निबंध
जीवन को गंतव्य नहीं, एक यात्रा के रूप में देखना ही सर्वोत्तम है
- 02 Feb 2026
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“भगवद्गीता हमें यह सिखाती है कि हमारा अधिकार केवल कर्म पर है, उसके फल पर नहीं, यह स्मरण कराती है कि जीवन का वास्तविक अर्थ उस गंतव्य में नहीं, जिसे हम प्राप्त करते हैं, बल्कि उस यात्रा में निहित है, जिसे हम तय करते हैं।”
मानव जीवन सदैव एक रहस्य रहा है, जिसे समझने का प्रयास विचारकों, कवियों और दार्शनिकों ने युगों से किया है। प्राचीन सभ्यताओं से लेकर आधुनिक विश्व तक, सार्थक जीवन का स्वरूप क्या है, यह प्रश्न मानव मस्तिष्क को निरंतर मथता रहा है। इस चिंतन से उभरने वाली सबसे गहन समझ यह है कि जीवन को गंतव्य नहीं, बल्कि एक यात्रा के रूप में देखना अधिक उपयुक्त है। जीवन को यात्रा के रूप में देखने का अर्थ है- गंतव्य पर पहुँचने की अपेक्षा विकास को महत्त्व देना, परिणाम की बजाय प्रक्रिया को प्राथमिकता देना और केवल उपलब्धि के स्थान पर अनुभव को केंद्र में रखना। इसका आशय वर्तमान क्षण में पूर्ण रूप से जीना, आनंद और दुःख दोनों को एक विकासशील प्रक्रिया के अंग के रूप में स्वीकार करना तथा यह समझना है कि जीवन का सार इस बात में नहीं है कि हम अंततः कहाँ पहुँचते हैं, बल्कि इसमें निहित है कि हम इसके विविध मार्गों पर किस प्रकार आगे बढ़ते हैं।
विभिन्न संस्कृतियों और दर्शनों में जीवन को यात्रा के रूप में देखने का यह रूपक गहराई से व्याप्त है। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में जीवन को प्रायः यात्रा के रूप में वर्णित किया गया है, अर्थात एक पवित्र तीर्थयात्रा। उपनिषदों में ‘नेति नेति’, अर्थात ‘न यह, न वह’, की अवधारणा मिलती है, जो सत्य की अनंत खोज को दर्शाती है, जहाँ प्रत्येक बोध एक और गहन जिज्ञासा की ओर ले जाता है। बुद्ध ने ‘मध्यम मार्ग’ की बात की, जिसे किसी अंतिम पड़ाव के रूप में नहीं, बल्कि सजगता और सम्यक कर्म की निरंतर प्रक्रिया के रूप में समझाया गया। भगवद्गीता में भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फल में नहीं। यह कालजयी शिक्षा यात्रा-केंद्रित जीवन के सार को स्पष्ट करती है, जिसमें कर्म, निष्ठा और कठोर अपेक्षाओं से विरक्ति का महत्त्व है। आधुनिक चिंतकों ने भी इसी ज्ञान को दोहराया है। राल्फ वाल्डो एमर्सन ने लिखा कि “जीवन एक यात्रा है, कोई गंतव्य नहीं”, जबकि आर्थर ऐश ने कहा कि “सफलता एक यात्रा है, गंतव्य नहीं।” ये चिंतन, चाहे प्राचीन हों या आधुनिक, इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि वास्तविक संतोष किसी अंतिम बिंदु तक पहुँचने में नहीं, बल्कि निरंतर विकास, सीखने और आंतरिक उन्नति में निहित होता है।
इसके विपरीत, जीवन को गंतव्य के रूप में देखने का अर्थ है- उसे जीतने वाली एक दौड़ या प्राप्त किये जाने वाले किसी निश्चित लक्ष्य के रूप में समझना। ऐसी दृष्टि में व्यक्ति अपने मूल्य का आकलन ईमानदारी, सीख या प्रसन्नता की बजाय सफलता, धन, शक्ति या मान्यता जैसे परिणामों के आधार पर करता है। इस सोच का खतरा यह है कि यह चिंता, असंतोष और मानसिक थकान उत्पन्न करती है। जब लोग केवल परिणामों पर केंद्रित हो जाते हैं, तो वे उस प्रक्रिया की उपेक्षा कर बैठते हैं, जो जीवन को गहराई और अर्थ प्रदान करती है। गंतव्य-केंद्रित मानसिकता व्यक्ति को कठोर, असफलता से भयभीत और जीवन के आनंद से विमुख बना सकती है। इसके विपरीत, यात्रा-केंद्रित दृष्टिकोण खुलेपन, जिज्ञासा एवं सहनशीलता को विकसित करता है। यह हमें सृजन की प्रक्रिया का आनंद लेने, प्रगति में उद्देश्य खोजने और असफलताओं को विकास का अभिन्न अंग मानने की क्षमता प्रदान करता है।
जीवन के विभिन्न चरणों, जैसे- बाल्यावस्था, किशोरावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था पर विचार कीजिये। प्रत्येक चरण की अपनी विशिष्ट प्रसन्नताएँ और चुनौतियाँ होती हैं। बाल्यावस्था हमें निष्कलुषता और विस्मय सिखाती है, युवावस्था उत्साह एवं अन्वेषण का बोध कराती है, प्रौढ़ावस्था उत्तरदायित्व तथा संतुलन का पाठ पढ़ाती है, जबकि वृद्धावस्था चिंतन और विरक्ति की शिक्षा देती है। इनमें से कोई भी चरण अपने आप में कोई ‘गंतव्य’ नहीं है, बल्कि ये सभी एक निरंतर यात्रा के पड़ाव हैं। अतः जीवन को यात्रा के रूप में देखने का अर्थ है- समय के प्रवाह और उससे मिलने वाली शिक्षाओं का सम्मान करना। यह दृष्टिकोण हमें अतीत के प्रति अनावश्यक पछतावे और भविष्य के प्रति अत्यधिक चिंता से मुक्त होकर अधिक सजग रूप से जीवन जीने में सहायक होता है।
दार्शनिक दृष्टि से जीवन को इस प्रकार देखने के गहरे निहितार्थ हैं। पूर्वी चिंतन में, विशेष रूप से हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म में, जीवन को रैखिक नहीं, बल्कि चक्रीय माना गया है। संसार की अवधारणा, अर्थात जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म का निरंतर चक्र, इस बात की ओर संकेत करती है कि जीवन आत्मा की उच्च चेतना की ओर एक अनंत यात्रा है। इसी प्रकार, जैन धर्म में मोक्ष का मार्ग किसी एक क्षणिक मुक्ति-कर्म पर आधारित नहीं है, बल्कि सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन और सम्यक आचरण के माध्यम से आत्मशुद्धि की एक निरंतर प्रक्रिया है। पाश्चात्य परंपरा में अल्बर्ट कामू और जीन-पॉल सार्त्र जैसे विचारकों ने प्रामाणिकता के महत्त्व और जीवन की अनिश्चितता को स्वीकार करने पर बल दिया। कामू की ‘असंगतता’ की अवधारणा यह दर्शाती है कि जीवन का अर्थ हमें पूर्व-निर्धारित रूप में प्राप्त नहीं होता, बल्कि अपने चयन और निरंतर प्रयासों के माध्यम से उसका निर्माण करना पड़ता है। यह विचार इस तथ्य की पुष्टि करता है कि जीवन का उद्देश्य किसी अंतिम, पूर्व-निर्धारित बिंदु तक पहुँचने में नहीं, बल्कि स्वयं जीवन को जीने की प्रक्रिया में निहित होता है।
व्यावहारिक जीवन में यह दर्शन अनेक क्षेत्रों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उदाहरण के लिये शिक्षा को ही लीजिये। जो विद्यार्थी सीखने को एक यात्रा के रूप में देखते हैं, वे जिज्ञासा और निरंतर सुधार से आनंद प्राप्त करते हैं, जबकि केवल अंक या रैंक के प्रति आसक्त छात्र अक्सर तनाव एवं निराशा का अनुभव करते हैं। शिक्षा का वास्तविक अर्थ, जो लैटिन शब्द एडुकेयर से निकला है, स्वयं के भीतर निहित श्रेष्ठ गुणों को बाहर लाना है। यह केवल प्रमाण-पत्रों के संचय तक सीमित नहीं, बल्कि चरित्र, बौद्धिक क्षमता और मूल्यों के निर्माण की प्रक्रिया है। इसी प्रकार, व्यावसायिक जीवन में भी जो लोग अपने कॅरियर को एक निरंतर विकसित होने वाली यात्रा के रूप में देखते हैं, वे अधिक संतोष और नवाचार प्राप्त करते हैं। वे पद या धन के पीछे अंधी दौड़ में फँसने की बजाय स्वयं को अनुकूलित करते हैं, सीखते हैं एवं आगे बढ़ते हैं। इस दृष्टि में सफलता कोई स्थिर गंतव्य नहीं, बल्कि उद्देश्यपूर्ण प्रयास और अपने कार्य के प्रति समर्पण का स्वाभाविक परिणाम होती है।
इतिहास और समकालीन उदाहरण इस दर्शन के व्यावहारिक रूप को स्पष्ट रूप से प्रमाणित करते हैं। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जीवन इसका एक उज्ज्वल उदाहरण है। रामेश्वरम के एक साधारण परिवार में जन्मे कलाम ने अनेक चुनौतियों का सामना किया, किंतु उन्होंने कभी सफलता को अंतिम पड़ाव के रूप में नहीं देखा। एक छोटे कस्बे के बालक से भारत के ‘मिसाइल मैन’ और आगे चलकर राष्ट्रपति बनने तक की उनकी यात्रा विनम्रता, निरंतर सीखने एवं समर्पण से परिपूर्ण रही। उनका प्रसिद्ध कथन, “उत्कृष्टता एक सतत प्रक्रिया है, कोई दुर्घटना नहीं,” उनके जीवन-दर्शन को स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त करता है। उनके लिये वास्तविक आनंद केवल उपलब्धियों में नहीं, बल्कि प्रगति के निरंतर प्रयास में निहित था।
महात्मा गांधी का जीवन इसका एक और सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करता है। दक्षिण अफ्रीका में एक संकोची वकील से भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के नेता बनने तक की उनकी यात्रा किसी एक गंतव्य से परिभाषित नहीं थी। उनके लिये स्वतंत्रता केवल राजनीतिक आज़ादी नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक परिवर्तन का माध्यम थी। सत्य, अहिंसा और आत्मसंयम के साथ उनके प्रयोग आत्मपरिष्कार की एक निरंतर प्रक्रिया थे। इसी प्रकार, रंगभेद के विरुद्ध नेल्सन मंडेला का दीर्घ संघर्ष, जिसमें 27 वर्षों का कारावास भी शामिल था, केवल राजनीतिक पद प्राप्त करने तक सीमित नहीं था। उनका उद्देश्य सुलह, क्षमा और एक न्यायपूर्ण समाज के निर्माण की यात्रा पर केंद्रित था।
समान रूप से, यह दर्शन ग्रामीण और ज़मीनी स्तर पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। केरल की कुदुंबश्री जैसे महिला स्व-सहायता समूह या गुजरात का अमूल सहकारी आंदोलन यह दर्शाते हैं कि सशक्तीकरण की यात्राएँ (बजाय केवल तात्कालिक परिणामों पर ध्यान केंद्रित करने के) दीर्घकालिक परिवर्तन लाती हैं। ये आंदोलन धैर्य, सामुदायिक सहभागिता और सीखने की प्रक्रिया के माध्यम से विकसित हुए, यह सिद्ध करते हुए कि सार्थक प्रगति हमेशा एक प्रक्रिया होती है, किसी एक सफल कार्य तक सीमित नहीं।
सामाजिक दृष्टि से, ‘यात्रा मानसिकता’ समावेशिता और सहानुभूति को बढ़ावा देती है। जब हम समझते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी अद्वितीय यात्रा पर चलता है, तो हम कम निर्णयात्मक और अधिक सहानुभूतिशील बनते हैं। यह अस्वस्थ सामाजिक तुलना को भी कम करता है, जो सोशल मीडिया के युग में असंतोष का प्रमुख कारण है। आज की डिजिटल दुनिया लगातार सफलता के प्रतीक प्रस्तुत करती है (विलासिता, ख्याति और उपलब्धियाँ), जिससे यह भ्रम उत्पन्न होता है कि सभी अन्य लोग ‘पहुँच चुके’ हैं। यह ‘फियर ऑफ मिसिंग आउट’ (FOMO) उत्पन्न करता है और युवाओं में चिंता को बढ़ाता है। हालाँकि, जीवन को यात्रा के रूप में देखने से हमें याद रहता है कि प्रत्येक व्यक्ति की समय-रेखा अलग होती है और संतोष व्यक्तिगत विकास में निहित है, न कि दूसरों के साथ प्रतिस्पर्द्धा में।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से, यह दृष्टिकोण सजगता और सहनशीलता का विकास करता है। जब हम प्रक्रिया पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो हम वर्तमान क्षण की सराहना करना सीखते हैं। हम असफलताओं को व्यक्तिगत विफलताओं के रूप में नहीं, बल्कि सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा मानते हैं। सकारात्मक मनोविज्ञान के अध्ययन भी इस दृष्टि का समर्थन करते हैं – जो व्यक्ति आंतरिक प्रेरणा और प्रक्रिया-केंद्रित लक्ष्यों को महत्त्व देते हैं, उनके आनंद और भावनात्मक स्थिरता का स्तर अधिक होता है। जापानी दर्शन काइज़ेन (निरंतर सुधार) भी इसी विचार को प्रतिपादित करता है: प्रत्येक छोटा कदम महत्त्वपूर्ण है और पूर्णता एक अंतहीन यात्रा है।
शासन और लोक प्रशासन के क्षेत्र में, जीवन को यात्रा मानने का रूपक गहन शिक्षाएँ प्रदान करता है। नीति-निर्माण किसी एक गंतव्य को प्राप्त करने तक सीमित नहीं, बल्कि निरंतर मूल्यांकन, अनुकूलन और परिष्कार की प्रक्रिया है। जो लोक अधिकारी शासन को विकसित होने वाली प्रक्रिया के रूप में देखते हैं, वे प्रतिक्रिया, पारदर्शिता और नवाचार को महत्त्व देते हैं। उदाहरण के लिये, स्वच्छ भारत अभियान एक महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य के रूप में शुरू हुआ, जिसका उद्देश्य भारत को खुले में शौच मुक्त बनाना था, लेकिन इसकी वास्तविक सफलता निरंतर व्यवहार परिवर्तन और सामुदायिक सहभागिता पर निर्भर करती है। इसी प्रकार, डिजिटल इंडिया पहल, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ या जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं में भी निरंतर समीक्षा और नागरिक सहभागिता आवश्यक है। शासन, जीवन की तरह गतिशील होना चाहिये– यह सीखने की एक निरंतर प्रक्रिया है, न कि कोई स्थिर अंत।
यह विचार भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में भी गहरी प्रतिध्वनि पाता है। कुंभ मेला जैसे त्योहार विश्वास और आत्म-अन्वेषण की सामूहिक यात्राओं का प्रतीक हैं। चार धाम यात्रा, जो भारत के चार कोनों में की जाती है, केवल भौतिक यात्रा नहीं, बल्कि आत्मा की आंतरिक तीर्थयात्रा का प्रतिनिधित्व करती है। संतों और कवियों ने लंबे समय से इस दृष्टि का सम्मान किया है। रवींद्रनाथ ठाकुर ने लिखा है, “तितली महीनों की नहीं, बल्कि क्षणों की गिनती करती है, और उसके पास समय पर्याप्त है।” सूफी रहस्यवादी रूमी ने कहा, “यह तुम्हारा मार्ग है और केवल तुम्हारा। अन्य लोग तुम्हारे साथ चल सकते हैं, लेकिन कोई इसे तुम्हारे लिये नहीं चल सकता।” इस प्रकार की दृष्टियाँ हमें याद दिलाती हैं कि अस्तित्व का उद्देश्य किसी अंतिम बिंदु तक पहुँचना नहीं, बल्कि हर कदम में निहित दिव्यता और सुंदरता का अनुभव करना है।
हालाँकि, आधुनिक दुनिया अक्सर हमें विपरीत दिशा में खींचती है। गति, दक्षता और प्रतिस्पर्द्धा के प्रति जुनून जीवन को एक अनवरत दौड़ की तरह महसूस करा सकता है। प्रौद्योगिकी एवं वैश्वीकरण ने इस दबाव को और तीव्र कर दिया है। विशेष रूप से युवा वर्ग एक गंभीर दुविधा का सामना करता है: डिग्रियों, नौकरियों या सामाजिक मान्यता की दौड़ अक्सर आत्म-अन्वेषण के आनंद को छाया में डाल देती है। शिक्षा प्रणाली भी गंतव्यों (अंक, रैंक और नियुक्तियों) पर अधिक ज़ोर देती है, बजाय जिज्ञासा और आलोचनात्मक चिंतन के। ऐसे संदर्भ में जीवन को यात्रा के रूप में देखना केवल व्यक्तिगत विकल्प नहीं, बल्कि सामाजिक आवश्यकता भी है। यह धैर्य, रचनात्मकता और सहानुभूति को बढ़ावा देता है – ऐसे मूल्य, जो दीर्घकालिक रूप से समाज को स्थायी बनाए रखते हैं।
आलोचक यह तर्क दे सकते हैं कि बिना गंतव्यों के जीवन में दिशा का अभाव होता है। निःसंदेह, लक्ष्य आवश्यक हैं; वे संरचना और प्रेरणा प्रदान करते हैं। लेकिन लक्ष्यों को अंतिम उद्देश्य की बजाय पड़ाव के रूप में देखा जाना चाहिये। यात्रा-केंद्रित जीवन महत्त्वाकांक्षा को अस्वीकार नहीं करता; यह केवल इसके वश में होने से इनकार करता है। यह आकांक्षा को सजगता के साथ, प्रयास को स्वीकृति के साथ संतुलित करता है। विश्व के महान नवप्रवर्तक, कलाकार और नेता केवल अंतिम परिणामों से प्रेरित नहीं थे, बल्कि प्रक्रिया के प्रति उनके प्रेम से प्रेरित थे। राइट ब्रदर्स, थॉमस एडिसन और मैरी क्यूरी ने अनगिनत विफलताओं के बावजूद निरंतर प्रयास किया, न कि इसलिये कि वे किसी गंतव्य पर अडिग थे, बल्कि इसलिये कि वे खोज की यात्रा में स्वयं मोहित थे।
इसके अतिरिक्त, यात्रा-केंद्रित दृष्टिकोण नैतिक जीवन को भी बढ़ावा देता है। जब लोग यह ध्यान देते हैं कि वे कैसे जीवन जीते हैं, बजाय केवल यह कि उन्होंने क्या प्राप्त किया, तो वे नैतिक रूप से सही निर्णय लेने की अधिक संभावना रखते हैं। प्रक्रिया का महत्त्व परिणाम के समान हो जाता है। यह सार्वजनिक जीवन में विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, जहाँ त्वरित परिणाम पाने की इच्छा नैतिक समझौतों की ओर ले जा सकती है। एक ऐसा लोकसेवक या राजनेता, जो प्रक्रिया को महत्त्व देता है (पारदर्शिता, सहभागिता एवं सहानुभूति), वह केवल तात्कालिक मान्यता पाने वाले व्यक्ति की तुलना में राष्ट्र की प्रगति में अधिक सार्थक योगदान देता है।
एक व्यापक दार्शनिक दृष्टि से, जीवन को यात्रा के रूप में देखना स्वयं ब्रह्मांड का प्रतिबिंब भी है। प्रकृति की हर चीज़ चक्रों में चलती है – बदलते मौसम, जल चक्र, ग्रहों की परिक्रमा और घूर्णन। इस ब्रह्मांडीय नृत्य में कोई स्थिर ‘गंतव्य’ नहीं है; सब कुछ गति में, प्रक्रिया में और परिवर्तन में है। जब मनुष्य स्वयं को इस लय के साथ संरेखित करते हैं, तो वे अधिक सामंजस्यपूर्ण और उद्देश्यपूर्ण जीवन जीते हैं। जीवन तब केवल पूर्ण करने वाली सूची नहीं, बल्कि अनुभव करने वाली एक मधुर रागिनी बन जाता है।
अंततः जीवन को यात्रा के रूप में देखने का दर्शन मुक्ति का है। यह हमें नियंत्रण की चिंता और स्थायित्व की भ्रांति से मुक्त करता है। यह हमें विनम्रता सिखाता है– कि कोई भी उपलब्धि अंतिम नहीं है और कोई भी असफलता घातक नहीं। यह कृतज्ञता को गहरा करता है– हर क्षण, हर संबंध और विकास के प्रत्येक अवसर के लिये। यह हमें अनिवार्य घटनाओं (वृद्धावस्था, हानि और मृत्यु) का सामना गरिमा के साथ करने के लिये भी तैयार करता है। इस दृष्टिकोण में मृत्यु स्वयं अंत नहीं, बल्कि संक्रमण है, आत्मा की अनंत यात्रा का एक और कदम है।
इस जागरूकता के साथ जीवन जीना ही बुद्धिमानी से जीवन जीने के समान है। चाहे वह छात्र हो जो उत्कृष्टता के लिये प्रयासरत है, वह लोकसेवक जो राष्ट्र की सेवा कर रहा है, वह कलाकार जो सौंदर्य रच रहा है, या साधारण व्यक्ति जो दैनिक संघर्षों को पार कर रहा है, संदेश समान रहता है: जीवन का अर्थ केवल अंतिम बिंदु में नहीं, बल्कि पथ में निहित है। सबसे महत्त्वपूर्ण यह नहीं कि हम कितनी जल्दी पहुँचते हैं, बल्कि यह है कि हम कितनी निष्ठा और ईमानदारी के साथ चलते हैं। अतः जीवन को सबसे अच्छा उस साधना के रूप में जीना है – यह खोज, सहानुभूति और निरंतर विकास की एक सतत यात्रा है।
गंतव्य केवल अस्थायी विश्राम स्थल हैं; यात्रा अनंत है। प्रत्येक सफलता के बाद नई चुनौती आती हैं, प्रत्येक संतोष के बाद नई इच्छाएँ जन्म लेती हैं। जीवन को यात्रा के रूप में देखना इस अस्थायित्व को साहस और आनंद के साथ स्वीकार करना है। इसका अर्थ है- प्रत्येक क्षण की अभिव्यक्ति को स्वीकार करना, प्रत्येक मोड़ से सीख लेना और आशा के साथ आगे बढ़ना। जैसा कि टी.एस. एलियट ने लिखा है, “हम अन्वेषण करना बंद नहीं करेंगे और हमारे सभी अन्वेषणों का अंत उस स्थान पर पहुँचने में होगा, जहाँ से हमने शुरू किया तथा उस स्थान को पहली बार जानेंगे।” अतः सबसे बड़ी बुद्धिमत्ता यह है कि हम पथ पर जागरूकता, कृतज्ञता और प्रेम के साथ चलें, क्योंकि इसी यात्रा में हमें हमारा वास्तविक गंतव्य मिलता है।