से करीब 2000 फीट नीचे फँसे इन मज़दूरों से संपर्क करना ही मुश्किल था। 17 दिन की मेहनत के बाद सतह के नीचे एक लाइफलाइन छेद बनाकर फँसे मज़दूरों को भोजन, पानी, दवा भेजी जा सकी। 69 दिन के बाद 13 अक्तूबर को सभी मज़दूरों को एक-एक करके सुरंग से बाहर निकाला गया।
    • क्यूक्रीक माइनर्स अभियान: 24 जुलाई, 2002 को अमेरिका के पेंसिल्वेनिया के समरसेट काउंटी की क्यूक्रीक माइनिंग इंक खदान में 9 मज़दूर फँस गए। इन्हें केवल 22 इंच चौड़ी आयरन रिंग के सहारे 77 घंटे बाद बाहर निकाला जा सका था।

   

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