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विशेष : हिंद-प्रशांत : नई संभावनाएँ

  • 17 Nov 2018
  • 23 min read

संदर्भ

भारत हमेशा से अपने पड़ोसी देशों से मधुर संबंध बनाने के लिये प्रयत्नशील रहा है। "वसुधैव कुटुम्बकम" का ध्येय हमारी विदेश नीति का मूल आधार रहा है। इसी के मद्देनज़र न केवल संयुक्त राष्ट्र और अन्य अतंर्राष्ट्रीय समितियों एवं संगठनों में भारत हमेशा से भागीदार रहा है बल्कि क्षेत्रीय संगठनों और सम्मेलनों में भी काफी प्रभावशाली भूमिका निभाता रहा हैI इसी के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 नवंबर को सिंगापुर में 13वें पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में भाग लिया।

  • चूँकि हिंद-प्रशांत क्षेत्र से भारत के गहरे हित जुड़े हुए हैं और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों से भारत के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंध ऐतिहासिक और काफी मज़बूत हैं। इसलिये प्रधानमंत्री ने सम्मेलन में शामिल कई देशों के नेताओं से अंतर्राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा की।
  • भारत ने साफ किया है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति और समृद्धि के लिये वह प्रतिबद्ध है। प्रधानमंत्री मोदी की सिंगापुर दौरे के दौरान अमेरिकी उपराष्ट्रपति के साथ भी हिंद-प्रशांत क्षेत्र के बारे में चर्चा हुई।

भारत के प्रधानमंत्री की भागीदारी

  • 13वें पूर्वी एशियाई शिखर सम्मेलन का आयोजन नवंबर को सिंगापुर में किया गया। इसमें भारत की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिस्सा लिया।
  • सम्मेलन में शामिल नेताओं ने हिंद प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सहयोग समेत वैश्विक और क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा की।
  • पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में कुल 18 देश शामिल हैं। इनमें दक्षिण एशिया और पूर्वी एशिया के देश तो शामिल हैं ही, इसके अलावा अमेरिका और रूस भी इस मंच में शामिल हैं।
  • इस तरह से यह मंच हिंद-प्रशांत क्षेत्र में कई संभावनाओं को तलाशने के लिहाज़ से काफी महत्त्वपूर्ण है।
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सम्मेलन में शांत, खुला और समावेशी हिंद-प्रशांत क्षेत्र, मज़बूत होते समुद्री सहयोग और संतुलित क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (Regional Comprehensive Economic Partnership-RCEP) पर भारतीय दृष्टिकोण को दोहराया।
  • सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने शांतिपूर्ण और समृद्ध हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिये भारत की प्रतिबद्धता को दोहराया।
  • उन्होंने सदस्य देशों के बीच बहुपक्षीय सहयोग, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ाने पर भी ज़ोर दिया।
  • भारत हिंद प्रशांत क्षेत्र में नई संभावनाओं को तलाशने और सदस्य देशों के बीच सहयोग बढ़ाने के मकसद से RCEP करार को जल्द पूरा करना चाहता है।
  • प्रधानमंत्री ने कहा कि RCEP करार आधुनिक, वृहद्, संतुलित और सभी देशों के लोगों के लिये लाभदायक होना चाहिये।
  • प्रधानमंत्री ने RCEP के लिये चल रही बातचीत को जल्द पूरा किये जाने पर भी बल दिया और कहा कि इसमें सेवाओं के व्यापार को पर्याप्त महत्त्व देने की ज़रूरत है।
  • प्रधानमंत्री ने RCEP के नेताओं से कहा कि वे अपने वाणिज्य मंत्रियों और वार्ताकारों को इस वार्षिक समूह की बातचीत को आगे बढ़ाने का अधिकार दें। उन्होंने सेवा क्षेत्र के लिये भी इसी तरह के प्रयास करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया।
  • इसके पीछे कारण बताते हुये प्रधानमंत्री ने कहा कि ज़्यादातर RCEP देशों के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में सेवा क्षेत्र का हिस्सा 50 प्रतिशत से अधिक है और भविष्य में सेवाएँ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।
  • प्रधानमंत्री ने सदस्य देशों से स्पष्ट कहा कि भारत RCEP करार का समर्थन करता है और सभी नेताओं से इसे जल्द पूरा किये जाने हेतु प्रयास करने को कहा है।
  • सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री ने हिंद-प्रशांत की समृद्धि के लिये व्यापार और निवेश के साथ समुद्री क्षेत्र में सहयोग की भारत की प्रतिबद्धता दोहराई।
  • सिंगापुर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी उपराष्ट्रपति माइक पेंस के बीच भी मुलाकात हुई। दोनों नेताओं के बीच रक्षा सहयोग के साथ मुक्त और खुले हिंद प्रशांत क्षेत्र की ज़रूरत समेत बाकी द्वीपक्षीय मुद्दों पर भी चर्चा हुई।
  • अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने भी हिंद-प्रशांत क्षेत्र को मुक्त और खुला बनाए रखने के लिये भारत के रवैये की सराहना की।
  • हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते सैन्य अभ्यास को देखते हुए भारत-अमेरिका और अन्य वैश्विक ताकतें इस क्षेत्र को खुला और समृद्ध बनाने की ज़रूरत पर बातचीत कर रही हैं।
  • प्रधानमंत्री की सिंगापुर यात्रा से आसियान और पूर्वी एशिया के देशों के साथ भारत की बढ़ रही भागीदारी को नई गति मिलने की उम्मीद है। इसके साथ ही हिंद-प्रशांत क्षेत्र के देशों के बीच सहयोग बढ़ाने में भी मदद मिलेगी।

क्या है क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP)?

  • क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी 16 देशों के मध्य एक वृहद् क्षेत्रीय मुक्त व्यापार समझौता है। इसमें 10 आसियान देश नामतः ब्रुनेई, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, म्याँमार, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम शामिल हैं।
  • उपर्युक्त देशों के साथ ही इसमें 6 आसियान मुक्त व्यापार देश, नामत: ऑस्ट्रेलिया, चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और न्यूजीलैंड शामिल हैं।
  • क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी की अब तक 6 मंत्रिस्तरीय बैठकें आयोजित हो चुकी हैं। ध्यातव्य है कि 30-31 अगस्त, 2018 के दौरान सिंगापुर में क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP) की छठी मंत्रिस्तरीय बैठक आयोजित हुई।
  • नवंबर, 2012 में नोमपेन्ह, कंबोडिया में आयोजित 21वें आसियान शिखर सम्मेलन के दौरान 10 आसियान देशों और 6 आसियान मुक्त व्यापार समझौता के देशों द्वारा ‘क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी’ वार्ताओं का शुभारंभ किया गया।
  • क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी वार्ताओं की शुरू करने का उद्देश्य आसियान सदस्य देशों और आसियान के मुक्त व्यापार भागीदारों के मध्य एक आधुनिक, व्यापक, उच्च गुणवत्तापूर्ण और परस्पर लाभकारी आर्थिक भागीदारी समझौता करना है।
  • RCEP के लिये वर्ष 2012 से बातचीत चल रही है। हालाँकि अब भी करार को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है। सदस्य देशों के बीच अब तक कुल 16 में से 7 विषयों पर सहमति बन पाई है।

RCEP का महत्त्व

  • RCEP की अवधारणा जब क्रियाशील होगी तो लगभग 5 अरब लोगों की आबादी के लिहाज़ से यह सबसे बड़ा व्यापार ब्लॉक बन जाएगा।
  • इसमें विश्व के सकल घरेलू उत्पाद का अनुमानतः 40% और वैश्विक व्यापार का 30% प्रभुत्व होगा।
  • महत्त्वाकांक्षी RCEP का एक अनूठा महत्व यह है कि इसमें एशिया की (चीन, भारत और जापान) तीन सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ शामिल हैं।
  • इस व्यापार व्यवस्था में भविष्य की बड़ी संभावनाएँ विद्यमान हैं क्योंकि इसमें चीन और भारत जैसी तेज़ी से बढ़ रही दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ हैं।
  • RCEP समझौते का उद्देश्य आसियान सदस्य देशों और आसियान के एफटीए पार्टनर्स के बीच एक आधुनिक, व्यापक, उच्च गुणवत्तापूर्ण और परस्पर लाभकारी आर्थिक साझेदारी समझौता हासिल करना है।
  • RCEP समझौते में वस्तुओं का व्यापार, सेवाओं का व्यापार, निवेश, आर्थिक और तकनीकी सहयोग, बौद्धिक संपदा, प्रतिस्पर्द्धा, विवाद निपटान और अन्य मुद्दे शामिल होंगे।

पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन का महत्त्व

  • पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन पूर्वी एशिया और प्रशांत क्षेत्र की राजनीतिक सुरक्षा और आर्थिक मुद्दों से जुड़े महत्त्वपूर्ण मसलों पर एक साझी रणनीति बनाने और विकास से जुड़े मसलों को हल करने करने के लिये बना एक महत्त्वपूर्ण सम्मेलन है।
  • पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य एशिया प्रशांत क्षेत्र से जुड़े मुद्दों और साझा हितों पर खुले और पारदर्शी तरीके से आपस में चर्चा करना और उनका हल ढूंढना है।
  • पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन (East Asia Summit-EAS) के महत्त्व का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह पूरी दुनिया में 54 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करता है। इसके अलावा दुनिया के कुल GDP का 58 प्रतिशत EAS देशों से आता है।
  • पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन आसियान की एक महत्त्वपूर्ण पहल है। साथ ही इसके संचालन और सम्मेलन के सफल आयोजन में आसियान की केंद्रीय भूमिका है। हालाँकि इस सम्मेलन का गठन दिसंबर 2005 में हुआ लेकिन इसके लिये प्रयास काफी पहले से शुरू हो गए थे।

पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन का इतिहास

  • पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन की स्थापना का विचार सबसे पहले 1991 में मलेशिया के प्रधानमंत्री महाथिर बिन मोहम्मद ने दिया।
  • आसियान प्लस थ्री देश जिसमें चीन, जापान और दक्षिण कोरिया शामिल थे, ने 2002 में EAS के लिये पूर्वी एशियाई अध्ययन समूह की स्थापना की।
  • इस समूह की अंतिम रिपोर्ट आसियान प्लस थ्री से जुड़े ईस्ट एशिया समिट पर आधारित थी। इसमें आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और भारत शामिल नहीं थे।
  • इस समूह द्वारा जारी की गई रिपोर्ट में यह प्रस्ताव दिया गया कि पूर्वी एशियाई सम्मेलन का आयोजन आसियान देशों के विकास के लिये होना चाहिये और हर साल इसके लिये शिखर बैठक होनी चाहिये।
  • तय किया गया कि आसियान देशों को इसमें शामिल करने के लिये EAS का दायरा बढ़ाया जाए।
  • इसके बाद 2004 में आसियान प्लस थ्री देशों द्वारा पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन का आयोजन करने का निर्णय लिया गया और जुलाई 2005 के अंत में लाओस में आयोजित आसियान प्लस थ्री देशों द्वारा त्रिस्तरीय बैठक का आयोजन किया गया।
  • आख़िरकार दिसंबर 2005 में मलेशिया के कुआलालंपुर में पूर्वी एशियाई देशों के पहले शिखर सम्मेलन का आयोजन किया गया।
  • शुरुआत में इस बैठक में 16 देशों ने हिस्सा लिया। पहले EAS में आसियान देशों के अलावा चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, भारत और न्यूजीलैंड की भागीदारी का स्वागत किया गया।
  • इसके बाद 2011 में इंडोनेशिया के बाली में आयोजित EAS की छठे शिखर सम्मेलन में अमेरिका और रूस को औपचारिक सदस्य के रूप में शामिल किया गया।
  • शुरू में EAS के सम्मेलनों में सुरक्षा का मामला सबसे बड़ा मुद्दा था लेकिन नवंबर 2007 में सिंगापुर में आयोजित तीसरे शिखर सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा और पर्यावरण पर भी काफी अहम चर्चा हुई।
  • इस सम्मेलन में इस बात पर भी सहमति बनी कि आसियान और पूर्वी एशिया के विकास के लिये आर्थिक अनुसंधान संसथान का गठन किया जाए।
  • इसके साथ ही पूर्वी एशिया के लिये व्यापक आर्थिक साझेदारी पर अंतिम रिपोर्ट तैयार करने पर भी सहमति बनी।
  • दरअसल, EAS एक आसियान केंद्रित मंच है और इसकी अध्यक्षता केवल आसियान देशों के सदस्य ही कर सकते हैं।

EAS का विकास और उपलब्धि

  • अगर हम EAS के विकास और उपलब्धियों पर बात करें तो 2005 से शुरू होकर अब तक इसके कुल 13 सम्मेलनों का आयोजन हो चुका है। इसके सदस्यों की संख्या भी 16 से बढ़कर 18 तक पहुँच गई है।
  • अब यह संगठन क्षेत्रीय शांति, सुरक्षा और विकास में अहम भूमिका निभा रहा है।
  • इसके ज़रिये न सिर्फ सदस्य देशों के बीच आपसी साझेदारी बढ़ी है बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक क्षेत्र में भी इसका असर दिखाई दे रहा है।
  • इसके गठन के बाद से ही भारत ने इसमें काफी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दरअसल एशिया प्रशांत क्षेत्र में भारत के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक हित गहराई से जुड़े हुए हैं।

पूर्वी एशियाई देशों के साथ भारत के संबंध

  • अब तक 13 पूर्वी एशियाई शिखर सम्मेलनों का आयोजन हो चुका है। भारत 2005 में इसकी स्थापना के बाद से ही इसके सभी सम्मेलनों में हिस्सा लेता आया है।
  • भारत के लिये EAS सम्मलेन के महत्त्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अब तक हुए इसके सभी सम्मेलनों में भारत के प्रधानमंत्रियों ने खुद भागीदारी की है।
  • EAS के ढाँचे के भीतर सहयोग की 6 प्राथमिकताएँ तय की गई हैं। इनमें शामिल हैं-पर्यावरण और ऊर्जा, शिक्षा, वित्त, वैश्विक स्वास्थ्य संबंधी मुद्दे और महामारी, प्राकृतिक आपदा प्रबंधन और आसियान देशों के साथ कनेक्टिविटी। भारत इन सभी 6 क्षेत्रों में क्षेत्रीय सहयोग का समर्थन करता है।
  • नवंबर 2017 में मनीला में हुए 12वें EAS में समुद्री सहयोग को भी एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में पहचाना गया।
  • भारत के पूवी एशियाई देशों के साथ हमेशा गहरे संबंध रहे हैं। शिक्षा के क्षेत्र में अपनी प्रतिबद्धता जताते हुए अक्तूबर 2009 में थाईलैंड में आयोजित हुए EAS के चौथे सम्मेलन में सभी देशों ने भारत में शिक्षा का वैश्विक केंद्र रहे नालंदा विश्वविद्यालय के पुनरुद्धार के प्रस्ताव का एक मत से समर्थन किया।
  • नालंदा विश्वविद्यालय को जुलाई 2016 में यूनेस्को ने विश्व धरोहर के रूप में घोषित किया। भारत सरकार ने यहाँ उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिये कंबोडिया, म्याँमार, लाओस तथा वियतनाम के छात्रों के लिये छात्रवृत्ति पेश की है।
  • इसके अलावा, वैश्विक स्वास्थ्य के मुद्दे और महामारी के क्षेत्र में सुधार के लिये ऑस्ट्रेलिया और भारत की सह अध्यक्षता में एक टास्क फ़ोर्स का गठन किया गया है जिसका काम गुणवत्तापूर्ण दवाओं को टेक्नोलॉजी टास्क फ़ोर्स तक पहुँचाना है।
  • इसके तहत भारत ने 15-16 अक्तूबर, 2015 को नई दिल्ली में ट्रामा केयर और नर्सिंग पर एक गोलमेज़ सम्मेलन की मेज़बानी भी की।
  • नवंबर 2011 में इंडोनेशिया के बाली में हुए छठे EAS शिखर सम्मेलन में भारत ने आपदा प्रबंधन और भूकंप पर एक EAS कार्यशाला की मेज़बानी की इच्छा जाहिर की थी। इसके तहत नवंबर 2012 में भारत ने एक भूकंप जोखिम प्रबंधन कार्यशाला का आयोजन किया।
  • दक्षिण एशिया के किसी भी देश के साथ भारत के मतभेद नहीं हैं।
  • नवंबर 2012 में पूर्वी एशिया के सातवें सम्मेलन में भाग लेने वाली EAS के 16 देशों के नेताओं ने व्यापक भागीदारी की शुरुआत की।
  • आसियान और आसियान मुक्त व्यापार समझौते के भागीदार देशों में भारत भी शामिल है। ये सभी देश RCEP के सदस्य हैं।
  • RCEP का उद्देश्य एक आधुनिक, व्यापक, उच्च गुणवत्ता और पारस्परिक रूप से लाभप्रद आर्थिक साझेदारी समझौते को प्राप्त करना है।
  • इसके अलावा तमाम ऐसे मुद्दे हैं जिनका साझा हित भारत और EAS के देशों से गहरे रूप से जुड़ा हुआ है। 2015 में हुए EAS के शिखर सम्मेलन में आतंकवाद, हिंसा, उग्रवाद, सुरक्षा और सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग क्षेत्रीय समुद्री सहयोग को बढ़ाने के साथ ही क्षेत्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा और एशिया प्रशांत से मलेरिया जैसी घातक बीमारी के उन्मूलन के लिये रोडमैप तैयार करने की बात की गई जिसमें भारत प्रमुखता से शामिल है।

भारत-आसियान के 25 साल

  • भारत और आसियान के बीच साझेदारी को 25 साल से अधिक हो गए हैं। 1992 में लुक ईस्ट नीति के तहत भारत ने आसियान के साथ संबंधों की शुरुआत की थी और ढाई दशक बाद यह सफ़र मज़बूत मक़ाम पर पहुँच गया है।
  • 1990 के दशक के शुरुआती वर्षों में देश में नई नीतियाँ बनाई गईं। आर्थिक उदारीकरण और निजीकरण से लेकर विदेश नीति तक कई बदलाव हुए।
  • इसी दौरान पी.वी. नरसिंह राव की सरकार ने दक्षिण पूर्वी एशिया में भारत की पकड़ मज़बूत करने के लिये लुक ईस्ट नीति की घोषणा की।
  • आसियान देशों में चीन के बढ़ते दखल के चलते भारत के लिये यह कदम उठाना ज़रूरी हो गया था। दक्षिण-पूर्व एशिया न सिर्फ आर्थिक रूप से बल्कि सामरिक नज़रिये से भी भारत के लिये बेहद अहम क्षेत्र है।
  • 1992 में भारत आसियान का सेक्टोरल साझेदार बना।
  • 1996 में आसियान ने भारत को वार्ता हेतु साझेदार बना दिया।
  • 1996 से भारत हर साल आसियान की बैठक में हिस्सा ले रहा है।
  • 2002 में भारत को सम्मेलन के साझेदार का दर्जा मिला।
  • 2003 में आसियान-भारत मुक्त व्यापार क्षेत्र पर एक महत्त्वपूर्ण करार हुआ। 2009 में इस पर अंतिम सहमति बनी और तब से व्यापारिक गतिविधियाँ और तेज़ हुई हैं।
  • 2012 में भारत रणनीतिक साझेदार बन गया।
  • 2015 में भारत ने आसियान देशों के साथ संबंधों को और मज़बूती देने के लिये विशेष राजदूत की नियुक्ति की।
  • 2015-16 में भारत और आसियान देशों के बीच 65 अरब डॉलर का व्यापार हुआ।
  • 2016-17 में व्यापार बढ़कर 70 अरब डॉलर पहुँच गया है।
  • 2017 में भारत और दोस्ती के 25 साल पूरे होने पर रजत जयंती मनाई गई।
  • फ़िलहाल आसियान भारत का चौथा बड़ा व्यापारिक साझीदार है। यही नहीं वर्ष 2000 के बाद से भारत में हुए निवेश में आसियान का योगदान 12.5 प्रतिशत है।

निष्कर्ष

लुक ईस्ट नीति को 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक्ट ईस्ट नीति के रूप में नया नाम दिया। यानी दक्षिण-पूर्वी एशिया के साथ भारत और गहरे संबंध बनाना चाहता है। मामला सिर्फ आसियान तक सीमित नहीं है बल्कि बिम्सटेक से लेकर पूर्वी एशिया सम्मेलन तक हर मंच को भारत तवज्जो दे रहा है और इन सभी मंचों पर भारत की साख मज़बूत हुई है। भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति और समृद्धि के लिये प्रतिबद्ध है तथा सदस्य देशों के बीच बहुपक्षीय भागीदारी बढ़ाने पर बल देने के साथ ही आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों को विस्तार दे रहा है।

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