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द बिग पिक्चर: राजकोषीय प्रबंधन/अनुशासन और विकास

  • 11 Jan 2018
  • 18 min read

संदर्भ
जीडीपी यानी विकास दर का अनुमान लगाने वाली सरकारी एजेंसी केंद्रीय सांख्यिकीय कार्यालय (Central Statistical Office-CSO) ने हाल ही में इस वित्त वर्ष में देश की विकास दर पिछले वर्ष की तुलना में कम रहने का अनुमान जताया है। इसके अनुसार सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर चालू वित्त वर्ष 2017-18 में 6.5 प्रतिशत पर चार साल के निचले स्तर पर रहेगी। 

पृष्ठभूमि 

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय का सीएसओ ने वित्त वर्ष 2016-17 के लिये स्थिर मूल्यों (2011-12) और वर्तमान मूल्यों पर राष्ट्रीय आय के प्रथम अग्रिम अनुमान जारी किये। देश के बढ़ते राजकोषीय घाटे से विकास प्रभावित होने की आशंका भी जताई गई है। उल्लेखनीय है कि कुछ वर्ष पूर्व विश्व बैंक ने अपनी वैश्विक आर्थिक परिदृश्य रिपोर्ट और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अपनी अलग-अलग रिपोर्टों में कहा था कि भारत तेज़ी से विकास तभी कर सकता है, जब वह राजकोषीय घाटे पर अंकुश लगाए। भारत की अर्थव्यवस्था संभावनाओं से भरी है और राजकोषीय घाटे को नियंत्रित कर आर्थिक सुधारों और व्यापक आर्थिक नीतियों को लागू किया जा सकता है। इससे उसे ऊँची विकास दर कायम रखने में भी मदद मिलेगी।

(टीम दृष्टि इनपुट)

राष्ट्रीय आय का प्रथम अग्रिम अनुमान
सीएसओ ने राष्ट्रीय आय 2017-18 का पहला अग्रिम अनुमान जारी करते हुए बताया कि विमुद्रीकरण और उसके बाद जीएसटी के क्रियान्वयन से प्रभावित चालू वित्त वर्ष में आर्थिक गतिविधियों में गिरावट नज़र आ रही है।

  • जीडीपी: वर्ष 2016-17 में स्थिर मूल्यों (2011-12)  पर वास्तविक जीडीपी के बढ़कर 121.55 लाख करोड़ रुपए हो जाने का अनुमान लगाया गया है, जबकि वर्ष 2015-16 में जीडीपी का अनंतिम अनुमान 113.50 लाख करोड़ रुपये आंका गया था, जो 31 मई, 2016 को जारी किया गया था। वर्ष 2016-17 में जीडीपी वृद्धि दर 7.1 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है, जबकि वर्ष 2015-16 में जीडीपी वृद्धि दर 7.6 प्रतिशत आंकी गई थी। 
  • प्रति व्यक्ति आय: वर्ष 2016-17 के दौरान वास्तविक रूप में (2011-12 के मूल्यों पर) प्रति व्यक्ति आय के बढ़कर 81,805 रुपए हो जाने की संभावना है, जो वर्ष  2015-16 में 77,435 रुपए थी। वर्ष 2016-17 के दौरान प्रति व्यक्ति आय की वृद्धि दर 5.6 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है, जो पिछले वर्ष 6.2 प्रतिशत थी।

क्या है राजकोषीय घाटा?

सामान्य बोलचाल की भाषा में किसी वित्तीय वर्ष में कुल सरकारी आय और कुल सरकारी व्यय का अंतर राजस्व घाटा कहलाता है, जबकि  किसी वित्तीय वर्ष के राजस्व घाटे और सरकार द्वारा लिये गए ऋण पर ब्याज तथा अन्य देयताओं के भुगतान का योग राजकोषीय घाटा कहलाता है। और सरल शब्दों में कहें तो सरकार की कुल आय और व्यय में अंतर को राजकोषीय घाटा कहा जाता है। इससे पता चलता है कि सरकार को कामकाज चलाने के लिये कितनी उधारी की ज़रूरत होगी। कुल राजस्व का हिसाब-किताब लगाने में उधारी को शामिल नहीं किया जाता।

राजकोषीय घाटा आमतौर पर राजस्व में कमी या पूंजीगत व्यय में अत्यधिक वृद्धि के कारण होता है।

(टीम दृष्टि इनपुट)

दुष्प्रभाव: वित्तीय समस्याओं की जड़ है राजकोषीय घाटा
राजकोषीय घाटा बढ़ने से अर्थव्यवस्था पर कई नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं और बढ़ता हुआ राजकोषीय घाटा किसी भी देश के लिये वित्तीय समस्याओं की जड़ और सबसे बड़ी आर्थिक बुराई माना जाता है। 

प्रमुख कारण: विविध प्रकार की सब्सिडी, बढ़ते वेतन, कर्ज़ माफी, प्रोत्साहन पैकेज, सरकारी उपक्रमों का घाटा, कर्ज़ों पर ब्याज, लोक लुभावन योजनाओं का वित्त पोषण, भ्रष्टाचार, कर चोरी, अनुचित सार्वजनिक खर्च को राजनीतिक संरक्षण तथा सरकारी खर्च में अत्यधिक बढ़ोतरी राजकोषीय घाटे के प्रमुख कारणों में से हैं। 

  • राजकोषीय घाटे को पूरा करने के लिये सार्वजनिक ऋण लेने होते हैं, जिन पर सरकार को भारी ब्याज चुकाना पड़ता है। 
  • सरकार जब बैंकों से ऋण लेती है, तो निजी क्षेत्र के लिये ऋण की मात्रा कम होने से औद्योगिक विकास और विदेशी निवेश प्रभावित होते हैं। 
  • लगातार बढ़ते राजकोषीय घाटे के बोझ को कम करने के लिये सरकार अवसंरचना क्षेत्र में पर्याप्त निवेश नहीं कर पाती। 
  • नए टैक्स लगाए जाते हैं, जिससे महँगाई बढ़ती है और आम लोगों को आने वाले समय में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
  • दीर्घावधि में अर्थव्यवस्था को विकास के उच्च स्तर पर ले जाने के लिये राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करना बेहद ज़रूरी है।
  • एक सीमा से अधिक बढ़ जाने के बाद सरकार के लिये भी इसे संभाल पाना बेहद कठिन हो जाता है।
  • राजकोषीय घाटा बहुत अधिक बढ़ जाने से अवसंरचना क्षेत्र में निवेश करना बहुत कठिन हो जाता है। 
  • सरकार राजकोषीय घाटा कम करने के प्रयास में पूंजीगत खर्चों में कटौती करती है, जिससे विकास बाधित हो जाता है। 
  • राजकोषीय घाटे की पूर्ति के लिये सरकार को कर्ज़ लेना पड़ता है, जो वह देश की जनता, बैंकों तथा वित्तीय संस्थानों से लेती है। 
  • कई बार राजकोषीय घाटे को पाटने के लिये सरकार को विश्व बैंक या अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी एजेंसियों से ऋण लेना पड़ जाता है। 
  • राजकोषीय घाटे का वह हिस्सा जो सरकार नोट छापकर पूरा करती है, उसे मौद्रिक घाटा कहा जाता है। नोट छापकर घाटा पूरा करने के कारण भी महँगाई बढ़ती है, जिसका विपरीत प्रभाव देश के अधिसंख्य लोगों पर होता है, जो आजीविका के लिये असंगठित क्षेत्र में  काम करते हैं। 
  • राजकोषीय घाटे की पूर्ति के लिये सरकार द्वारा लिये गए ऋण का भार आम जनता पर  पड़ता है। ऋण के ब्याज सहित भुगतान के लिये उन्हें अधिक टैक्स देना पड़ता है। 
  • राजकोषीय घाटा जारी रहने  की वज़ह से सरकार के पास उत्पादक खर्चों के लिये धन की कमी हो जाती और उसे इन खर्चों में कटौती करनी ही पड़ती है। 
  • राजकोषीय घाटे का एक अन्य दुष्प्रभाव यह है कि सरकार के भारी मात्रा में ऋण लेने के कारण ब्याज दर बढ़ने लगती है, जिससे निजी क्षेत्र के उद्योगों को निवेश के लिये ऊँची दरों पर ऋण  लेना पड़ता है। 
  • राजकोषीय घाटे की भरपाई के लिये सामान्यतः सरकार भारतीय रिज़र्व बैंक से उधार लेती है या फिर छोटी और लंबी अवधि के बॉन्ड जारी कर पूंजी बाज़ार से धन जुटाती है, इससे भी मुद्रास्फीति बढ़ने का खतरा रहता है।

राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन कमेटी

राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (Fiscal Responsibility and Budget Management-FRBM) कमेटी ने वर्ष 2022-23 (इसके छह वर्षीय मध्यम अवधि का राजकोषीय रोडमैप) के लिये सकल घरेलू उत्पाद के लिये राजकोषीय घाटे का लक्ष्य 2.5%, राजस्व घाटे का लक्ष्य 0.8% और केंद्र-राज्य संयुक्त ऋण की अधिकतम सीमा को 60% रखने की अनुशंसा की है। कमेटी ने  वित्तीय वर्ष 2018-20 तक 3% के स्थिर लक्ष्य का सुझाव दिया और कुछ निश्चित कठोर एस्केप क्लॉज़ की भी अनुशंसा की है, जिसके कारण सरकार किसी भी दिये गए वर्ष के लिये निर्धारित राजस्व रोडमैप से 0.5% का विचलन प्रदर्शित कर सकेगी।

(टीम दृष्टि इनपुट)

समग्र वित्तीय अनुशासन/विकास के लिये क्या करना होगा?

  • कृषि क्षेत्र को प्रोत्साहन, 1970 के दशक के मध्य में जीडीपी में कृषि की हिस्सेदारी 38 प्रतिशत थी, जो अब घटकर लगभग 17 प्रतिशत रह गई है।

मानसून क्षतिपूर्ति अवधारणा

यदि मुक्त अर्थव्यवस्था में मानसून क्षतिपूर्ति की अवधारणा पर काम करना है तो यह विश्व अर्थव्यवस्था के अनुरूप होना चाहिये। इसके लिये विनिमय दर, विदेशी पूंजी प्रवाह और घरेलू मांग-आपूर्ति संतुलन की उचित जानकारी होनी चाहिये। इस बारे में ऑस्ट्रेलियाई अर्थशास्त्री ट्रेवर स्वान ने कहा है, "यदि घरेलू लागत विदेशी लागत की तुलना में अधिक हो तो चालू खाते का घाटा होगा। इसके विपरीत घरेलू मांग संपूर्ण रोज़गार आपूर्ति के समान सुनिश्चित करने के लिये राजकोषीय घाटे का अधिक होना आवश्यक है। अपेक्षाकृत उच्च घरेलू लागत के लिये सख्त राजकोषीय नीति की ज़रूरत होती है ताकि मांग को सीमित रखा जा सके और चालू खाते के घाटे पर भी निगरानी रखी जा सके।

(टीम दृष्टि इनपुट)

  • रोज़गारों के अवसर बनाना, कुशल श्रम की मांग को पूरा करने के लिये प्रयास करना 
  • निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिये सार्वजनिक-निजी भागीदारी को प्रोत्साहन, 1976-77 में सार्वजनिक क्षेत्र का निवेश जीडीपी का 9.8 प्रतिशत और निजी कॉर्पोरेट निवेश 1.5 प्रतिशत था। वर्तमान में जीडीपी में सरकारी निवेश की हिस्सेदारी 7.4 प्रतिशत और निजी की 11 प्रतिशत है।
  • घरेलू मांग में वृद्धि होना ज़रूरी, तभी विनिर्माण क्षेत्र में विकास होगा
  • वैश्विक बाज़ार में उपस्थिति बढ़ाना अर्थात् निर्यात बढ़ाने के उपाय करना 
  • 100 ट्रिलियन रुपए की रुकी हुई परियोजनाओं को गति प्रदान करना 
  • नकदी के ढेर पर बैठी बड़ी कंपनियों को निवेश के लिये माहौल प्रदान करना 
  • अलाभकारी सरकारी उपक्रमों में विनिवेश करते हुए हिस्सेदारी निजी क्षेत्र को बेचना 
  • सवा अरब से अधिक आबादी वाले देश में आयकर आयकर देने वालों का दायरा बढ़ाने के रास्तों को  तलाशना। 

मांग बढ़ाना और मुद्रास्फीति घटाना भी ज़रूरी
विनिर्माण सहित अर्थव्यवस्था के सभी प्रमुख क्षेत्रों की वृद्धि में कमी आ रही है। खपत की मांग भी कम हो रही है, इसके लिये कीमतें कम होनी चाहिये, तभी मांग बढ़ेगी। परंतु ऐसा नहीं हो रहा है। मुद्रास्फीति भी भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा तय लक्ष्य से अधिक है, जिसे नियंत्रित करने के लिये बेहतर प्रबंधन की आवश्यकता है। विकास तथा वृद्धि को बढ़ावा देने के लिये अन्य उपायों के अलावा सार्वजनिक संसाधनों का समान वितरण होना भी बेहद आवश्यक है।

केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय 

सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (सीएसओ) पर भारतीय अर्थव्यवस्था के सामाजिक-आर्थिक पहलुओं के बारे में सर्वेक्षण करने की ज़िम्मेदारी है। इसके लिये सीएसओ गाँवों और शहरों में घरों और उद्यमों से जानकारियाँ प्राप्त करता है, ताकि विकास और प्रशासनिक फैसलों के लिये ठोस योजना तैयार करने के लिये आँकड़ों के डेटाबेस को अद्यतन बनाया जा सके।

संयुक्त राष्ट्र के मौलिक सिद्धांतों को अपनाया: आधिकारिक आँकड़ों के संयुक्त राष्ट्र के मौलिक सिद्धांतों को सरकार ने मई 2016 में स्वीकार किया था। इनका मुख्य उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय मापदंडों को अंगीकार करने के साथ-साथ आधिकारिक आँकड़ों के संग्रह, संकलन और प्रसार की पद्धतियों में व्यवसायिक स्वतंत्रता, तटस्थता, जवाबदेही और पारदर्शिता लाना है। इन सिद्धांतों को अपनाने से प्रणालियों, प्रक्रियाओं और संस्थानों में इन सिद्धांतों के अनुरूप सुधार लाने के लिये आधिकारिक आँकड़ों पर राष्ट्रीय नीति तैयार करने का मार्ग भी प्रशस्त होगा। भारतीय सांख्यिकी प्रणाली के अनुसार विकेन्द्रीकृत व्यवस्था में बुनियादी सिद्धांतों का कार्यान्वयन केंद्रीय मंत्रालयों द्वारा होता है जिसमें संबंधित विभागों के साथ-साथ राज्य सरकारों का भी योगदान होता है जिससे नागरिकों को मदद मिलती है।

(टीम दृष्टि इनपुट)

निष्कर्ष: वर्तमान समय में जब अनेक विकसित और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर अनिश्चितताओं का आवरण है, तब भारत कुछ बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच संभावनाओं के साथ उभरा है। लेकिन इन संभावनाओं के साथ एक बड़ी चिंता भी जुडी है...और वह है सुरसा के मुँह की तरह बढ़ता राजकोषीय घाटा। भारत में आर्थिक स्तर पर वित्तीय अनुशासन की कमी रही है। अनेक सरकारी विभाग और संगठन वित्तीय अनुशासनहीनता से ग्रस्त रहे हैं, जबकि आर्थिक शक्ति बनने के लिये देश में आर्थिक अनुशासन का वातावरण अनिवार्य रूप से होना चाहिये। इस वित्तीय अनुशासनहीनता का एक बड़ा दुष्परिणाम है राजकोषीय घाटा। बढ़ता राजकोषीय घाटा किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है, क्योंकि इससे ब्याज दरों के साथ-साथ मुद्रास्फीति दर (महँगाई) भी बढ़ती है। इसीलिये भारतीय परिस्थितियों के मद्देनज़र अर्थशास्त्री राजकोषीय घाटे को कम-से-कम रखने पर ज़ोर देते हैं। उनके अनुसार इसके लिये सरकार को अधिक उधार लेने के बजाय सार्वजनिक उपक्रमों में सरकारी हिस्सेदारी कम करने या बेचने की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिये तथा देशी-विदेशी निवेशकों को इस ओर आकर्षित करना चाहिये। इनके अलावा सरकार को अपने खर्चों पर अंकुश रखते हुए कर प्रशासन और पूंजी बाज़ार में सुधार करते हुए मुद्रास्फीति और उच्च विकास दर के लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए अधिक अनुशासित खर्च करने की आदत डालनी चाहिये।

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