झारखंड
झारखंड में ग्लोसोप्टेरिस के जीवाश्म मिले
- 23 Feb 2026
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चर्चा में क्यों?
झारखंड के उत्तरी करणपुरा बेसिन में स्थित ओपन-कास्ट कोयला खदानों से पौधों के जीवाश्मों का एक असाधारण संग्रह प्राप्त हुआ है। ये जीवाश्म उन प्राचीन पारिस्थितिक तंत्रों के विषय में नई अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं जो लगभग 290 मिलियन वर्ष पूर्व अस्तित्व में थे, जब भारत दक्षिणी महाद्वीप गोंडवानालैंड का हिस्सा था।
मुख्य बिंदु:
- जीवाश्म खोज: शोधकर्त्ताओं ने अशोक कोयला खदान की 'शेल' (Shale) परतों से ग्लोसोप्टेरिस (Glossopteris) और संबंधित पौधों की कम से कम 14 प्रजातियों के जीवाश्म बरामद किये हैं।
- इनमें पत्तियाँ, जड़ें, बीजाणु (Spores) और पराग के निशान शामिल हैं, जो एक समृद्ध प्रागैतिहासिक वनस्पति समूह का संकेत देते हैं।
- गोंडवाना वनस्पति: 'पर्मियन काल' के दौरान दक्षिणी महाद्वीपों में ग्लोसोप्टेरिस बीज वाले पौधों का एक प्रमुख समूह था।
- झारखंड में इसकी प्रचुरता उन सघन दलदली वनों और परस्पर जुड़े नदी तंत्रों को दर्शाती है जो कभी इस क्षेत्र में मौजूद थे।
- जुवेनाइल मेल कोन (नर शंकु) की खोज: इस स्थल पर एक वैश्विक स्तर पर महत्त्वपूर्ण खोज दामोदर बेसिन में ग्लोसोप्टेरिस के पहले प्रलेखित 'जुवेनाइल मेल कोन' (अविकसित नर शंकु) की है।
- समुद्री संकेत: पेट्रोग्राफिक और भू-रासायनिक विश्लेषण (जिसमें फ्रैम्बोइडल पाइराइट और उच्च सल्फर सामग्री शामिल है) लवणीय जल की स्थिति और लगभग 280–290 मिलियन वर्ष पहले बेसिन में संभावित समुद्री अतिक्रमण का सुझाव देते हैं। यह प्राचीन समुद्र के स्तर में परिवर्तनों की हमारी समझ को बढ़ाता है।
- वैज्ञानिक महत्त्व: ये निष्कर्ष 'इंटरनेशनल जर्नल ऑफ कोल जियोलॉजी' में प्रकाशित हुए हैं और प्राचीन जलवायु तथा महाद्वीपीय वातावरण के पुनर्निर्माण में योगदान देते हैं।