उत्तर प्रदेश
न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा का इस्तीफा
- 13 Apr 2026
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चर्चा में क्यों?
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने संविधान के अनुच्छेद 217(1)(a) के तहत भारत के राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा सौंप दिया है। यह घटनाक्रम एक चर्चित ‘कैश-एट-होम’ (घर पर नकदी) विवाद और संसद में औपचारिक महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होने के बाद सामने आया है।
मुख्य बिंदु:
- विवाद की पृष्ठभूमि: मार्च 2025 में, न्यायमूर्ति वर्मा के दिल्ली स्थित आवास पर लगी आग के दौरान बड़ी मात्रा में बेहिसाब नकदी का पता चला था।
- जाँच की शुरुआत: सर्वोच्च न्यायालय की एक आंतरिक समिति की प्रथम दृष्टया रिपोर्ट के बाद, 146 सांसदों ने न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम, 1968 के तहत उन्हें हटाने के लिये एक प्रस्ताव पेश किया।
- संवैधानिक और कानूनी ढाँचा: अनुच्छेद 217(1)(b) के तहत, उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को ‘सिद्ध कदाचार’ या ‘अक्षमता’ के आधार पर संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित संबोधन के बाद ही राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है।
- न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम, 1968: यह अधिनियम न्यायाधीश के कदाचार की जाँच और प्रमाणन की प्रक्रिया को विनियमित करता है।
- इस्तीफे के निहितार्थ: संसदीय मतदान से पहले इस्तीफा देने से, औपचारिक महाभियोग की प्रक्रिया प्रभावी रूप से निष्प्रभावी हो जाती है।
- सेवानिवृत्ति के बाद के लाभ: औपचारिक निष्कासन के विपरीत, स्वैच्छिक इस्तीफा आमतौर पर एक न्यायाधीश को पेंशन और सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले अन्य लाभों को बनाए रखने की अनुमति देता है।
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