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क्या खत्म होगा स्वयंशंभू धर्मगुरुओं के प्रति भारतीयों का ज़ुनून?

  • 13 Oct 2017
  • 10 min read

संदर्भ

  • हाल ही में तथाकथित धर्मगुरुओं के आश्रमों के अन्दर से डराने वाली सच्चाई सामने आई है। सामने आने वाली सच्चाईयाँ केवल आज की ‘सच्चाई’ नहीं है, बल्कि 1862 के ‘जदुनाथजी ब्रजरत्नाजी’ मामले से लेकर चंद्रास्वामी और धीरेंद्र ब्रह्मचारी से होते हुए आज के डेरा सच्चा सौदा और आसाराम बापू तक की अंतहीन कहानी है।
  • वहीं एक सच्चाई यह भी है कि बुद्ध और महावीर जैसे धर्मगुरुओं ने मानव जीवन को अध्यात्म और कल्याण से जोड़ा है। ऐसे में यह बहस भी अंतहीन है कि भारतीयों का धर्म और धर्मगुरुओं के प्रति देखे जाने वाला ज़ुनून केवल नकारात्मक प्रभावों वाला ही है। आज वाद-प्रतिवाद-संवाद के माध्यम से इस अंतहीन बहस के जाल से निकलने प्रयास करेंगे।

वाद

  • धर्मगुरुओं का विवादों से भले ही पुराना नाता हो लेकिन हालिया घटनाक्रम भयाक्रांत इसलिये करते हैं कि इनके ये आश्रम हत्या, हिंसा और दुष्कर्म के अड्डे बन गए हैं।
  • राजनीतिक शक्ति और धार्मिक प्रतिष्ठानों के बीच गठजोड़ हुआ और इस गठजोड़ का ही नतीज़ा है कि राज्य वर्षों तक उनके कृत्यों के प्रति आँख बंद कर पड़े रहे।
  • इन विवादित धर्मगुरुओं के प्रति अनुयायियों का निराधार विश्वास इनकी मुख्य पूंजी है। कुछ धर्मगुरु इतने शक्तिशाली हैं कि वे जबरन लोगों का शोषण करते हैं, जबकि कुछ ने अपने अनुयायियों को इस तरह से सम्मोहित कर रखा है कि वे सहमति से शोषण के शिकार बन जाते हैं।
  • समकालीन भारत वैज्ञानिक प्रतिष्ठानों, हाई-स्पीड ट्रेनों और विशाल राजमार्गों के साथ एक आधुनिक देश जैसा दिखना चाहिये, लेकिन जातिगत भेदभाव, धार्मिक अंधकारवाद, लिंग असमानता और अंधविश्वासों की मौज़ूदगी के कारण भारत एक मध्ययुगीन देश नज़र आता है।
  • असमंजसता और अस्पष्टता के साथ आधुनिकीकरण का सह-अस्तित्व, स्वतंत्र भारत की एक पहचान रहा है। सत्ता में बैठे लोगों को लगा कि इस बाधा को पार करने के लिये आर्थिक विकास आवश्यक है, लेकिन आर्थिक विकास समावेशी नहीं रहा है।
  • आर्थिक विकास का अभिजात वर्गीय चरित्र, बहुसंख्यक जनता की ज़रूरतों से मेल नहीं खाता। ऐसे में यह कोई आश्चर्य की बात है कि जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा एक झूठी दुनिया में जीना शुरू कर देता है और उन्हें इस दुनिया के सपने इन्हीं धर्मगुरुओं द्वारा दिखाया जाता है।
  • स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद एक ऐसा मध्यम वर्गीय समूह सामने आया जो अपनी खो चुकी सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान को बचाए रखने के लिये संघर्ष कर रहा था। धर्मगुरुओं द्वारा इस समूह को भी अपने प्रभाव में ले लिया गया।
  • उन्हें मुक्ति का मार्ग बताया गया और धर्मगुरुओं के माध्यम से शांति और उद्धार का वादा किया जाता है। इन तथाकथिक धर्मगुरुओं का उद्देश्य सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक शक्ति हासिल करना है।
  • हाल के दिनों में सरकारों और कॉर्पोरेट बोर्ड की बैठकों, शैक्षिक संस्थानों और अन्य सभी महत्त्वपूर्ण जगहों पर इनकी संख्या बढ़ती जा रही है। ये आध्यात्मिक पुरुष नहीं हैं, बल्कि एक चालाक महत्त्वाकांक्षी कलाकार हैं, जो ईश्वर के नाम पर धोखे और झूठ को बढ़ावा देते हैं।
  • निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि ये तथाकथित धर्मगुरुओं के प्रति लोगों का ज़ुनून तब तक नहीं ख़त्म होगा, जब तक कि लोगों की सामाजिक चेतना में गुणात्मक परिवर्तन नहीं आता।

प्रतिवाद

obsession

  • उस संस्कृति में जहाँ पुरुषों, महिलाओं, पशुओं, पक्षियों, नदियों, पहाड़ों यहाँ तक कि ब्रह्मांड का कण-कण का अपना एक अस्तित्व और सम्मान है, वहाँ धर्मगुरुओं को विशेष महत्त्व देना अपने आप में एक विवादित विषय है। भारत, चीन, जापान और एशिया के अन्य हिस्सों की संस्कृतियाँ हिन्दूइज़्म, जैनिज़्म और बौद्धिज़्म से करीब 2 हज़ार वर्षों से प्रेरित हैं और होती आ रही हैं।
  • भारत में आध्यात्मिक मनन-चिंतन की ऐतिहासिक परंपरा रही है। गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी, आदि शंकराचार्य, गुरु नानक, कबीर, सूरदास, तुलसीदास और मीराबाई ने आध्यात्म और दर्शन के क्षेत्र में करिश्माई सफलता हासिल की। लगभग सभी ने दार्शनिक विचारों को पुनर्जीवित किया, जो उनके समकालीन समाजों में अपनी प्रासंगिकता को खो रहे थे।
  • बुद्ध की मृत्यु का बाद बौधिज़्म उन्हीं विकारों का शिकार हो गया जिनका कि विरोध कर उसने प्रतिष्ठा पाई थी। महावीर की मृत्यु के बाद जैन संप्रदाय दो भागों में बँट गया। सच कहें तो जितनी पुरानी भारत की आध्यात्मिक विरासत रही है विवाद भी उतने ही पुराने रहे हैं। तमाम विवादों के बावज़ूद आध्यात्मिक गुरुओं के योगदान को कम करके नहीं आँका जा सकता है।
  • बाबा रामदेव और श्री श्री रविशंकर जैसे हमारे कुछ समकालीन आध्यात्मिक गुरुओं  के खिलाफ तमाम आरोप लगाए जाने के बावज़ूद हम उस योग और प्राणायाम की अनदेखी नहीं कर सकते हैं, जिसे इन दो गुरुओं द्वारा भारत में पुनर्जीवित और लोकप्रिय बनाया गया है।
  • योगानंद, ओशो, प्रभुपाद, महेश योगी, नीम करेली बाबा और कई बौद्ध भिक्षुओं ने देश-विदेश के हज़ारों लोगों के जीवन में अहम् बदलाव ला दिया है जो अब योग, व्यायाम, उपवास और अभ्यास कर रहे हैं।
  • हमारी दुनिया में आज जब क्रोध, लालच, झूठा अभिमान, स्वार्थ, अहंकार तथा अन्य सभी भौतिक विचार हम मनुष्यों पर हावी हो रहे हैं तो हमें यह याद रखना चाहिये कि सभी आध्यात्मिक गुरु 100% विवाद रहित नहीं हो सकते।

संवाद

Philosphy

  • इसमें कोई शक नहीं है कि भारत में अध्यात्म और दर्शन की गौरवशाली परंपरा रही है और इसमें धर्मगुरुओं की महत्ती भूमिका रही है।
  • लेकिन, आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्यों किसी धर्मगुरु के अपराधी साबित होने के बाद भी अनुयायियों का मोहभंग नहीं होता। क्यों आज मंदिरों एवं गुरुद्वारों के बजाय लोगों की श्रद्धा डेरा, मठों एवं आश्रमों में बढ़ती जा रही है।
  • रोज़मर्रा की जिंदगी की समस्याओं का त्वरित-निराकरण करने की जल्दबाजी में लोग धर्मगुरुओं की शरण में जाते हैं?
  • चूँकि अधिकांश अनुयायी हाशिये पर ठेल दिये गए समूह से संबंध रखते हैं, ऐसे में धर्मगुरुओं की शरण में उन्हें एकता और समानता का एहसास होता है। यही कारण है कि जब उनके धार्मिक नेता को अपराधी ठहराया जाता है तो उन्हें खुद की सामाजिक सुरक्षा छिनने का डर बन जाता है।
  • इन विवादित धर्मगुरुओं के फलने-फूलने का एक बड़ा कारण यह है कि इन्हें राजनीतिक सरंक्षण प्राप्त है। जिस धर्मगुरु के अनुयायियों की संख्या जितनी ही अधिक होती है वह उतना ही शक्तिशाली माना जाता है, क्योंकि वह एक बड़े वोट बैंक का ज़रिया बन जाता है।

निष्कर्ष

  • तमाम समस्याओं के बीच सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि क्या भारतीयों का धार्मिक ज़ुनून कम या खत्म होगा? ऐसा होने की संभावना अवश्य है।
  • आधुनिकीकरण के उप-उत्पाद के रूप में तर्कसंगत मूल्य गाँवों और छोटे कस्बों तक पहुँचेंगे तो बदलाव अवश्य दिखेगा, क्योंकि यही वे स्थान हैं जहाँ से तथाकथित धर्मगुरुओं के अधिकांश अनुयायी निकलते हैं।
  • मीडिया और बुद्धिजीवियों को आगे आकर ऐसे लोगों को एक सिरे से नकारना चाहिये और जनता को भी समझना चाहिये कि सांसारिक सुखों में डूबा हुआ व्यक्ति उन्हें कभी ‘मोक्ष’ नहीं दिला सकता।
  • भारत विश्व-गुरु तभी बनेगा जब आज के धर्मगुरु फिर से शंकराचार्य, बुद्ध, नानक और कबीर जैसा आचरण और व्यक्तित्व रखेंगे, जिन्होंने समाज में फैले अज्ञान के अंधेरे को अपने ज्ञान और शिक्षा से प्रकाशित किया था।
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