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भारतीय अर्थव्यवस्था

सार्वजनिक व्यय परिषद

  • 14 Sep 2019
  • 7 min read

भारतीय अर्थव्यवस्था अवमंदन का सामना कर रही है, ऐसे में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद का विचार है कि सरकार को सार्वजानिक व्यय के क्षेत्र में जीएसटी परिषद जैसी संस्था बनाने की आवश्यकता है जो सार्वजनिक क्षेत्र के लिये व्यय की रणनीति बनाएगी।

अप्रत्यक्ष करों के संदर्भ में जीएसटी परिषद की सफलता को देखते हुए आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष ने कहा कि सार्वजनिक व्यय की दक्षता बढ़ाने हेतु निर्णय लेने वाली निकाय का होना आवश्यक है, जो व्यय पर नज़र बनाए रखे। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि राजकोषीय समेकन के कारण सार्वजनिक व्यय पर लाभ सीमित होता है, लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा सार्वजनिक व्यय हेतु अगर रणनीतियाँ पहले से तय हों एवं उनपर केंद्रित हो तो प्रभावी लाभ प्राप्त किया जा सकता है।

‘सार्वजनिक व्यय परिषद’ (Public Spending Council) के गठन की आवश्यकता क्यों?

  • केंद्रीय क्षेत्र की योजनाओं और केंद्र प्रायोजित योजनाओं के तहत केंद्र द्वारा राज्यों को धन वितरित करने के तरीके पर राज्यों में असंतोष है।
    • अंतिम यानी 12वीं पंचवर्षीय योजना (वर्ष 2012-17) समाप्त होने के पश्चात् भारत में योजनागत और गैर-योजनागत व्यय के बीच अंतर समाप्त हो गया है। फिलहल देश में 300 केन्द्रीय क्षेत्र की योजनाएँ और 30 केंद्र प्रायोजित योजनाएँ हैं।

वर्तमान में वित्त मंत्रालय के तहत कार्यरत व्यय वित्त समिति यह तय करती है कि किन राज्यों को कितना धन मिलेगा और किस तरीके से मिलेगा और राज्य आवंटन के इस दृष्टिकोण से संतुष्ट नहीं हैं।

  • जनवरी 2015 तक धन आवंटन के लिये राज्यों के हितों का प्रतिनिधित्व योजना आयोग ही करता था।
    • राज्यों के साथ विचार-विमर्श करने के बाद आयोगवित्त मंत्रालय के साथ वार्ता करता था कि वास्तव में राज्यों को कितना धन आवंटित किया जाना चाहिये।
    • वर्ष 2015 के बाद से उपर्युक्त धन के आवंटन हेतु वित्त मंत्रालय पूरी तरह से ज़िम्मेदार है। नीति आयोग अब तक योजना आयोग को पूरी तरह प्रतिस्थापित करने में सक्षम नहीं हुआ है।

परिषद के गठन के खिलाफ तर्क

  • ऐसा संभव है कि सार्वजनिक व्यय परिषद सरकार द्वारा किये गए सार्वजनिक व्यय पर नज़र रखे ज़रूरी नहीं है कि सार्वजनिक व्यय सूची में शामिल सभी विषय समवर्ती सूची में ही हो और ऐसे में राज्य अपनी संप्रभुता को केंद्र पर छोड़ना नहीं चाहेंगे।
  • जीएसटी परिषद के गठन में लगभग 15 साल लग गए। सार्वजनिक व्यय परिषद के गठन में और भी अधिक समय लग सकता है।

सार्वजनिक व्यय परिषद को कैसे प्रभावी बनाया जा सकता है?

  • जीएसटी परिषद वास्तव में एक संघीय निकाय है जहां केंद्र और राज्यों दोनों को उचित प्रतिनिधित्व मिलता है। इसमें ज्यादातर निर्णय आम सहमति से लिये जाते हैं। सार्वजनिक व्यय परिषद से भी यही अपेक्षा की जाएगी। अत: परिषद में एक समान मतदान तंत्र होना चाहिये।
    • परिषद एक सुचारु और अधिक कुशल व्यय तंत्र की सुविधा प्रदान कर सकती है।
    • व्यय परिषद को केवल राष्ट्रीय प्राथमिकताओं वाले विषय, जैसे- शिक्षा, कृषि आदि पर होने वाले व्यय के लिये लागू किया जाना चाहिये।
  • व्यय में दक्षता सुनिश्चित करने के लिये, वित्त मंत्री को परिषद का अध्यक्ष और विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों को सदस्य बनाया जाना चाहिये।
  • एक निश्चित समयांतराल में, जो न बहुत अधिक हो न बहुत कम, परिषद् की बैठक होनी चाहिये जिसमें संसाधनों के आवंटन के बारे में चर्चा सा जा सके।
  • विभिन्न राज्यों में संसाधनों की आवश्यकताएँ भिन्न-भिन्न है। यदि परिषद् का गठन होता है तो इसे राजकोषीय घाटे की तुलना में संसाधनों के कुशल आवंटन पर ध्यान केंद्रित करना चाहिये। संसाधनों का आवंटन करते समय सार्वजनिक व्यय परिषद को प्रत्येक राज्य की वास्तविक स्थितियों को ध्यान में रखना चाहिये।

अन्य विकल्प

  • नीति आयोग या केंद्र-राज्य व्यय आयोग जैसी संस्था, निर्देश दे सकती है और व्यय के संबंध में प्राथमिकताएँ निर्धारित कर सकती है।
  • ऐसी द्वि-स्तरीय प्रणाली उपयोगी हो सकती है, जिसमें वित्त मंत्रालय और नीति आयोग को एक साथ, विभिन्न राज्यों की प्राथमिकताओं को समझकर व्यय में सुधार के लिये मुख्यमंत्रियों या राज्य के वित्त मंत्रियों के साथ आम सहमति बनानी होगी।
    • अन्य स्तर पर ऐसा मंत्रालयवार हो सकता है, जिसमें एक विशिष्ट मंत्रालय राज्यों के साथ, योजनाओं पर विस्तार से चर्चा कर सकता है।

आगे की राह:

  • इस मामले में सरकार आरबीआई की मदद ले सकती है या पर्याप्त संसाधन न होने की स्थिति में सहायता भी ले सकती है।
  • सार्वजनिक व्यय की दक्षता पर निर्णय में तेजी लाने और सुधार करने की आवश्यकता है।
  • सार्वजनिक व्यय को विकेंद्रीकृत करने से इसके सही उपयोग की संभावना बढ़ जाएगी।

अभ्यास प्रश्न: सार्वजनिक व्यय परिषद के गठन की प्रासंगिकता पर विचार कीजिये साथ ही इसके गठन में आने वाली चुनौतियों पर चर्चा कीजिये।

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