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सरोकार: इंसाफ की घड़ी (Justice Clock)

  • 04 Apr 2018
  • 30 min read

संदर्भ एवं पृष्ठभूमि
"तारीख पे तारीख! तारीख पे तारीख!! तारीख पे तारीख!!!"...हिंदी फिल्मों के सर्वकालिक प्रसिद्ध संवादों में से एक है फिल्म 'दामिनी' का यह संवाद; और यह भारत की न्याय व्यवस्था का सच बताने के लिये पर्याप्त है। 

भारतीय न्याय व्यवस्था 
भारत की न्याय प्रणाली विश्व की सबसे पुरानी प्रणालियों में से एक है, जो अंग्रेजों ने औपनिवेशिक शासन के दौरान बनाई थी। देश में कई स्तर की अदालतें मिलकर न्यायपालिका बनाती हैं। भारत की शीर्ष अदालत नई दिल्ली स्थित सर्वोच्च न्यायालय है और उसके तहत विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालय हैं। उच्च न्यायालयों के मातहत ज़िला अदालतें और उनकी अधीनस्थ अदालतें हैं, जिन्हें निचली अदालत कहा जाता है। इसके अलावा ट्रिब्यूनल, फास्ट ट्रैक कोर्ट, लोक अदालतें आदि मिलकर न्यायपालिका की रचना करते हैं।

भारत में संविधान निर्माताओं ने शासन के तीनों अंगों--विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका को एक समान शक्तियाँ दी हैं। एक समान शक्तियाँ प्राप्त होने के बावज़ूद न्यायपालिका (सर्वोच्च न्यायालय) को ही संविधान का संरक्षक  कहा गया है।

(टीम दृष्टि इनपुट)

‘इंसाफ की घड़ी’ (Justice Clock)

  • भारत सरकार न्याय प्रकिया को बेहतर बनाने के लिये प्रयासरत है क्योंकि देश के सभी उच्च न्यायालयों में 2016 के अंत तक लगभग 7 लाख से अधिक मुकदमे लंबित थे। 
  • भारत सरकार द्वारा 2016 में दिये गए आँकड़ों के अनुसार देश में 24 उच्च न्यायालयों एवं निचली अदालतों में तीन करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं।
  • इसके मद्देनज़र अदालती कामकाज में तेज़ी लाने के लिये सरकार देश के सभी 24 उच्च न्यायालयों में ‘इंसाफ की घड़ी’ (Justice Clock) लगाने की योजना पर काम कर रही है। 

जस्टिस क्लॉक तैयार करने के तीन प्रमुख उद्देश्य 
   1. ज़िला अदालतों से लेकर उच्च न्यायालय तक को आपस में जोड़ना।
   2. अदालतों में लंबित मामले और इनके निपटारे की रफ्तार पर लगातार नज़र रखना।
   3. यह पता लगाना कि अदालतें किस गति से काम कर रही हैं।

क्या है जस्टिस क्लॉक?

  • यह एक डिजिटल बोर्ड है, जिसमें ‘जस्टिस क्लॉक’ नाम का एक सॉफ्टवेयर लगा होगा, जिसे केंद्रीय विधि और न्याय मंत्रालय ने तैयार करवाया है। 
  • यह देशभर के जिला न्यायालयों से लेकर उच्च न्यायालयों से जुड़ा एक इंटरनल सॉफ्टवेयर होगा और इसके ज़रिये सभी अदालतें इंटर-कनेक्ट होंगी। 
  • जस्टिस क्लॉक नामक यह सॉफ्टवेयर अदालती प्रक्रिया में तेज़ी और जल्द फैसला देने में सहायक होगा।
  • मामलों की संख्या अधिक होने से न्याय प्रकिया में विलंब होता है और मामलों में तेजी लाने तथा जल्द फैसला करने के लिये जस्टिस क्लॉक की मदद ली जा रही है। 
  • सभी राज्यों अपने ज़िला न्यायालयों  उच्च न्यायालय का सारा डेटा इस सॉफ्टवेयर को उपलब्ध कराने को कहा गया है । 
  • जस्टिस क्लॉक पर सभी अदालतों की जानकारी उपलब्ध होगी--किस कोर्ट में कितने मामले अभी लंबित हैं...कितने समय से लंबित हैं...किस मामले में कितना समय लगा...कितनी तारीखें लगीं...मामले में देरी हुई तो क्यों हुई?
  • इस पूरे डेटा की निगरानी केंद्रीय कानून मंत्रालय करेगा और कुछ भी गलत होने पर उसमें हस्तक्षेप कर संबंधित कोर्ट से उसका जवाब मांगा जाएगा। 
  • सारा डेटा कानून मंत्रालय के पास होने से मामलों के आधार पर कोर्ट और जज की रैंकिंग तय की जाएगी। 
  • जिस कोर्ट ने केस निपटाने में देरी की, उस कोर्ट और वहाँ के जज की रैंकिंग बिगड़ेगी तथा जिस कोर्ट में कम मामले पेंडिंग होंगे, उसे अच्छी रैंकिंग मिलेगी।
  • इस रैंकिंग के आधार पर केंद्र और राज्य सरकार तय करेगी कि किस जगह पर मुकदमों के निपटारे की रफ्तार धीमी है। 
  • जस्टिस क्लॉक को रोज़ अपडेट किया जाएगा। देश के किसी भी राज्य की किसी भी कोर्ट के किसी भी जज का नाम और केस नंबर डालते ही उस केस से जुड़ा सारा रिकॉर्ड सामने आ जाएगा। 
  • इसमें यह भी जानकारी मौजूद होगी कि किसी मामले में कितनी बार तारीख दी गई और हर बार अगली तारीख देने के पीछे क्या कारण रहा।

तारीख-पे-तारीख!!!

  • बार (वकील) और बेंच (अदालतें) न्यायिक प्रक्रिया के मूल आधार हैं। अदालतों में मुकदमों का अंबार लगने का सबसे बड़ा कारण है धीमी सुनवाई। 
  • सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों की तुलना में निचली और ज़िला अदालतों की हालत ज्यादा खराब है। 
  • मुकदमों की शुरुआत यहीं से होती है और जिस मात्रा में मुकदमे दायर होते हैं, उस अनुपात में निपटारा नहीं होता। 
  • दीवानी मामला हो या फौजदारी, मुंसिफ कोर्ट में मुकदमे 25-30 साल तक चलते रहते हैं। वहाँ से फैसला हुआ तो सत्र न्यायालयों में 20-25 साल लग जाते हैं। 
  • जिला स्तर पर अधिवक्ताओं की हीला-हवाली और आए दिन हड़तालों की वज़ह से भी मामले लटके रहते हैं। 
  • वहाँ से उच्च न्यायालय में स्थगनादेश आदि मिलने पर 8-10 साल और निकल जाते हैं। स्थिति लगातार भयावह होती जाती है। 
  • सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय कई बार समयबद्ध सुनवाई करने का आदेश देती भी हैं, लेकिन जजों की कमी भी सुनवाई को प्रभावित करती है। 
  • पुलिस के पास साक्ष्यों के वैज्ञानिक संग्रहण हेतु प्रशिक्षण का अभाव है। इसके अतिरिक्त पुलिस और जेल अधिकारी प्रायः अपने कर्त्तव्यों को पूरा करने में विफल रहते हैं जिससे सुनवाई में अत्यधिक विलंब हो जाता है।
  • न्यायाधीशों की नियुक्ति पर न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच गतिरोध भी बना रहता है। न्यायधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया तय करने का काम अभी भी अधर में ही लटका हुआ है।
  • रूल ऑफ लॉ इंडेक्स रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में प्रशासनिक एजेंसियाँ बेहतर प्रदर्शन नहीं करती और न्यायिक प्रणाली की गति बहुत धीमी है। इसकी मुख्य वज़ह अदालत में मामलों की बेतहाशा बढ़ती संख्या और कार्यवाही में होने वाली देरी है।

(टीम दृष्टि इनपुट)

विधि आयोग की रिपोर्टों में न्यायिक सुधारों का उल्लेख

  • न्यायिक सुधारों को लेकर विधि आयोग ने कई सिफारिशें केंद्र सरकार को सौंपी हैं, जिनमें कई महत्त्वपूर्ण सुझाव दिये गए हैं, लेकिन इस दिशा में कोई गंभीर पहल अब तक नहीं हो पाई है। विधि आयोग ने अपनी हर सिफारिश में न्यायाधीशों और न्यायिक अधिकारियों की कमी  को पूरा करने का सुझाव दिया है। 
  • आज न्यायपालिका के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है अदालतों में मुकदमों के बोझ को कम करना। यह तभी संभव होगा जब न्यायालयों में कार्य अवधि की सीमा बढ़ेगी।
  • जिन राज्यों में मुकदमों का बोझ अधिक है, वहां विशेष अदालतें गठित करने का भी सुझाव दिया गया है। 
  • उच्च न्यायालय का विकेंद्रीकरण यानी सभी राज्यों में इसकी खंडपीठ का गठन किया जाए ताकि मुकदमों के निस्तारण में तेज़ी आए। 
  • विधि आयोग की सिफारिशों में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि लंबित मुकदमों के निपटारे के लिये छुट्टियों के दिनों में कटौती की जानी चाहिये। 

अमेरिकी विचारक अलेक्जेंडर हैमिल्टन ने कहा था, "न्यायपालिका राज्य का सबसे कमज़ोर तंत्र होता है, क्योंकि उसके पास न तो धन होता है और न ही हथियार। धन के लिये न्यायपालिका को सरकार पर आश्रित रहना होता है और अपने दिये गए फैसलों को लागू कराने के लिये उसे कार्यपालिका पर निर्भर रहना होता है।"

(टीम दृष्टि इनपुट)

विधि आयोग की 245वीं रिपोर्ट

  • इस रिपोर्ट में लगभग 30 साल पहले 1987 में विधि आयोग ने तत्कालीन समय में लंबित मुकदमों के निपटारे के लिये 44 हज़ार जजों की ज़रूरत बताई थी। 
  • आज भारत में प्रति 10 लाख लोगों पर 17 न्यायाधीश हैं जबकि विधि आयोग ने 30 साल पहले इस अनुपात को बढ़ाकर प्रति 10 लाख लोगों पर 50 न्यायाधीश करने की सिफारिश की थी।
  • विधि आयोग ने 'एरियर व बैकलॉग-न्यायिक मानव संसाधन की आवश्यकता' विषय पर 245वीं रिपोर्ट 7 जुलाई, 2014 को केंद्र सरकार को सौंपी थी। आयोग ने इस रिपोर्ट में स्पीडी ट्रायल व न्याय के लिये मौजूदा जजों की संख्या दुगुनी करने की सिफारिश की थी। देश में आज भी मात्र 18 हज़ार जज काम कर रहे हैं, जबकि जनसंख्या के अनुसार कम-से-कम 70 हज़ार जजों की आवश्यकता है।

Justice Delayed is Justice Denied
यह एक प्रसिद्ध अंग्रेज़ी कहावत है। हमारे देश में न्याय इतना विलंब से मिल पाता है कि वह अन्याय के बराबर ही होता है। छोटे-छोटे ज़मीन के टुकड़े को लेकर पचास-पचास साल मुकदमे चलते हैं। फौज़दारी के मामलों में तो  स्थिति और भी गंभीर है। अपराध में मिलने वाली सज़ा से ज़्यादा तो लोग फैसला आने के पहले ही काट लेते हैं। यह सब केवल इसलिये होता है कि मुकदमों की सुनवाई और फैसले की गति बहुत धीमी है।

Justice Delayed is Justice Denied को मानते हुए सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने पी. रामचंद्र राव बनाम कर्नाटक (2002) मामले में हुसैनआरा मामले की इस बात को दोहराया कि शीघ्र न्याय प्रदान करना राज्य का संवैधानिक दायित्व है, विशेषकर आपराधिक मामलों में तो और भी जल्दी। संविधान की प्रस्तावना और अनुच्छेद 14, 19 एवं 21 तथा राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों से भी निर्गमित न्याय के अधिकार से इनकार करने के लिये धन या संसाधनों का अभाव कोई  स्पष्टीकरण नहीं है। यह समय की मांग है कि भारतीय संघ और विभिन्न राज्य अपने संवैधानिक दायित्वों को समझें और न्याय प्रदान करने के तंत्र को मज़बूत बनाने की दिशा में कुछ ठोस कार्य करें।

(टीम दृष्टि इनपुट)

क्या किया जा सकता है?

  • सुनवाई की तारीखों का अधिकतम अंतराल तय होना चाहिये। जब तक अपरिहार्य न हो वकीलों को अगली सुनवाई की तारीख नहीं मांगनी चाहिये। 
  • अदालतों में मुकदमों के लंबित रहने की एक वज़ह निचली अदालतों की कार्य संस्कृति भी है। वकील बगैर किसी ठोस आधार पर अदालत में तारीख आगे बढ़ाने की अर्जी दाखिल कर देते हैं और वह आसानी से मंज़ूर भी हो जाती है।
  • अगर कोई मुकदमा नियत समय में फैसले तक नहीं पहुँचता है तो उसे त्वरित सुनवाई की प्रक्रिया में शामिल करने की मुकम्मल व्यवस्था होनी चाहिये।
  • न्याय प्रणाली के गुणात्मक पक्ष का भी ध्यान रखा जाना चाहिये। न्यायाधीशों की चयन प्रक्रिया को पारदर्शी बनाकर तथा उनकी जवाबदेही तय करके ही न्याय के गुणात्मक पक्ष को साधा जा सकता है। 
  • न्याय-व्यवस्था में सुधार की कार्रवाई नीचे से शुरू की जाए। फौजदारी, दीवानी और आर्थिक अपराधों के लिये अलग-अलग अदालतें गठित की जानी चाहिये।
  • जिन राज्यों में मुकदमों का बोझ अधिक है वहाँ पर विशेष अदालतों का गठन किया जाना चाहिये। 
  • पारदर्शिता और सूचना प्रवाह में सुधार के लिये सूचना और प्रौद्योगिकी के साधनों तथा आधुनिक वाद-प्रबंधन प्रणाली का उपयोग किया जाना चाहिये।
  • वैकल्पिक विवाद समाधान प्रणाली को मज़बूत किया जाना चाहिये और लोगों को इसके बारे में अवगत कराया जाना चाहिये।
  • प्रभावी कार्यवाही और जाँच प्रणाली में सुधार के लिये पुलिस प्रशासन को अधिक संसाधन प्रदान करने की आवश्यकता है।
  • लंबे समय से अदालतों में चल रहे मुकदमों का समयबद्ध तरीके से निस्तारण होना चाहिये। यहाँ सिंगापुर का उदाहरण लिया जा सकता है जहाँ न्यायालय में लगने वाले दिनों के हिसाब से वादी या प्रतिवादी से ‘टैक्स’ लिया जाता है जिससे कम दिनों में ही मुकदमा निपट सके।
  • ग्राम न्यायालयों की स्थापना का कार्य तीव्रता से संपन्न किया जाना आवश्यक है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि सामाजिक, आर्थिक अथवा अन्य असमर्थताओं के कारण कोई भी नागरिक न्याय के अवसरों से वंचित हो।
  • देश में आबादी के लिहाज़ से जजों की संख्या बहुत कम है, विकसित देशों की तुलना में कई गुना कम। जजों की संख्या बढ़ाने की सिफारिश विधि आयोग भी कर चुका है, लेकिन उन सिफारिशों पर अमल नहीं हुआ।
  • न्यायालयों का रख-रखाव, उनके संसाधन, वादी-प्रतिवादियों को न्यायालय परिसर में वांछित सुविधाएं और अधिवक्ताओं पर नियंत्रण आदि जैसी मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिये प्रत्येक ज़िले में एक अभिकरण होना चाहिये। इससे अदालतों की दक्षता पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
  • विधि आयोग की 120वीं रिपोर्ट कहा गया था कि भारत, दुनिया में आबादी एवं न्यायाधीशों के बीच सबसे कम अनुपात वाले देशों में से एक है। अमेरिका और ब्रिटेन में 10 लाख लोगों पर करीब 150 न्यायाधीश हैं जबकि इसकी तुलना में भारत में इतने ही लोगों पर सिर्फ 10 न्यायाधीश हैं।
  • जजों की सेवानिवृत्ति की आयु भी बढ़ानी चाहिये, इससे मुकदमों के निस्तारण में तेजी आएगी। इज़राइल, कनाडा, न्यूज़ीलैंड और ब्रिटेन में उच्च न्यायालयों तथा सर्वोच्च न्यायालय के जजों की सेवानिवृत्ति की आयु 68 से 75 वर्ष के बीच है, जबकि अमेरिका में इसके लिये कोई आयु सीमा तय नहीं है। भारत में ही उच्च न्यायालयों के जजों की सेवानिवृत्ति की आयु सीमा 62 वर्ष तथा सर्वोच्च न्यायालय में 65 वर्ष है।
  • अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ सर्वोत्तम प्रथाओं जैसे कि वादों का न्यायिक प्रबंधन, मुकदमे की तैयारी, सेटलमेंट कांफ्रेंस, कुछ निश्चित चीजें फाइल करने हेतु वकीलों के लिये समय-सीमा तय करना इत्यादि का विकास किया गया है। यह विलंब कम करने में बहुत प्रभावी सिद्ध हुए हैं।

राष्ट्रीय अदालत प्रबंधन की रिपोर्ट
राष्ट्रीय अदालत प्रबंधन की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक बीते तीन दशकों में मुकदमों की संख्या दोगुनी रफ्तार से बढ़ी है। अगर यही स्थिति बनी रही तो अगले 30 वर्षों में देश के विभिन्न अदालतों में लंबित मुकदमों की संख्या करीब पंद्रह करोड़ तक पहुंच जाएगी। इस मामले में विधि एवं न्याय मंत्रालय के आँकड़े भी चौंकाने वाले हैं। रिपोर्ट के अनुसार देश में 2015 तक विभिन्न अदालतों में साढ़े तीन करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित थे। इनमें सर्वोच्च न्यायालय में 66,713, उच्च न्यायालयों में 49,57,833 और निचली अदालतों में 2,75,84,617 मुकदमे लंबित थे।

(टीम दृष्टि इनपुट)

न्यायिक सुधारों की आवश्यकता 

  • देश के नागरिकों के लिये 'न्याय' सुरक्षित करने से संबंधित अपनी संवैधानिक प्रतिबद्धता को सही मायनों में पूरा करने के लिये न्यायिक सुधार समय की मांग है। 
  • न्यायिक सुधार का एक महत्त्वपूर्ण पहलू अदालत की कार्यप्रणाली और न्यायिक प्रक्रियाओं को पुनः संरचित करना है ताकि मामलों का शीघ्र निपटारा किया जा सके।
  • केस प्रबंधन प्रणाली के तहत मुकदमेबाजी के प्रत्येक चरण के लिये समय-सीमा का निर्धारण, आवश्यक आईटी समर्थन तथा मामलों के भार की निगरानी के साथ उपयुक्त तरीके से प्रशिक्षित जजों के माध्यम से वैकल्पिक विवाद निपटारा प्रणाली को अपनाने के लिये बढ़ावा देना होगा। 
  • वादियों को भी जवाबदेह ठहराया जाना चाहिये और बार-बार स्थगन आदि मांगने जैसी टालमटोल की रणनीतियों को अपनाने वाले या आधारहीन मामले दायर करने वाले पक्षों से लागत वसूल की जानी चाहिये।
  • प्रणालीगत परिवर्तनों के माध्यम से न्याय प्रणाली में सुधार किया जाना बेहद ज़रूरी है। ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका तथा कनाडा में लगभग 70 प्रतिशत सिविल मामले ट्रायल शुरु होने से पहले निपट जाते हैं, क्योंकि  दोनों पक्ष परिणाम आने में लगने वाले संभावित समय-सीमा के बारे में जानते हैं।
  • हमारे प्रक्रियात्मक कानूनों की गुणवत्ता; जटिल वाणिज्यिक विवादों को निपटाने व विशेषज्ञता में कमी; जनहित याचिका का दुरुपयोग तथा विशेष अनुमति याचिकाओं की प्रणाली जिसके कारण अनेक छोटी-छोटी बातों से संबंधित मामले उच्च न्यायपालिका में उठते रहते हैं, जबकि इन को राज्य स्तरीय न्याय प्रणाली में विभिन्न स्तरों पर निपटाया जा सकता है।
  • पूंजी निवेश को प्रोत्साहित करने तथा इसके माध्यम से प्रगति व विकास को प्रेरित करने के लिये स्पष्ट कानूनी ढाँचे पर आधारित निष्पक्ष, पारदर्शी व कार्यकुशल विवाद समाधान प्रणाली प्रदान करना भी महत्वपूर्ण है। निवेशक चाहते हैं कि निर्णय उचित समय में लिये जाएँ। 

न्याय की भाषा भारतीय हो

  • आज़ादी के बाद संविधान निर्माताओं ने तत्कालीन स्थिति के मद्देनज़र देश में 15 वर्ष तक अंग्रेजी में ही शासन प्रणाली चलाने की व्यवस्था की थी। तब इस देश की न्याय प्रणाली पर भी अंग्रेज़ी का प्रभाव था। संविधान निर्माताओं ने तब अनुच्छेद 348(1) के अंतर्गत यह प्रावधान किया कि देश के सभी उच्च न्यायालयों व सर्वोच्च न्यायालय की भाषा अंग्रेज़ी होगी। यह प्रावधान तब तक ही लागू रहना था जब तक कि संसद कोई अन्य प्रावधान न कर दे।
  • अनुच्छेद 348(2) में यह प्रावधान किया गया कि किसी भी प्रदेश के राज्यपाल राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से उस प्रदेश के उच्च न्यायालय में हिंदी या उस प्रदेश की राजभाषा में उच्च न्यायालय की कार्यवाही संपादित करने की अनुमति दे सकते हैं। लेकिन ऐसा कुछ हो नहीं पाया और आज भी न्यायपालिका की कामचलाऊ भाषा अंग्रेज़ी ही है। ऐसे में इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि वह व्यक्ति जो अंग्रेज़ी जानता ही नहीं, न्यायालयों में अपना पक्ष इसी भाषा में रखने के लिये विवश है। 
  • अपनी भाषा में न्याय पाने का यह मुद्दा इसलिये भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि 2001 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल 43% जनसंख्या हिंदी को अपनी प्रथम भाषा के तौर पर स्वीकार करती है, जबकि 30% से ज़्यादा लोग हिंदी को द्वितीय वरीयता देते हुए अपनी क्षेत्रीय भाषाओं को प्रथम भाषा मानते हैं। 
  • अंग्रेजी को अपनी प्रथम भाषा मानने वाले लोग कुल जनसंख्या का 0.2% हैं। जिस देश में लगभग शत-प्रतिशत लोग अंग्रेज़ी न जानने वालों की श्रेणी में आते हों, उस देश की उच्च न्यायिक प्रक्रिया में अंग्रेजी का अनिवार्य होना एवं अन्य सभी भारतीय भाषाओं का कानूनी तौर पर प्रतिबंधित होना बेहद अप्रासंगिक एवं अतार्किक प्रतीत होता है।
  • न्यायालय की भाषा पर गौर करने से पता चलता है कि वादपत्र लिखने का तरीका एवं शब्दावली, दोनों ही आम लोगों की समझ से  बाहर होता है। कई बार तो स्थिति ऐसी होती है कि याचिकाकर्ता के आवेदन की भाषा उसी की समझ में नहीं आती।
  • इसी प्रकार निर्णयों की भाषा भी सरल होनी चाहिये ताकि वह वादियों की समझ में आसानी से आ सके। अभी देखा यह जाता है कि कुछ निर्णय इतने क्लिष्ट होते हैं कि विधि विशेषज्ञ भी उन्हें समझने में असमर्थ रहते हैं और न्यायालय से उन्हें स्पष्ट करने का अनुरोध करना पड़ता है।

(टीम दृष्टि इनपुट)

न्याय वितरण प्रणाली के लिये नीति आयोग की सिफारिशें
पिछले वर्ष नीति आयोग ने न्याय वितरण प्रणाली में तेज़ी लाने के लिये कुछ महत्त्वपूर्ण दूरगामी सुधारों का सुझाव दिया था। ये सुझाव विशेष रूप से निचली अदालतों के संदर्भ में दिये गए थे, जहाँ पिछले कई वर्षों से लगभग तीन करोड़ मामले लंबित पड़े हैं। 

  • उच्च अदालतों एवं उनके मुख्य न्यायाधीशों द्वारा न्यायिक प्रक्रियाओं में होने वाली देरी को कम करने के लिये ज़िला अदालतों और अधीनस्थ स्तर के न्यायिक निकायों के प्रदर्शन तथा उनकी प्रक्रिया पर नज़र रखने हेतु न्यायिक प्रदर्शन सूचकांक बनाया जाना चाहिये।
  • इस सूचकांक के अंतर्गत कुछ ऐसी महत्त्वपूर्ण प्रक्रियाओं को भी शामिल किया जा सकता है, जिन्हें पहले से ही उच्च न्यायालयों द्वारा अनुमोदित किया जा चुका है। जैसे कि दिन-प्रतिदिन के न्यायिक कार्यों का भार जजों के ऊपर से हटाकर उन्हें प्रशासनिक अधिकारियों को सौंपा जाए। इससे जजों को अधिक-से-अधिक मामलों की सुनवाई करने का समय मिलेगा तथा कुछ हद तक इस समस्या का समाधान भी हो सकेगा।
  • न्यायाधीशों का कार्यभार कम करने के लिये न्यायिक प्रणाली में अलग से एक प्रशासनिक कैडर बनाए जाने की आवश्यकता है। न्यायिक स्वतंत्रता बनाए रखने के लिये इस संवर्ग द्वारा प्रत्येक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को अपनी रिपोर्ट देनी चाहिये।
  • इस संबंध में स्वचालन, इलेक्ट्रॉनिक अदालतों की सक्षमता मामलों के प्रबंधन, सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी, अदालती समय-सारिणी के इलेक्ट्रॉनिक प्रबंधन और सभी अदालतों का एकीकृत राष्ट्रीय न्यायालय में स्थानांतरण जैसी अतिरिक्त अदालती प्रक्रियाओं को भी उच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिये।
  • इस संबंध में न्यायिक जनशक्ति और बुनियादी ढाँचे की पर्याप्तता का निर्धारण करने के लिये न्यायिक आँकड़ों को ऑनलाइन उपलब्ध कराया  जाना चाहिये। 
  • अधिक प्रभावी कार्यवाही करने के लिये भारत सरकार को विश्व के अन्य देशों द्वारा अपनाई गई प्रक्रियाओं एवं प्रणालियों के विषय में भी अध्ययन करना चाहिये।

निष्कर्ष: समय पर न्याय पाना व्यक्ति का अधिकार है, इसलिये न्यायपालिका में सुधार की आवश्यकता है। भारत में न्यायिक सुधार की बातें सिर्फ बहसों तक सीमित रह गई हैं, जबकि इस दिशा में पूरी इच्छाशक्ति से काम करने की ज़रूरत है। हालाँकि, न्यायिक सुधार की जिम्मेदारी केवल न्यायाधीशों, अधिवक्ताओं और सरकारों पर ही निर्भर नहीं है, बल्कि आम जनता को भी इस दिशा में सोचने की ज़रूरत है। 

अदालतों में लंबित मुकदमों की सुनवाई मात्र ही इस समस्या का समाधान नहीं है। पुराने और अप्रासंगिक हो चुके कानूनों में संशोधन, अदालतों को अत्याधुनिक तकनीकी से लैस करने और सुरक्षित न्यायिक परिसर बनाने पर भी गौर करना होगा। न्यायपालिका में व्याप्त खामियों की वज़ह से भी कई समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं। न्यायपालिका को Holy Cow नहीं मानना चाहिये।

ज़रूरत है कि न्याय को सुलभ, सस्ता और न्यायिक प्रक्रिया को जनोन्मुखी बनाने के लिये कानूनों के साथ-साथ न्यायपालिका में संगठनात्मक, प्रक्रियात्मक, प्रशासनिक तथा सांस्कृतिक बदलाव किया जाए जिससे जनता को अदालतों में होने वाली कठिनाइयों  और परेशानियों से बचाया जा सके।

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