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अंतर्राष्ट्रीय संबंध

भारत-बांग्लादेश सहयोग और आर्थिक भागीदारी

  • 01 Aug 2020
  • 19 min read

संदर्भ:    

हाल ही में बांग्लादेश के चट्टोग्राम बंदरगाह से होते हुए कोलकाता से भेजे गए कंटेनर कार्गो को अगरतला तक पहुँचाया गया, केंद्रीय विदेश मंत्रालय ने इसे भारत-बांग्लादेश सहयोग और आर्थिक भागीदारी की दिशा में एक मील का पत्थर बताया है। बीते कुछ वर्षों में भारत और बांग्लादेश के बीच शिपिंग और अंतर्देशीय (Inland) जल व्यापार में सहयोग की दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रगति हुई है। भारत और बांग्लादेश के बीच अंतर्देशीय जल पारगमन और व्यापार पर प्रोटोकॉल (Protocol on Inland Water Transit and Trade- PIWT & T) के तहत 6 मौजूदा ‘पोर्टस ऑफ कॉल’ (Ports of Call) के अलावा, दोनों देशों में पांच अतिरिक्त बंदरगाह जोड़े गए हैं।  

 

‘पोर्टस ऑफ कॉल’ (Ports of Call):

पोर्ट ऑफ कॉल से आशय मालवाहक जहाज़ द्वारा अपनी निर्धारित यात्रा के दौरान बीच में कुछ माल लादने/उतारने अथवा ईंधन भरने हेतु लिये गए मध्यवर्ती ठहराव से है। 

प्रमुख बिंदु:

  • वर्ष 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय भारत-बांग्लादेश (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) के संबंध में आए तनाव के बाद हाल के वर्षों में बढ़ता परस्पर द्विपक्षीय सहयोग एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।
  • बांग्लादेश की स्वतंत्रता (वर्ष 1971) के बाद से ही दोनों देशों के बीच कई बड़े समझौतों पर हस्ताक्षर हुए हैं, परंतु हाल के वर्षों में योजनाओं के क्रियान्वयन की दिशा में द्विपक्षीय प्रयासों में आई तेज़ी इस संबंध की मज़बूती और नीतिगत समन्वय को दिखाता है।       
  • मार्च 2019 में भारत और बांग्लादेश के प्रधानमंत्रियों द्वारा एक वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से बांग्लादेश में पूरी की गई कई महत्त्वपूर्ण परियोजनाओं का उद्घाटन किया गया था। 
    • इसमें 11 जल उपचार संयंत्र, 36 सामुदायिक अस्पताल की स्थापना के साथ क्षमता निर्माण के हेतु भारत और बांग्लादेश के संस्थानों के बीच सहयोग के समझौते आदि शामिल हैं।  
  • बांग्लादेश द्वारा भारत को अपने बंदरगाहों के प्रयोग की अनुमति देने से कोलकाता से अगरतला की लगभग 1600 किमी. दूरी घटकर मात्र 450 किमी. ही (लगभग) रह जाएगी।       

पृष्ठभूमि:

  • वर्ष 1965 तक बांग्लादेश से होते हुए बहुत ही आसानी से पूर्वोतर भारत के राज्यों में पहुँचा जा सकता था। 
  • भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय तक भारतीय क्षेत्र से बांग्लादेश में जाने वाली 7 रेलवे लाइन सक्रिय थी। 
  • वर्ष 1971 में बांग्लादेश की स्वतंत्रता के बाद भारत विश्व के उन शुरुआती गिने-चुने देशों में था जिसने बांग्लादेश को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्वीकार किया। 
  • दोनों देशों के बीच रक्षा क्षेत्र में सहयोग हेतु महत्त्वपूर्ण समझौते किये गए हैं और दोनों देशों के बीच समय-समय पर सैन्य अभ्यासों का आयोजन भी किया जाता रहा है। जैसे- नौसैनिक अभ्यास ‘मिलन’ (MILAN), संयुक्त सैन्य अभ्यास ‘सम्प्रीति' (SAMPRITI)।   
  • भारत और बांग्लादेश लगभग 4096.6 किमी लंबी सीमा साझा करते है और वर्ष 2015 में दोनों देशों के बीच एक ‘थल सीमा समझौते’ (Land boundary agreement-LBA) पर हस्ताक्षर किये गए।
  • भारत और बांग्लादेश के बीच नदियों से जुड़े मुद्दों के लिये वर्ष 1972 से एक ‘संयुक्त नदी आयोग’ (Joint River Commission- JRC) सक्रिय है। ध्यातव्य है कि दोनों देश 54 नदियों का जल साझा करते हैं। 
  •  भारत सरकार द्वारा (कुछ मादक उत्पादों को छोड़कर) बांग्लादेश के उत्पादों को भारतीय बाज़ार में बेचने पर अतिरिक्त कर से छूट प्रदान की गई है। इस छूट के परिणाम स्वरूप वर्ष 2019 भारत को किये गए बांग्लादेशी निर्यात में 43% की वृद्धि (वर्ष 2018 की तुलना में) देखी गई।     

अंतर्देशीय जल पारगमन: 

  • वर्ष 2019 में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच अंतर्देशीय जल पारगमन पर समझौता किया गया था।
  • इसके तहत कोलकाता बंदरगाह से मालवाहक जहाज़ों के माध्यम से सामान बांग्लादेश के चट्टोग्राम बंदरगाह तक पहुँचाया जाएगा, जहाँ से इसे अखौरा (बांग्लादेश) के रास्ते ट्रक के माध्यम से अगरतला तक पहुँचाया जाएगा। 
  • बांग्लादेश और भारत के दूसरे हिस्सों को जोड़ने के लिये नए आवागमन/व्यापार मार्गों (जैसे- मोंगला बंदरगाह के रास्ते) के निर्माण के प्रयास किये जा रहे हैं।
    • गौरतलब है कि कोलकाता बंदरगाह से मोंगला बंदरगाह के बीच जल मार्ग से यातायात का समय मात्र एक दिन का है। साथ ही मोंगला बंदरगाह से वस्तुओं को बहुत ही आसानी से असम के जाकीगंज तक पहुँचाया जा सकता है। 
  • साथ ही अखौरा-अगरतला रेल मार्ग को वर्ष 2021 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।  

विद्युत् आपूर्ति:

  • भारत द्वारा पूर्वोत्तर राज्यों में स्थित ग्रिडों से बांग्लादेश को विद्युत् का निर्यात भी किया जाता है।
  • हाल के वर्षों में बांग्लादेश को विद्युत निर्यात करने में भारतीय निजी क्षेत्र की कंपनियों की सक्रिय भागीदारी में वृद्धि हुई है।
    • अडानी पॉवर लिमिटेड द्वारा झारखंड में विद्युत उत्पादन संयंत्र से बांग्लादेश को वियुत आपूर्ति की योजना है।
    • रिलायंस पावर द्वारा बांग्लादेश में 745 मेगावाट की गैस-विद्युत परियोजना इस दिशा में एक उपलब्धि होगी।
  • इसके साथ ही बांग्लादेश में भारत के लिये समर्पित ‘विशेष आर्थिक क्षेत्र’ (Special Economic Zone- SEZ) से भी व्यापार की दृष्टि से भारतीय निवेशकों के लिये बड़े अवसर उपलब्ध करा सकता है।                           

अन्य क्षेत्रों में सहयोग:    

  • हाल के वर्षों में भारत और बांग्लादेश के संबंधों में हुई प्रगति को इस आधार पर समझा जा सकता है कि वर्तमान में दोनों देशों के बीच शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यटन ही नहीं बल्कि अन्य रणनीतिक महत्त्व के क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ा है। इनमें से कुछ निम्नलिखित है- 
    • परमाणु विज्ञान
    • अंतरिक्ष 
    • सूचना प्रौद्योगिकी (उदाहरण- भारत द्वारा बांग्लादेश के 500 स्कूलों में कंप्यूटर लैब और लैंग्वेज लैब की स्थापना का कार्य चल रहा है।)   
  • भारत-बांग्लादेश के बीच अंतर्देशीय जल मार्गों के अतिरिक्त रेलवे और बस यातायात के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण प्रगति हुई है। 

द्विपक्षीय संबंधों की मज़बूती का कारण:

  • हाल के वर्षों में भारत और बांग्लादेश के बीच विभिन्न क्षेत्रों में हुए समझौतों और परियोजनाओं के कार्यान्वयन में दोनों पक्षों के नेतृत्व के बीच समन्वय बहुत ही महत्त्वपूर्ण रहा है।
  • साथ ही दोनों पक्षों के राजनयिकों के बीच भी औपचारिकता पूरी करने के बजाय समस्याओं के समाधान हेतु व्यवहारिक और लक्षित प्रयासों से भी द्विपक्षीय संबंधों को मज़बूती प्रदान करने में सहायता प्राप्त हुई है। 
  • भारत-बांग्लादेश संबंधों की मज़बूती के लिये आवश्यक है कि भारत द्वारा चलाई जा रही योजनाओं का सीधा लाभ बंग्लादेश की आम जनता को मिल सके और यही भारत सरकार का लक्ष्य भी रहा है।

    • उदाहरण के लिये- वर्ष 2009 में बांग्लादेश में विद्युत आपूर्ति एक बड़ी चुनौती थी परंतु भारत द्वारा विद्युत आपूर्ति ने बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था को आगे ले जाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

    • ये परियोजनाएँ व्यापारिक लाभ के बजाय द्विपक्षीय विकास के मूल्यों पर आधारित हैं।
  • वर्ष 2014 में भारत-बांग्लादेश के समुद्री सीमा विवाद पर बांग्लादेश के पक्ष में दिये गए संयुक्त राष्ट्र न्यायाधिकरण के फैसले को भारत द्वारा बिना किसी विवाद के स्वीकार करना द्विपक्षीय विश्वास और संबंधों की मज़बूती को दिखता है।   

लाभ:

  • बांग्लादेश के बंदगाहों के उपयोग की अनुमति मिलने से पूर्वोत्तर राज्यों तक बहुत ही कम लागत और कम समय में वस्तुओं की आपूर्ति सुनिश्चित की जा सकेगी। 
  • COVID-19 और अर्थव्यवस्था:  
    • वर्तमान में COVID-19 के कारण विश्वभर की अर्थव्यवस्था में भारी गिरावट देखने को मिली है और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला भी प्रभावित हुई है, ऐसे में भारत तथा बांग्लादेश के बीच व्यापार एवं परिवहन को बढ़ावा देने का निर्णय बहुत ही तार्किक है।
    • भारत और बांग्लादेश के बीच शुरू की गई इन परियोजनाओं से COVID-19 के बाद दोनों ही देशों की अर्थव्यवस्थाओं को गति प्रदान करने में सहायता प्राप्त होगी।
  • स्थानीय विकास: 
    • भारत और बांग्लादेश के बीच आर्थिक भागीदारी तथा परिवहन (सड़क, रेल, अंतर्देशीय जल पारगमन आदि) के क्षेत्र में हुए प्रयासों से पूर्वोत्तर भारत के विकास एवं पूर्वोत्तर भारत से बांग्लादेश के क्षेत्रीय संबंधों से साथ भारतीय आर्थिक परिदृश्य में पूर्वोत्तर राज्यों को एक मज़बूत स्थान प्रदान करने में सहायता प्राप्त होगी।  
    • इन परियोजनाओं के माध्यम से पूर्वोत्तर भारत के राज्यों के बाज़ारों में बांग्लादेश के कारोबारियों की पहुँच बढ़ेगी, जिसे भविष्य में म्यांमार तक भी जोड़ा जा सकता है। 

प्रदूषण में कमी: 

  • कोलकाता से अगरतला तक परिवहन की दूरी कम होने से लागत और समय लो बचत के साथ प्रदूषण में भी भारी कमी लाने में सफलता प्राप्त होगी। 

क्षेत्रीय समूहों पर प्रभाव:  

  • भारत और बांग्लादेश के बीच द्विपक्षीय सहयोग में प्रगति ‘बांग्लादेश, भूटान, भारत और नेपाल’ (Bangladesh, Bhutan, India and Nepal Initiative-BBIN) और बिम्सटेक (BIMSTEC) जैसे क्षेत्रीय समूहों को मज़बूती प्रदान करने में सहायक होगा।
  • भारत और बांग्लादेश के बीच संचालित अंतर्देशीय जल पारगमन परियोजनाओं से नेपाल और भूटान को भी लाभ होगा।
  • मोंगला बंदरगाह से नेपाल और भूटान की दूरी कम होने से परिवहन की लागत और परिवहन से होने वाले पर्यावरण प्रदूषण को भी कम किया जा सकता है।
  • नेपाल और भूटान ने ‘भारत-भूटान-बांग्लादेश-नेपाल’ के बीच एक पवार ग्रिड परियोजना में शामिल होने की इच्छा ज़ाहिर की है। 
  • BBIN समूह के बीच लंबे समय से एक ‘परिवहन समझौते’ पर चर्चा चल रही है, इस समझौते में भविष्य में जल मार्ग को भी शामिल किया जा सकता है।          

चुनौतियाँ:

  • भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता नदी जल बँटवारे से जुड़ा विवाद लंबे समय से एक समस्या बना हुआ है।   
  • भारत और बांग्लादेश के बीच अच्छे संबंधों में बांग्लादेश की वर्तमान प्रधानमंत्री शेख हसीना की भूमिका भी बहुत महत्त्वपूर्ण है, ऐसे में शेख हसीना की अनुपस्थिति में वर्तमान सहयोग को बनाए रखना एक चुनौतीपूर्ण कार्य होगा।
  • चीन और पाकिस्तान लंबे समय से बांग्लादेश में अपने प्रभाव को स्थापित करने तथा भारत-बांग्लादेश संबंधों को कमज़ोर करने का प्रयास करते रहे हैं।
  • साथ ही बांग्लादेश की आतंरिक राजनीति में भी चीन और पाकिस्तान द्वारा लगातार दबाव बनाने का प्रयास किया जाता रहा है। 

आगे की राह:

  • मोंगला बंदरगाह की तुलना में चटगाँव बंदरगाह पर बड़े जहाजों से सामान की ढुलाई संभव है, अतः भविष्य में चटगाँव बंदरगाह से अगरतला को रेलवे लाइन से जोड़कर पूर्वोत्तर के राज्यों तक शेष भारत की पहुँच को अधिक सुगम बनाया जा सकेगा।
  • पड़ोसी देशों से मज़बूत संपर्क तंत्र और समयबद्द रूप से योजनाओं के क्रियान्वयन के मामले में भारत हमेशा से ही पीछे रहा है, ऐसे में भारत और बांग्लादेश के बीच परिवहन और अन्य क्षेत्रों में सहयोग में वृद्धि को देखते हुए क्षेत्र के अन्य देशों के साथ भी ऐसी योजनाओं को लागू करने का रास्ता साफ होगा।
  • भारत को अखौरा-अगरतला रेल मार्ग के साथ अन्य योजनाओं में तेज़ी लानी चाहिये, साथ ही बांग्लादेश और भारत की आम जनता के बीच संपर्क को बढ़ाने का प्रयास किया जाना चाहिये।   
  • भारत-बंग्लादेश के बीच संचालित परियोजनाओं में नेपाल और भूटान को जोड़ते हुए भविष्य में ‘बिम्सटेक' समूह तक इसका विस्तार किया जा सकता है, जो क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को जोड़ने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम होगा।  

निष्कर्ष: 

बांग्लादेश के स्वतंत्रता संघर्ष से लेकर आज तक भारत अनेक मोर्चों पर बांग्लादेश को सहायता पहुँचाता रहा है। हाल के वर्षों में व्यापार, रक्षा, ऊर्जा आदि क्षेत्रों में भारत-बांग्लादेश संबंधों में महत्त्वपूर्ण प्रगति हुई है।   बांग्लादेश द्वारा भारत को मोंगला बंदरगाह के प्रयोग की अनुमति दिये जाने से पूर्वोत्तर राज्यों की समुद्री व्यापार से पहुँच बेहतर होगी साथ ही यह बांग्लादेश को भी क्षेत्र में एक ‘संपर्क और पारगमन’ का केंद्र बनने में सहायता करेगा। दोनों देशों को छोटे आतंरिक विवादों को आपसी सहमति दूर करते हुए और बाहरी चुनौतियों (पाकिस्तान, चीन आदि) से निपटने में भी मिल कर कार्य करना होगा। दोनों देशों के बीच कभी भी कोई बड़ा विवाद नहीं रहा है और अधिकांश मुद्दों पर दोनों के मत सामान रहे हैं। वर्तमान में बदलते दक्षिण एशिया और विश्व स्तर पर बदलते राजनीतिक तथा आर्थिक परिदृश्य के बीच क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं का संपर्क बहुत ही आवश्यक हो गया है। प्राकृतिक संपर्क मार्गों से स्थानीय उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखलाओ को मुख्य धारा से जोड़ने वाले ऐसे साझा प्रयासों के माध्यम COVID-19 के प्रभावों से उबरने के साथ भविष्य में स्थानीय स्तर पर एक मज़बूत आर्थिक तंत्र की स्थापना की जा सकेगी। 

अभ्यास प्रश्न:  21वीं सदी के दक्षिण-एशियाई आर्थिक और राजनीतिक परिवेश में भारत और बांग्लादेश संबंधों की भूमिका की समीक्षा करते हुए भारत-बांग्लादेश द्विपक्षीय संबंधों के भविष्य और इसकी चुनौतियों पर प्रकाश डालिये।

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