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भारतीय अर्थव्यवस्था

विशेष/देश देशांतर : कर्ज़माफी और अर्थव्यवस्था

  • 27 Dec 2018
  • 23 min read

संदर्भ


मौसम की मार, कर्ज़ की मार, फसलों का उचित रख-रखाव और उपज का सही कीमत न मिलना इस धरती पुत्र की कमर तोड़ देती है और नतीजा किसानों की आत्महत्या के रूप में सामने आता है। चुनावी सीज़न में राजनीतिक पार्टियाँ किसानों की सुध लेती हैं और उन्हें साधने के लिये कर्ज़माफी का शिगूफा छेड़ देती हैं, बिना यह सोचे-समझे कि इसका नकारात्मक और दूरगामी प्रभाव क्या होगा?

  • क्या क़र्ज़माफी से किसानों की समस्याओं का स्थायी समाधान निकलेगा? अर्थव्यवस्था पर इसका क्या असर होगा? और सबसे अहम यह कि क्या आज तक हुई कर्ज़माफी से अन्नदाता की किस्मत बदली है?
  • इन सवालों पर इस वक्त देश में बहस तेज़ है। नीति आयोग ने इसे अर्थव्यवस्था सहित किसानों के लिये भी सही नहीं बताया है।
  • नीति आयोग ने स्ट्रेटजी फॉर न्यू इंडिया @ 75 में किसानों की आमदनी को दोगुना करने के साथ ही आधारभूत संरचना के विकास की बात कही है।

पृष्ठभूमि

  • दरअसल, 1990 में वीपी सिंह की सरकार ने पहली बार पूरे देश में किसानों का करीब 10 हज़ार करोड़ रुपए का क़र्ज़ माफ किया था। उसके बाद NDA सरकार ने 2008-09 के बजट में करीब 71 हज़ार करोड़ रुपए का कर्ज़माफी का एलान किया।
  • वहीं राज्यों की बात करें तो 2014 से अब तक सात राज्यों ने करीब 1 लाख 82 हज़ार 802 करोड़ तक के कर्ज़माफी का एलान किया।
  • 2014 में आंध प्रदेश ने 24 हज़ार करोड़, तेलंगाना ने 17 हज़ार करोड़ जबकि 2016 में तमिलनाडु ने 6 हज़ार करोड़ और वर्ष 2017 में महाराष्ट्र ने 34 हज़ार करोड़, वहीं उत्तर प्रदेश ने 36 हज़ार करोड़ और पंजाब ने 1 हज़ार करोड़ रुपए कर्जमाफी का एलान किया।
  • अगर इसमें हाल के तीन राज्यों यानी मध्य प्रदेश के संभावित 35 हज़ार से 38 हज़ार करोड़, छतीसगढ़ के लगभग 6 हज़ार करोड़ और राजस्थान के 18 हज़ार करोड़ रुपए के कर्ज़माफी को जोड़ दिया जाए तो यह आँकड़ा काफी बढ़ जाएगा।

क्या कर्ज़माफी किसानों की समस्याओं का समाधान है?

  • क्या कर्ज़माफी किसानों की समस्या का समाधान है? इस पर देश में बहस तेज़ हो गई है। जानकारों का मानना है कि यह राज्यों के वित्तीय हालत के लिये सही नहीं है।
  • नीति आयोग का भी मानना है कि कर्ज़माफी किसानों की समस्याओं का समाधान नहीं है। इससे पहले RBI भी कई बार कह चुका है कि कर्ज़माफी अर्थव्यवस्था की सेहत के लिहाज से सही नहीं है।
  • किसान देश के अन्नदाता हैं। लेकिन उनके सामने समस्याएँ भी कई हैं, उनमें से एक है क़र्ज़ की समस्या। कर्ज़ नहीं चुका पाने की वज़ह से कई किसान आत्महत्या तक कर रहे हैं।
  • सवाल यह उठता है कि यह अर्थव्यवस्था के लिहाज से कर्ज़माफी कितना कारगर उपाय है। नीति आयोग का मानना है कि कर्ज़माफी जैसे कदमों से सिर्फ कुछ किसानों को मदद पहुँचेगी। यह किसानों की समस्याओं का दीर्घकालिक समाधान नहीं है।
  • किसानों की समस्याओं को दूर करने से जुड़ी स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को वर्तमान सरकार ने स्वीकार किया है।
  • किसानों का ऋण साढ़े 10 लाख करोड़ तक बढ़ गया है राज्य सरकारों को कर्ज़माफी का फैसला अपनी वित्तीय स्थिति को देखकर उठाना चाहिये।
  • इससे किसानों के सिर्फ एक तबके को लाभ होगा। गरीब राज्यों के सिर्फ 10 से 15 प्रतिशत किसान कर्ज़माफी से लाभान्वित हो सकते हैं। क्योंकि ऐसे राज्यों में बैंकों या वित्तीय संस्थानों से कर्ज़ लेने वाले किसानों की संख्या बहुत कम है। यहाँ तक कि 25 प्रतिशत किसान भी संस्थागत क़र्ज़ नहीं लेते।
  • कृषि क़र्ज़ से संबंधित एक पहलू यह भी है कि किसान जो कर्ज़ खेती के लिये लेते हैं उसे पूरा इस्तेमाल खेती को बढ़ावा देने के लिये नहीं हो पाता।
  • कुछ राज्यों में किसान कृषि कर्ज़ के तीन-चौथाई का इस्तेमाल खेती के लिये नहीं बल्कि दूसरे नीजी ज़रूरतों के लिये कर लेते हैं।
  • नीति आयोग का यह भी मानना है कि राज्यों में किसानों के क़र्ज़ लेने के मामले में संस्थागत पहुँच को लेकर भारी अंतर है। सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार कृषि कर्ज़माफी से मदद नहीं मिलती।
  • इसमें दो राय नहीं है कि कर्ज़माफी से राज्यों की अर्थव्यवस्था के सेहत पर नकारात्मक असर पड़ता है। कृषि से जुडे़ ज़्यादातर मामले राज्य सरकारों के दायरे में आता है। लेकिन विडंबना है कि ज़्यादातर राजनीतिक दल स्थायी समाधान पर ज़ोर देने की बजाय राजनीतिक लाभ के लिये कर्जमाफी का फार्मूला अपनाते हैं।
  • मध्य प्रदेश के उदाहरण से समझें तो राज्य सरकार के कर्ज़माफी के फैसले से देश की जनता पर 34 से 38 हज़ार करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ आ जाएगा।
  • राजस्थान में कर्ज़माफी से सरकारी खजाने पर करीब 18 हज़ार करोड़ का बोझ आएगा।
  • इससे पहले देश का केंद्रीय बैंक रिज़र्व बैंक आफ इंडिया भी कई बार कह चुका है कि कर्ज़माफी जैसे कदमों से देश को राजस्व का बहुत नुकसान होता है और ऐसे फैसले देश की अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव डालते हैं।

क़र्ज़ माफी का अर्थशास्त्र तथा अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

  • सवाल यह है कि क़र्ज़माफी के फैसले का सकारात्मक प्रभाव राज्यों और किसानों पर कितना पड़ेगा। यह सवाल इसलिये महत्त्वपूर्ण है कि आखिर इस क़र्ज़माफी से किसान को फायदा होगा या नुकसान।
  • जानकारों की मानें तो यह सिर्फ एक राजनीतिक फैसला है। इसका असर किसानों और राज्य की अर्थयवस्था पर नकारात्मक रूप से पड़ेगा।
  • दरअसल, इस क़र्ज़माफी का फायदा कुछ हद तक बड़े किसानों को मिल सकता है लेकिन छोटे किसानों पर इसका कोई असर नहीं होगा क्योंकि बड़े किसान कुछ हद तक कर्ज़ चुकाने की स्थिति में होते हैं, और वही क़र्ज़ भी ले पाते हैं। इसलिये इसका फायदा भी वही उठा सकते हैं।
  • जबकि छोटे किसानों को इसका कोई खास फायदा नहीं होगा, वहीं दूसरी तरफ राज्य की अर्थव्यवस्था पर इसका काफी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
  • पिछले कुछ वर्ष के आँकडों को अगर देखें तो राज्यों के मुकाबले केंद्र पर राजकोषीय घाटा ज़्यादा है। लेकिन जिस प्रकार राज्य सरकारों ने क़र्ज़माफी की घोषणा की है उससे राजकोषीय घाटा और ज़्यादा बढ़ जाने की उम्मीद है।
  • इसकी भरपाई के लिये राज्यों को केंद्र से या फिर दूसरे विकल्पों के ज़रिये क़र्ज़ लेना होगा और दूसरे विकास कार्य कहीं-न-कहीं इसकी वजह से प्रभावित होंगे।
  • इसके अलावा, बाहर से कर्ज़ लेने पर राज्य सरकारों को इसकी अदायगी के लिये ज़्यादा ब्याज देना होगा।
  • दरअसल, कर्ज़माफी को पूरी तरह राज्य ही वहन करता है। कर्ज़माफी का सबसे बड़ा असर क्रेडिट रेटिंग एजेंसी द्वारा दी गई रेटिंग पर पड़ता है।
  • इस तरह की एजेंसी कभी भी भारत को बेहतर रेटिंग नहीं देती है। क्योंकि रेटिंग देते समय सिर्फ केंद्र सरकार को ही नहीं देखा जाता बल्कि इसमें राज्यों का भी काफी योगदान होता है।
  • लगातार राजकोषीय घाटा बढ़ने से इस तरह की एजेंसियाँ हमेशा से ही भारतीय अर्थव्यवस्था को शक की निगाह से देखेंगी।
  • हालाँकि केंद्र सरकार लगातार इस कोशिश में है कि वित्तीय घाटे के लक्ष्य को जीडीपी के 3.3 प्रतिशत तक सीमित रखा जाए लेकिन राज्यों के इस फैसले से इस लक्ष्य की प्राप्ति में मुश्किलें आएंगी।

कैसे हल हों किसानों की समस्याएँ?

  • सवाल यह है कि कर्ज़ माफ करने से किसानों की हालत सुधरनी होती तो यह काफी पहले हो चुकी होती लेकिन ऐसा नहीं हुआ लिहाजा सरकारों को कर्ज़माफी की जगह किसानों की हालत सुधारने के लिये ज़रूरी उपाय करने की ज़रूरत है।
  • ऐसे में ज़रूरी है कि कर्ज़माफी की जगह किसानों के उपज की खरीद, उसके रख-रखाव के साथ ही उत्पादों की मार्केटिंग पर ध्यान दिया जाए ताकि उत्पादों की कीमत में स्थिरता बनी रहे।
  • किसानों की आय को बढ़ाने और खेती को लाभकारी बनाने के लिये ज़रूरी है कि किसानों की समस्या का स्थायी और दीर्घकालिक समाधान निकालने के उपायों पर ज़ोर दिया जाए, न कि कर्ज़माफी जैसे उपायों का सहारा लिया जाए।
  • नीति आयोग ने नए भारत के लिये तैयार रणनीति में इन उपायों का ज़िक्र किया है।
  • किसानों की समस्या के लॉन्ग टर्म समाधान के लिये मार्केटिंग तथा इंफ़्रास्ट्रक्चर का विकास करना होगा। किसान को मार्केट से लिंक करना होगा।
  • सबसे अहम है कृषि क्षेत्र में पूंजी निवेश को बढ़ाना जो काफी कम है। उन राज्यों में निवेश काफी कम है जहाँ कर्ज़माफी की गई है। इन राज्यों के बजट पर दबाव है।
  • उत्पादन क्षति, सूखा, अधिक वर्षा, मौसम का अनुकूल न होना, जल की कमी ऐसी समस्याएँ हैं जो किसानों का स्ट्रेस बढ़ाने के प्रमुख कारक हैं जिसका स्थायी समाधान निकालना बेहद ज़रूरी है।

किसानों की आय दोगुनी करने की नीति आयोग की रणनीति

  • केंद्र सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा है और इसी आधार पर कृषि नीति पर काम किया जा रहा है।
  • 19 दिसंबर को केंद्रीय वित्त मंत्री ने नए भारत के लिये नीति आयोग द्वारा तैयार की गई रणनीति को जारी किया, इसे ‘नए भारत के लिये रणनीति @75’ का नाम दिया गया है।
  • इसमें किसानों की समस्याओं को दूर करते हुए उनकी आय दोगुनी करने के लिये सरकार की ओर से उठाए जा रहे कदमों की जानकारी दी गई है।
  • नीति आयोग ने कृषि क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण सुधार लाने के लिये नए कदमों की श्रृंखला शुरू की है।
  • नीति आयोग के इस रणनीतिक दस्तावेज में खेती की उत्पादकता और क्षमता में विकास पर ज़ोर दिया गया है।
  • बाज़ारों तक अपनी पैदावार के लिये किसानों की पहुँच बढ़े उसके लिये नीति आयोग ने ई-राष्ट्रीय कृषि बाज़ार का विस्तार करने को कहा है।
  • कृषि उपज विपणन समिति कानून की जगह कृषि उपज पशुधन विपणन नीति लाकर कृषि क्षेत्र में किसानों को कृषि उद्यमी बनाने पर ज़ोर दिया गया है।
  • नीति आयोग ने माना है कि एकीकृत राष्ट्रीय बाज़ार का गठन मुक्त निर्यात व्यवस्था और ज़रूरी जिंस कानून को समाप्त करना कृषि वृद्धि के लिये ज़रूरी है।
  • कृषि क्षेत्र की दशा सुधारने के लिये ज़ीरो बजट प्राकृतिक खेती को ज़ोरदार तरीके से बढ़ावा देने पर बल दिया गया है।
  • नीति आयोग ने न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने को किसानों की आय बढ़ाने का एक आंशिक समाधान बताया है।
  • नीति आयोग ने कृषि लागत और मूल्य आयोग की जगह एक न्यायाधिकरण गठित करने को कहा है।
  • रणनीतिक दस्तावेज़ में कहा गया है कि सरकार को संविधान के अनुच्छेद 323B के प्रावधानों के अनुरूप कृषि लागत और मूल्य आयोग की जगह कृषि न्यायाधिकरण स्थापित करने पर विचार करना चाहिये।
  • किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य दिलाने और बाज़ार में कीमतों को गिरने से रोकने के लिये सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा करती है।
  • कृषि लागत और मूल्य आयोग की सिफारिशों पर 22 खरीफ और रबी फसलों के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा की जाती है।
  • नीति आयोग किसानों की आय बढ़ाने के लिये कृषि उपजों के आरक्षित मूल्य पर नीलामी की व्यवस्था के पक्ष में है।
  • रणनीतिक दस्तावेज़ में कहा गया है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की जगह न्यूनतम आरक्षित मूल्य की संभावना तलाशने के लिये एक समूह बनाया जाना चाहिये जो मंडियों में उपज की नीलामी के लिये शुरुआती बिंदु हो सकता है।
  • नीति आयेाग के मुताबिक, इस समूह को यह भी जाँचना चाहिये कि क्या MSP को तीन अलग-अलग मानदंडों के आधार पर तय किया जा सकता है?
  • ये तीन मानदंड हैं- आवश्यकता से अधिक उत्पादित उत्पाद, घरेलू बाज़ार में कमी वाले ऐसे उत्पाद जिनकी घरेलू और वैश्विक स्तर पर उपलब्धता है और ऐसे उत्पाद जिनकी घरेलू और वैश्विक स्तर पर कमी है।
  • नीति आयोग ने भविष्य में प्रोत्साहन और कमीशन भुगतान प्रणाली के ज़रिये न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था को समर्थन देने के लिये बाज़ारों में करोबार करने वाले निजी व्यापारियों को शामिल करने के विकल्पों की जाँच का सुझाव दिया है।
  • नीति आयोग का मानना है कि MSP या कीमतें बढ़ाना सिर्फ किसानों को लाभकारी रिटर्न सुनिश्चित करने की समस्या का आंशिक समाधान हो सकता है। दीर्घकालिक समाधान के लिये प्रतिस्पर्द्धी, स्थिर और एकीकृत राष्ट्रीय बाज़ार का निर्माण होना चाहिये जो बेहतर मूल्य खोज को संभव बनाएगा।
  • नीति आयोग ने खेती की उत्पादकता और क्षमता के विकास के लिये सूक्ष्म सिंचाई और कांट्रैक्ट फार्मिंग यानी अनुबंध खेती को ज़रूरी बताया है।
  • कृषि निर्यात के बारे में आयोग ने सुझाव दिया है कि सरकार को सुसंगत और स्थिर कृषि निर्यात नीति लानी चाहिये जो आदर्श रूप से 5 से 10 वर्ष की सोच के साथ तय हो। बीच-बीच में इस नीति की समीक्षा भी होनी चाहिये।
  • आयोग ने सिंचाई सुविधाओं, विपणन सुधार, कटाई के बाद फसल प्रबंधन और बेहतर फसल बीमा उत्पादों में सुधार के माध्यम से कृषि क्षेत्र का आधुनिकीकरण करने की भी बात कही है।
  • किसानों तक उर्वरकों की पहुँच सुनिश्चित हो इसके लिये 2022 तक यूरिया के उत्पाद में आत्मनिर्भर बनने का लक्ष्य तय किया गया है।
  • उरर्वरक में सीधे नकदी लाभ देने यानी DBT लाने की पायलट परियोजना अनेक राज्यों में सफलतापूर्वक पूरी कर ली गई है।
  • इन सबके अलावा यह ज़रूरी है कि खेती के फायदे के लिये बन रही योजनाओं और नीतियों के बारे में किसानों को बेहतर जानकारी मिल सके।
  • ये कुछ ऐसे उपाय हैं जिनकी मदद से 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने में मदद मिलेगी।

भारत में कृषि

  • देश के कुल कामगारों के करीब आधे रोज़गार के लिये खेती पर निर्भर हैं। हाल के सालों में देश में आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ी हैं जिसके चलते कृषि पर रोज़गार के लिये निर्भरता घटी है लेकिन अभी भी खेती और किसान पर दबाव बना हुआ है।
  • कृषि और कृषि आधारित उद्योगों का देश की अर्थव्यवस्था में 17 से 18 प्रतिशत योगदान है।
  • देश के निर्यात में कृषि का योगदान 16 प्रतिशत है इसके अलावा कृषि देश की तकरीबन आधी आबादी के लिये रोज़ी-रोटी का ज़रिया है।
  • 2011 की जनगणना के मुताबिक, 15.97 करोड़ हेक्टेयर ज़मीन खेती के लिये इस्तेमाल हो रही है। यह अमेरिका के बाद दुनिया में सबसे ज़्यादा है इसके बावजूद देश में किसान और खेतीहर मज़दूर की स्थिति में बहुत बड़ा बदलाव नहीं आया है।
  • कई बार दिहाड़ी मज़दूरों की आमदनी कृषि कार्यों में लगे लोगों से भी ज़्यादा होती है। खेती में लगे ज़्यादातर किसान खेती से जुड़ी समस्याओं और कर्ज़ के जाल में उलझे हुए हैं।
  • देश में ज़्यादातर छोटे और मझोले जोत के किसान हैं। देश में हर किसान परिवार के पास औसतन 1.08 हेक्टेयर ज़मीन है। इतनी ज़मीन से औसतन साढ़े 6 हज़ार की मासिक आय हो पाती है।
  • खेती पर होने वाला मासिक खर्च कई बार इससे भी ज़्यादा होता है, जाहिर है खेती में मुनाफे की गुंजाइश काफी कम रह गई है।
  • लगातार खेती पर निर्भर रहने वाले परिवारों के पास कर्ज़ के अलावा कोई रास्ता नही बचता। इसके चलते लोग दूसरे काम-धंधों की तरफ रुख कर रहे हैं।
  • एक अनुमान के मुताबिक, देश में कृषि क्षेत्र में 10 करोड़ से ज़्यादा मज़दूर है, हालाँकि खेतिहर मज़दूरों की तादात लगातार कम हो रही है।
  • जनगणना के मुताबिक, 1990 के दशक में 60 प्रतिशत मज़दूर खेती पर निर्भर थे। 2011 आते-आते इनकी तादात घटकर 49 प्रतिशत रह गई।
  • दरअसल, ज़्यादातर मज़दूर अशिक्षित, अप्रशिक्षित और भूमिहीन लोग हैं। खेती पर अतिनिर्भरता ने इन लोगों को गरीबी और कर्ज़ के अँधेरे कुएँ में ढकेल दिया है।
  • शहर में जिन क्षेत्रों में मज़दूरों की ज़रूरत है उनमें मज़दूरी काफी कम है। इसके चलते इनके जीवन में कोई खास बदलाव नही आता और आखिकार ज़्यादातर लोग गाँव वापस लौटने को मज़बूर हो जाते हैं।
  • जनवरी से दिसंबर 2003 के बीच NSS के सर्वे में पाया गया कि देश में 48.6 फीसदी किसान परिवार कर्ज़दार थे।
  • जनवरी से दिसंबर 2013 के बीच के 70वें राउंड तक ये बढ़कर 52 फीसदी हो गए।
  • 59वें दौर में किसान परिवारों का औसत कर्ज़ जहाँ 12,585 रुपए था वह सर्वे के 70वें राउंड में बढ़कर 47 हज़ार रुपए हो गया।
  • इसकी सबसे बड़ी वज़ह खेती की कम होती जोत और खेती के इनपुट में लगातार बढ़ोतरी है।
  • खेती एकमात्र उद्यम है जिसमें किसान को उसकी लागत के हिसाब से उपज की कीमत तय करने का अधिकार नहीं है। बिजली, पानी, खाद, बीज और मज़दूरी लगातार बढ़ रही है, खेती की लागत बढ़ रही है लेकिन उस अनुपात में किसान को उपज का दाम नहीं मिल रहा।
  • इसके अलावा मौसम, बाज़ार की शक्तियाँ, सरकारी नीतियाँ, आयात-निर्यात नीति समेत तमाम कारक हैं जो किसान के भाग्य का फैसला करते हैं।
  • ज़्यादातर फसलों के दाम सरकार तय करती है लेकिन लागत खर्च पर न सरकार का नियंत्रण है और न ही किसान का।

निष्कर्ष


किसानों की कर्ज़माफी पर राजनेता और अर्थशास्त्री आमने-सामने दिखाई दे रहे हैं। एक ओर राजनीतिक दल किसानों की कर्ज़माफी के लुभावने वादे कर सत्ता हासिल कर रहे हैं तो वहीँ दूसरी ओर अर्थशास्त्री इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिये चुनाव आयोग से अपील कर रहे हैं। किसानों की मदद के लिये बेहतर रास्ता यह हो सकता है कि उन्हें कर्ज़माफी जैसी सुविधा की बजाय खेती की ज़रूरत का सामान मुहैया कराया जाए तथा कृषि क्षेत्र में निवेश बढ़ाया जाए। सरकारों को इस दिशा में पहल करने की ज़रूरत है कि किसानों के लिये वे ऐसी योजनाएँ तैयार करें जिससे गरीब से लेकर संपन्न किसान को कर्ज़ की ज़रूरत ही नहीं पड़े और वे आर्थिक रूप से स्वावलंबी बन सकें।

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