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अंतर्राष्ट्रीय संबंध

सिंगापुर अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता संधि

  • 12 Oct 2020
  • 13 min read

संदर्भ:

हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कॉर्पोरेट विवादों के समाधान हेतु सिंगापुर अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता संधि को लागू कर दिया गया है। यह संधि हस्ताक्षरकर्ता देशों के बीच आपसी व्यावसायिक और बड़े कॉरपोरेट विवादों को निपटाने में मध्यस्थता का प्रभावी ढाँचा उपलब्ध कराएगी। 1 सितंबर, 2020 तक इस संधि पर विश्व के 53 देशों द्वारा हस्ताक्षर किये जा चुके थे, जिनमें भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन भी शामिल हैं।

  

प्रमुख बिंदु:

  • इसे सिंगापुर कन्वेंशन ऑन मिडिएशन (Singapore Convention on Mediation) या ‘अंतर्राष्ट्रीय समाधान समझौतों पर संयुक्त राष्ट्र संधि’ (United Nations Convention on International Settlement Agreements Resulting from Mediation- UNISA) के नाम से भी जाना जाता है।
  • इसका उद्देश्य ऐसे वैश्विक ढाँचे की स्थापना करना है जिससे व्यवसायों को अदालत में जाने के बजाय मध्यस्थता के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय विवादों को निपटाने का निपटारा किया जा सके।
  • गौरतलब है कि दिसंबर 2020 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में अंतर्राष्ट्रीय समाधान समझौतों पर संयुक्त राष्ट्र संधि को अपनाया गया था।
  • इस संधि को 7 अगस्त, 2019 को सिंगापुर में हस्ताक्षर के लिये अधिकृत किया गया और इसे 12 सितंबर, 2020 को लागू कर दिया गया है। ।

पृष्ठभूमि:

  • हाल के वर्षों में कॉरपोरेट विवाद के मामलों में मध्यस्थता को बढ़ावा देने में सिंगापुर ने अग्रणी भूमिका निभाई है।
  • वर्ष 2017 में सिंगापुर द्वारा मध्यस्थता पर एक अधिनियम पारित किया गया था। साथ ही सिंगापुर द्वारा मध्यस्थता पर एक सेंटर की स्थापना और अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता पर एक संस्थान की स्थापना की गई है।
  • संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय व्यापार कानून आयोग (United Nations Commission on International Trade Law- UNCITRAL) द्वारा वर्ष 1986 में अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता पर एक मॉडल कानून जारी किया गया और विश्व के सभी देशों से इसपर विचार करने तथा इसके आधार पर स्वयं के मध्यस्थता कानूनों को लागू करने के लिये प्रोत्साहित किया गया।
  • भारत में लागू ‘मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996’ भी UNCITRAL के मॉडल कानून पर ही आधारित है।
  • वर्ष 1980 में UNCITRAL द्वारा सुलह नियमों पर भी एक मॉडल जारी किया गया था, इसे भी भारत द्वारा अपनाया गया है, यह मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 के भाग-3 के तहत शामिल किया गया है।

अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता संधि की आवश्यकता क्यों?

  • वर्तमान में वैश्वीकरण के दौर में किसी देश या निजी कंपनी के लिये अन्य देशों में किये गए निवेश या समझौते में किसी विवाद का समाधान एक बड़ी चुनौती है।
  • किसी अंतर्राष्ट्रीय संधि के अभाव में यदि मध्यस्थता का मामलों में किसी पक्ष द्वारा समझौते का उल्लंघन किया जाता है तो अदालती अथवा सुलह की प्रक्रिया को पुनः शुरू करना पड़ सकता है।
  • इस संधि के तहत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किन्हीं दो पक्षों (ऐसे देशों से जो इस संधि का हिस्सा हैं) के बीच सुलह की पुष्टि होने पर उसे एक न्यायिक फैसले के तरह ही लागू किया जाएगा
  • वर्तमान में वैश्वीकरण के दौर में अंतर्राष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला और अर्थव्यवस्था के सतत् विकास (Sustainable Development) हेतु देशों के के बीच व्यापार तथा अन्य साझेदारियों में पारदर्शिता का होना बहुत ही आवश्यक है।
  • कॉरपोरेट विवादों में न्यायिक अथवा पंचाट के फैसलों से दो पक्षों के बीच तनाव/द्वेष बढ़ जाता है जिसका सीधा प्रभाव भविष्य की व्यापारिक साझेदारियों या समझौतों पर पड़ता है, जबकि मध्यस्थता में दोनों पक्षों में आपसी सहमति से ऐसी स्थिति से बचा जा सकता है।

पूर्व के कानून:

  • भारत द्वारा इससे पहले कन्वेंशन ऑन रिकॉग्निशन एंड एनफोर्समेंट ऑफ फॉरेन आर्बिट्रल अवार्ड्स (न्यूयॉर्क, 1958) या न्यूयॉर्क कन्वेंशन (New York Convention) पर हस्ताक्षर किये गए थे।
  • वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative Dispute Resolution-ADR) के प्रयासों को बढ़ावा देने के लिये 1 अगस्त, 2020 को लोकसभा से मध्यस्थता और सुलह (संशोधन) विधेयक, 2019 को मंज़ूरी दी गई थी।
  • इस विधेयक के तहत मध्यस्थता, सुलह और अन्य वैकल्पिक विवाद निवारण तंत्रों को बढ़ावा देने के लिये भारतीय मध्यस्थता परिषद (Arbitration Council of India- ACI) नामक एक स्वतंत्र निकाय की स्थापना का प्रस्ताव किया गया।
  • इसके साथ ही केंद्र सरकार द्वारा ऑनलाइन विवाद समाधान’ (Online Dispute Resolution- ODR) को बढ़ावा देने के लिये कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं।

अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता संधि के लाभ:

  • इस संधि के माध्यम से वैश्विक स्तर पर संधि हस्ताक्षरकर्ता देशों के बीच कॉरपोरेट विवादों को निपटाने हेतु मध्यस्थता हेतु एक प्रभावी ढाँचा उपलब्ध होगा।
  • इस संधि के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर न्यायिक प्रक्रिया की जटिलता से बचते हुए आपसी सहमति से कॉरपोरेट विवादों को निपटाने में सहायता प्राप्त होगी।
  • संधि के लागू होने से विदेशी निवेशकों में वैकल्पिक विवाद समाधान की अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली के संदर्भ में भारत की प्रतिबद्धता के प्रति विश्वास बढ़ेगा, जिससे देश में विभिन्न क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (Foreign Direct Investment- FDI) में वृद्धि देखने को मिलेगी।
  • वर्तमान में जब विश्वभर में एक बार पुनः नि-वैश्विकरण की भावना में वृद्धि देखने को मिली है और कई महत्त्वपूर्ण बहुपक्षीय मंचों (जैसे- विश्व स्वास्थ्य संगठन या विश्व व्यापार संगठन आदि) की भूमिका पर प्रश्न भी उठे हैं, ऐसे समय में इस संधि के माध्यम से वैश्विक बहुपक्षीय प्रणाली को एक बार पुनः स्थापित करने में भी सहायता प्राप्त होगी।
  • मध्यस्थता के माध्यम से विवादों के समाधान से सतत विकास हेतु शांतिपूर्ण और समावेशी समाज की स्थापना के प्रयासों को बढ़ावा मिलेगा।

ऑप्ट आउट या ऑप्ट इन का प्रावधान:

  • ऑप्ट आउट: इस संधि के तहत कोई भी देश इस संधि को लागू करने से पहले इसकी कुछ शर्तों को हटा सकता हैं। जैसे- कोई भी देश कह सकता है कि इस संधि के तहत अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक मध्यस्थता में निजी क्षेत्र के मामलों को शामिल किया जाएगा जबकि सरकार से संबंधित मामलों को नहीं। अर्थात दो निजी कंपनियों के बीच विवाद में यह समझौता लागू होगा जबकि भारत सरकार और किसी दूसरे देश की कंपनी के विवाद में नहीं।
  • ऑप्ट इन: इसी प्रकार किन्हीं दो देशों की कंपनियों के बीच समझौते के दौरान भविष्य में किसी विवाद की स्थिति में मध्यस्थता के लिये इस संधि को शामिल किया जा सकता है।

संधि के प्रावधानों में हस्तक्षेप:

  • यदि किसी संधि में दिये गए प्रावधान किसी देश की लोक-नीति के विरुद्ध हो तो देश का न्यायालय ऐसे मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है।
  • इसके साथ ही ऐसे मामले जहाँ मध्यस्थ की भूमिका पर प्रश्न उठाया जाता है या समझौते में उसके हितों के शामिल होने की बात सामने आती है, तो इसके फैसले को चुनौती दी जा सकती है।

COVID-19 और अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता संधि:

  • वर्तमान में COVID-19 महामारी के कारण वैश्विक स्तर पर अर्थव्यवस्था में गिरावट के दौरान इस प्रकार की संधि पर देशों की सहमति वैश्विक अर्थव्यवस्था को पुन गति प्रदान करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।
  • इसके तहत आपसी सामंजस्य और सरलीकृत प्रवर्तन ढाँचे के माध्यम से विवादों का समाधान संभव होगा जिससे धन तथा समय की बचत होगी, जो वर्तमान में COVID-19 के कारण उत्पन्न हुई अनिश्चितता के बीच व्यवसायों के लिये बहुत ही आवश्यक है।
  • पिछले कुछ वर्षों में भारत द्वारा ‘ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस’ (Ease of Doing Business) में सुधार पर विशेष ध्यान दिया गया है, ऐसे में इस संधि को अपनाने से भारतीय न्याय प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ेगी जिससे सरकार और औद्योगिक क्षेत्र दोनों को लाभ होगा।

चुनौतियाँ:

  • कंपनियों के बीच विवाद बढ़ने की स्थिति में अदालती कार्रवाई को पहले विकल्प के रूप में देखा जाता है, जिसका निवेश और अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव देखने को मिलता है।
  • विश्व के अलग-अलग देशों के न्यायिक व्यवस्था में भारी अंतर है इसके साथ ही विश्व के कई देशों में मध्यस्थता को मान्यता नहीं दी जाती, ऐसे में यह संधि कुछ ही देशों के बीच पूर्ण रूप से लागू हो सकेगी।
  • अंतर्राष्ट्रीय फैसलों या मध्यस्थता के मामलों में भारतीय न्यायालयों का हस्तक्षेप इस दिशा में एक बड़ी चुनौती है।
  • विश्व बैंक (World Bank) द्वारा जारी डूइंग बिज़नेस-2020 (Doing Business 2020) अध्ययन के अनुसार, किसी अनुबंध को लागू करने भारत का प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं रहा है (विश्व में 163वाँ स्थान) साथ ही भारत के स्थानीय प्राथमिक न्यायालयों में किसी कंपनी को वाणिज्यिक विवाद सुलझाने में 1,445 दिन का समय लग जाता है।

आगे की राह:

  • भारत सरकार द्वारा कंपनियों को कॉरपोरेट विवाद के मामलों में मध्यस्थता के विकल्प को अपनाने के लिये प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।
  • वर्तमान में इस संधि में शामिल अधिकांश देश विकासशील देशों की श्रेणी के हैं ऐसे में अन्य बड़ी अर्थव्यवस्था वाले विकसित देशों (जैसे- यूनाइटेड किंगडम, जापान, यूरोपीय संघ आदि) के शामिल होने से इस संधि को अधिक बल मिलेगा और इसका महत्त्व भी बढ़ेगा।

अभ्यास प्रश्न: सिंगापुर अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता संधि से आप क्या समझते हैं? COVID-19 महामारी के बाद वैश्विक व्यापार को पुनः गति प्रदान करने में इसकी भूमिका की समीक्षा कीजिये।

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