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पॉलिसी वाच : ड्राफ्ट लॉजिस्टिक पॉलिसी

  • 20 Apr 2019
  • 13 min read

संदर्भ

केंद्र सरकार ने नेशनल लॉजिस्टिक ई-मार्केटप्लेस बनाने के लिये नेशनल लॉजिस्टिक पॉलिसी का मसौदा तैयार किया है। यह निर्यातकों और आयातकों के लिये वन-स्टॉप मार्केट प्लेस के रूप में कार्य करेगा। लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में स्टार्ट-अप के लिये एक अलग फंड स्थापित करने से इस क्षेत्र में रोज़गार में दोगुनी वृद्धि होने की संभावना है।

भारत में लॉजिस्टिक क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था का प्रमुख प्रदर्शनकर्त्ता बन गया है। इसका मुख्य कारण यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में उच्च विकास के वर्षों में माल ढुलाई की मात्रा में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

नेशनल लॉजिस्टिक पॉलिसी के मुख्य उद्देश्य

  • देश में सभी लॉजिस्टिक्स और ट्रेड फैसिलिटेशन से संबंधित मामलों के लिये सिंगल पॉइंट रेफरेंस तैयार करना जो ज्ञान और सूचना साझाकरण प्लेटफॉर्म के रूप में भी काम करेगा।
  • वर्तमान मोडल मिक्स (सड़क-60%, रेल-31%, जल-9%) को अंतर्राष्ट्रीय बेंचमार्क (सड़क का 25-30% हिस्सा, रेलवे का 50-55% हिस्सा, जल का 20-25% हिस्सा) के अनुरूप लाना तथा मल्टी मोडल इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास को बढ़ावा देना।
  • किसानों, एमएसएमई और छोटे व्यवसायों की बाज़ार तक पहुँच बढ़ाने के लिये फर्स्ट माइल तथा लास्ट माइल कनेक्टिविटी में सुधार।
  • डिजिटलीकरण और प्रौद्योगिकी के माध्यम से लॉजिस्टिक वैल्यू चेन में दक्षता बढ़ाना।
  • लॉजिस्टिक्स में मानकीकरण सुनिश्चित करना (वेयरहाउसिंग, पैकेजिंग, 3 LP प्लेयर, फ्रेट फारवर्डर)।
  • वन स्टॉप मार्केटप्लेस के रूप में एक नेशनल लॉजिस्टिक ई-मार्केटप्लेस बनाना।
  • पारदर्शिता और प्रमुख लॉजिस्टिक मैट्रिक्स की निरंतर निगरानी के लिये एक डेटा और एनालिटिक्स केंद्र बनाना।
  • अतिरिक्त 10-15 मिलियन नौकरियों का सृजन कर लॉजिस्टिक क्षेत्र में रोज़गार क्षमता को दोगुना करना।

नीति में ज़ोर दिये जाने वाले क्षेत्र

  • एक इष्टतम मोडल और फर्स्ट माइल तथा लास्ट माइल कनेक्टिविटी को सक्षम बनाने के लिये महत्त्वपूर्ण परियोजनाओं पर ध्यान केंद्रित करना।
  • मल्टी मोडल लॉजिस्टिक पार्क (MMLP) का विकास।
  • प्रमुख वस्तुओं की आवाज़ाही के लिये लॉजिस्टिक लागत को कम करना तथा लॉजिस्टिक दक्षता को बढ़ावा देना।
  • सिंगल विंडो लॉजिस्टिक्स ई-मार्केटप्लेस का निर्माण।
  • एक लॉजिस्टिक्स डेटा और एनालिटिक्स सेंटर स्थापित करना।
  • व्यापार सुविधा और लॉजिस्टिक उत्कृष्टता (CTFL) केंद्र बनाना तथा बहुपक्षीय एजेंसियों की विशेषज्ञता का लाभ उठाना।
  • एक एकीकृत राष्ट्रीय लॉजिस्टिक कार्य-योजना बनाना और संबंधित राज्य विकास योजनाओं के साथ संरेखित करना।
  • वेयरहाउसिंग सेक्टर को मज़बूत बनाने पर बल।
  • परिवहन और रोलिंग स्टॉक इन्फ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाना।
  • व्यापार प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ावा देने के लिये एक्जिम (EXIM) प्रक्रियाओं को व्यवस्थित करना।
  • सड़क मार्ग से अंतर्राज्यीय कार्गो की आवाज़ाही के लिये समय कम करना।
  • लॉजिस्टिक क्षेत्र में मानकीकरण को बढ़ावा देना।

लॉजिस्टिक पहल के लिये फंडिंग

  • एक नॉन-लैप्सेबल लॉजिस्टिक फंड (Non-Lapsable Logistic Fund) बनाया जाएगा जो कि महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों की प्रगति को बढ़ावा देगा।
  • लॉजिस्टिक्स फंड का इस्तेमाल निम्नलिखित के लिये किया जा सकता है-

♦ चुनिंदा एमएमएलपी परियोजनाओं, फर्स्ट तथा लास्ट माइल परियोजनाओं और दूरस्थ क्षेत्रों की परियोजनाओं के लिये वित्तपोषण प्रदान करना।

♦ चुनिंदा लॉजिस्टिक स्किल प्रोग्राम और प्रशिक्षण संस्थानों को प्रोत्साहन देना।

♦ लॉजिस्टिक्स में नई तकनीक के विकास को प्रोत्साहित करने के लिये स्टार्ट-अप एक्सेलेरेशन फंड की स्थापना।

♦ व्यापार सुविधा और लॉजिस्टिक उत्कृष्टता केंद्र (CTFL) का निर्माण।

♦ एक बिग डेटा सेटअप तैयार करने में सक्षम लॉजिस्टिक डेटा हब और एनालिटिक्स सेंटर।

♦ सिंगल विंडो लॉजिस्टिक्स ई-मार्केटप्लेस बनाना।

इंटीग्रेटेड लॉजिस्टिक्स पर फ्रेमवर्क एक्ट

  • ’इंटीग्रेटेड लॉजिस्टिक्स पर फ्रेमवर्क एक्ट’ मल्टी मॉडल लॉजिस्टिक्स स्पेस में सभी हितधारकों की भूमिका और ज़िम्मेदारियों को परिभाषित करने के लिये लागू किया जाएगा।
  • यह नेशनल लॉजिस्टिक पॉलिसी, 2018 के अनुसार संबंधित हितधारकों की परिभाषित भूमिकाओं को संस्थापित करेगा और राष्ट्रीय रसद एजेंडा को प्रभावी ढंग से चलाने में सक्षम बनाएगा।
  • यह अधिनियम भारत और विदेशों में लॉजिस्टिक्स के लिये नीतियों और योजनाओं के निर्माण तथा क्रियान्वयन से संबंधित सामान्य सिद्धांतों का व्यापक राष्ट्रीय ढाँचा प्रदान करेगा।

संस्थागत ढाँचा और लॉजिस्टिक्स के लिये गवर्नेंस

  • वाणिज्य विभाग के तहत लॉजिस्टिक विंग की प्रारंभिक ज़िम्मेदारी नेशनल लॉजिस्टिक पॉलिसी के अनुसार प्रमुख क्षेत्रों को चलाने और मुख्य केंद्रीय मंत्रालयों के साथ समन्वय की होगी।
  • इसमें केंद्रीय मंत्रालयों (जैसे सड़क, रेलवे, जहाज़रानी, नागरिक उड्डयन, खाद्य प्रसंस्करण और उपभोक्ता मामले, वित्त तथा गृह मामले), साझेदार सरकारी एजेंसियों और संबंधित राज्य सरकारों के बीच व्यापक समन्वय, डेटा एकत्रीकरण और निगरानी कार्य शामिल होंगे।
  • इस प्रयोजन के लिये चार समितियों/परिषदों का गठन किया जाएगा:

♦ प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में नेशनल काउंसिल फॉर लॉजिस्टिक्स।

♦ वाणिज्य और उद्योग मंत्री की अध्यक्षता में एपेक्स अंतर-मंत्रालयी समिति।

♦ मुख्य उद्योग/व्यापार हितधारकों और शिक्षाविदों के प्रतिनिधित्व के साथ वाणिज्य सचिव की अध्यक्षता में भारत लॉजिस्टिक्स फोरम।

♦ लॉजिस्टिक्स पर अधिकार प्राप्त टास्क फोर्स बनाई जाएगी जो लॉजिस्टिक्स विंग के प्रमुख की अध्यक्षता वाली स्थायी समिति होगी।

नीति का महत्त्व

  • नई एकीकृत नीति नियोजित सड़क और रेल समर्पित माल गलियारों को एक साथ जोड़ती है और भारत के बंदरगाहों के लिये लास्ट-माइल कनेक्टिविटी की लंबे समय से चल रही कमी का समाधान सुझाती है।
  • यह विकास की तुलना में प्रौद्योगिकी के उपयोग को बढ़ावा देने के लिये और अधिक गुंजाइश प्रदान करती है।
  • यह अधिक-से-अधिक सुरक्षा और पूर्वानुमान लगाने में सक्षम होगी साथ-ही-साथ व्यवसाय के अनुमानों और नीति निर्धारण के लिये महत्त्वपूर्ण डेटा भी प्रदान करेगी।

आगे की चुनौतियाँ

  • भारत वर्तमान में अपने सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 12 प्रतिशत लॉजिस्टिक पर खर्च करता है फिर भी बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य किये जाने के बावजूद लॉजिस्टिक उद्योग खंडित तथा अव्यवस्थित है।
  • एक अन्य चुनौती भारतीय लॉजिस्टिक बनाम इसके अंतर्राष्ट्रीय सहयोगियों की अक्षमता है। वर्तमान में भारत में 57 प्रतिशत माल सड़क नेटवर्क से होकर गुज़रता है।
  • समन्वित नियोजन, इंट्रा-स्टेट बॉर्डर मुद्दे, बोझिल डॉक्यूमेंटेशन, नौकरशाही तथा भ्रष्टाचार के कारण ट्रकों की औसत गति केवल 21 किमी/घंटा रह जाती है।
  • इसलिये एक ट्रक प्रतिदिन केवल 300-500 किमी. की दूरी तय कर पाता है, जबकि विकसित देशों में यह आँकड़ा लगभग दोगुना से भी अधिक है।
  • बंदरगाहों में क्षमता और टर्नअराउंड (Turnaround) समय (जहाज़ से माल उतारने और लादने में लगने वाला समय) अभी भी वैश्विक बेंचमार्क से काफी नीचे है और लॉजिस्टिक्स पार्क, वेयरहाउसिंग तथा अन्य बुनियादी ढाँचे भी विकास की प्रारंभिक अवस्था में हैं।
  • माल और सामग्री के भंडारण से संबंधित मुद्दे।
  • प्रौद्योगिकी और कौशल से संबंधित समस्याएँ।
  • अन्य देशों की लॉजिस्टिक सेवाओं की तुलना में कर में वृद्धि।

आगे की राह

  • व्यापक राष्ट्रीय लॉजिस्टिक पॉलिसी के समुचित क्रियान्वयन की आवश्यकता।
  • वर्तमान में लॉजिस्टिक के विभिन्न घटक (भूतल परिवहन, रेलवे, शिपिंग, वायु, वाणिज्य, वित्त) सभी अलग-अलग इकाइयों में हैं। इन्हें एक साथ लाने की आवश्यकता है।
  • लॉजिस्टिक इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश बढ़ाने की आवश्यकता।
  • हमें लोगों के कौशल विकास के लिये अधिक निवेश करने की आवश्यकता है। सप्लाई चेन की बढ़ती जटिलता के साथ हमें उन्हें प्रबंधित करने के लिये अधिक कुशल लोगों की आवश्यकता है।
  • सरकारी तथा निजी संस्थाओं को निरंतर कौशल और प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करने की आवश्यकता है।
  • इसके अलावा प्रौद्योगिकी को अपनाने और व्यापार सुगमता के लिये नीति के सरलीकरण पर ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष

भारतीय लॉजिस्टिक क्षेत्र 22 मिलियन से अधिक लोगों को आजीविका प्रदान करता है और अगले कुछ वर्षों में इसमें उल्लेखनीय वृद्धि की उम्मीद है। नीतिगत संशोधनों, अवसंरचनात्मक विकास, कर सुधारों और प्रौद्योगिकी को अपनाए जाने से लॉजिस्टिक क्षेत्र के एकीकृत विकास के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता निश्चित रूप से वांछनीय परिणाम प्रदान करेगी। यह हमारी व्यापार प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ाएगा, रोज़गार सृजित करेगा, वैश्विक रैंकिंग में देश के प्रदर्शन को बढ़ाएगा और भारत के लिये लॉजिस्टिक केंद्र बनने का मार्ग प्रशस्त करेगा। साथ ही 2022 तक न्यू इंडिया के निर्माण की प्रधानमंत्री की परिकल्पना साकार होने में भी मदद मिलेगी।

प्रश्न : अवसंरचनात्मक सुधार, कौशल, विनियमन एवं नीतियों तथा शासन का सही समन्वयन किसी भी लॉजिस्टिक पॉलिसी का केंद्र होना चाहिये। इस संबंध में नेशनल लॉजिस्टिक पॉलिसी की मुख्य विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए संबंधित चुनौतियों के लिये ज़रूरी रणनीति पर अपने विचार प्रकट करें।

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